गाय को राज्य माता बनाने पर राजस्थान में राजनीतिक घमासान, सरकार ने विधानसभा में दिया ये जवाब
राजस्थान में गौ-माता को लेकर सियासत चरम पर पहुंच गई है। विधानसभा में मंगलवार को इस मुद्दे पर जोरदार बहस और हंगामे के बीच भजनलाल सरकार ने बड़ा संकेत दिया है।

राजस्थान में गौ-माता को लेकर सियासत चरम पर पहुंच गई है। विधानसभा में मंगलवार को इस मुद्दे पर जोरदार बहस और हंगामे के बीच भजनलाल सरकार ने बड़ा संकेत दिया है। गोपालन मंत्री जोराराम कुमावत ने सदन में कहा कि प्रदेश में गाय को ‘राज्य माता’ का दर्जा देने के संबंध में महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से रिकॉर्ड मंगवाकर परीक्षण कराया जाएगा। इन राज्यों में किन आधारों पर यह दर्जा प्रदान किया गया, उसका अध्ययन करने के बाद राजस्थान में भी नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
‘फिलहाल प्रस्ताव विचाराधीन नहीं, पहले परीक्षण’
मंत्री जोराराम कुमावत ने विधायक बालमुकुंदाचार्य द्वारा उठाए गए प्रश्न का जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि वर्तमान में ऐसा कोई प्रस्ताव औपचारिक रूप से विचाराधीन नहीं है। हालांकि, सरकार इस विषय पर अन्य राज्यों के मॉडल का अध्ययन कर रही है। उन्होंने कहा कि यदि अध्ययन के बाद आवश्यक पाया गया तो नियमानुसार आगे की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार गौ-संरक्षण और संवर्धन के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। प्रदेश में पहले से ही गौवध निषेध कानून प्रभावी है और गौवंश के प्रति किसी भी प्रकार के अत्याचार पर सख्त कार्रवाई की जाती है। उन्होंने वैदिक संदर्भ देते हुए कहा कि ‘गावो विश्वस्य मातरः’—अर्थात गाय विश्व की माता है—का उल्लेख प्राचीन वांग्मय में मिलता है और सरकार भी गाय को माता स्वरूप मानकर संरक्षण के प्रयास कर रही है।
सदन में हंगामा, कटे सिर के पोस्टर लहराए
गाय को ‘राज्य माता’ का दर्जा देने की मांग को लेकर सदन में तीखी नोकझोंक हुई। विधायक बालमुकुंदाचार्य ने मांग को जोर-शोर से उठाया, जिस पर मंत्री के जवाब के बाद विपक्ष ने हंगामा शुरू कर दिया। नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने हिंगोनिया गौशाला का मुद्दा उठाते हुए सरकार को घेरा। स्थिति उस समय और तनावपूर्ण हो गई जब सदन में गाय के बछड़े के कटे हुए सिर के पोस्टर लहराए गए। इस दौरान कई बार कार्यवाही बाधित हुई और माहौल गरमा गया।
सरकार का दावा– दो साल में 785 नई गौशालाएं
प्रश्नकाल के दौरान मंत्री कुमावत ने आंकड़ों के साथ सरकार की उपलब्धियां भी गिनाईं। उन्होंने बताया कि पिछले दो वर्षों में प्रदेश में 785 नई गौशालाएं खोली गई हैं। वर्तमान में राजस्थान में कुल 4,421 गौशालाएं संचालित हो रही हैं, जबकि दो वर्ष पूर्व यह संख्या 3,636 थी। उस समय प्रदेश में गौवंश की संख्या 12 लाख 29 हजार 102 बताई गई थी।
मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार गौ संरक्षण के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित कर रही है। इनमें राजस्थान गौ-संरक्षण एवं संवर्धन निधि नियम, 2016 (संशोधित 2021) के तहत पात्र गौशालाओं को चारा-पानी और पशु आहार के लिए सहायता राशि दी जाती है। साथ ही आधारभूत परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए भी अनुदान का प्रावधान है।
जनसहभागिता योजनाओं पर जोर
गोपालन मंत्री ने बताया कि पंचायत समिति स्तरीय नंदीशाला योजना, ग्राम पंचायत गौशाला/पशु आश्रय स्थल जनसहभागिता योजना, गौशाला विकास जनसहभागिता योजना और वध से बचाए गए गौवंश की सहायता योजना जैसी पहलें भी लागू हैं। इन योजनाओं के जरिए स्थानीय स्तर पर समाज की भागीदारी से गौवंश के संरक्षण को बढ़ावा दिया जा रहा है।
सियासत और आस्था के बीच संतुलन की चुनौती
राजस्थान में गाय को ‘राज्य माता’ का दर्जा देने का मुद्दा आस्था और राजनीति, दोनों से जुड़ा हुआ है। जहां एक ओर सत्तापक्ष इसे सांस्कृतिक और धार्मिक सम्मान से जोड़कर देख रहा है, वहीं विपक्ष सरकार से जमीनी स्तर पर गौशालाओं की स्थिति, बजट और व्यवस्थाओं को बेहतर करने की मांग कर रहा है।
फिलहाल सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि बिना अध्ययन और कानूनी परीक्षण के कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा। अब नजर इस बात पर टिकी है कि महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के मॉडल का अध्ययन पूरा होने के बाद राजस्थान सरकार इस दिशा में क्या कदम उठाती है। प्रदेश की राजनीति में यह मुद्दा आने वाले समय में और गर्मा सकता है।
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