साउथ दिल्ली में 400 बेड के निजी अस्पताल का विरोध, सड़क पर उतरे लोग; क्या वजह?
दक्षिण दिल्ली के पॉश इलाके में ग्रेटर कैलाश-1 में प्रस्तावित 400 बेड के निजी अस्पताल के निर्माण को लेकर स्थानीय निवासियों का विरोध लगातार तेज हो रहा है। मेडांता समूह द्वारा अर्चना कॉम्प्लेक्स के पास बनाए जा रहे इस अस्पताल के खिलाफ इलाके के लोग पिछले दो वर्षों से समय-समय पर प्रदर्शन कर रहे हैं।

दक्षिण दिल्ली के पॉश इलाके में ग्रेटर कैलाश-1 में प्रस्तावित 400 बेड के निजी अस्पताल के निर्माण को लेकर स्थानीय निवासियों का विरोध लगातार तेज हो रहा है। मेडांता समूह द्वारा अर्चना कॉम्प्लेक्स के पास बनाए जा रहे इस अस्पताल के खिलाफ इलाके के लोग पिछले दो वर्षों से समय-समय पर प्रदर्शन कर रहे हैं। निवासियों का कहना है कि रिहायशी कॉलोनी के बीच इतने बड़े अस्पताल से ट्रैफिक, पार्किंग और प्रदूषण की समस्या बढ़ेगी।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में ग्रेटर कैलाश रेजिडेंट्स एसोसिएशन (GKRA) के अध्यक्ष राजीव काकरिया के अनुसार, इलाके में पहले से ही कई बड़े अस्पताल मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि 3 से 4 किलोमीटर के दायरे में मैक्स, अपोलो, एस्कॉर्ट्स, होली फैमिली अस्पताल और एम्स जैसे बड़े अस्पताल हैं। ऐसे में रिहायशी इलाके के बीच एक और 400 बेड का अस्पताल बनाना अनावश्यक है और इससे क्षेत्र में ट्रैफिक जाम तथा व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ेंगी।
निवासियों ने यह मुद्दा दिल्ली हाईकोर्ट में भी उठाया है। पिछले साल दायर याचिका में जमीन के स्वामित्व और परियोजना की स्वीकृतियों पर सवाल उठाए गए हैं। आरडब्ल्यूए का दावा है कि विवादित जमीन दो अलग-अलग प्लॉट में है, जिनमें से एक एमसीडी और दूसरा डीएलएफ के स्वामित्व में बताया जाता है। हालांकि, 1989 में दोनों के बीच हुए एक समझौते के बाद इन्हें स्थायी पट्टे पर दिया गया था। निवासियों का कहना है कि मूल पट्टा समझौते की शर्तों का उल्लंघन करते हुए यहां अस्पताल का निर्माण किया जा रहा है।
स्थानीय लोगों का यह भी आरोप है कि अस्पताल बनने से इलाके में जैव-चिकित्सीय कचरे (बायोमेडिकल वेस्ट) की समस्या बढ़ सकती है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है। इसके अलावा भारी ट्रैफिक और पार्किंग की समस्या से कॉलोनी के बुनियादी ढांचे पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
निवासियों ने ऐतिहासिक जमीन रिकॉर्ड की जांच के बाद कुछ और सवाल भी उठाए हैं। उनका दावा है कि पुराने दस्तावेजों में यह जमीन कृषि क्षेत्र के रूप में दर्ज थी और यहां एक नाला तथा जल निकाय मौजूद था। उनका कहना है कि यदि निर्माण कार्य किसी पुराने जल स्रोत पर हुआ है तो यह सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन हो सकता है।
आरडब्ल्यूए ने इस मामले में कई आरटीआई भी दाखिल की हैं और विभिन्न जनप्रतिनिधियों से भी मुलाकात की है। फिलहाल मामला दिल्ली हाईकोर्ट में विचाराधीन है और अगली सुनवाई 7 अप्रैल को निर्धारित है। इस बीच निवासियों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले हफ्तों में विरोध प्रदर्शन और तेज किए जाएंगे।




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