Ghaziabad sisters deaths trigger alarm over online gaming addiction Korean culture craze आपकी मार से तो मौत बेहतर है, हम आत्महत्या कर रहे हैं... सॉरी पापा; पॉकेट डायरी में 3 बहनों की दास्तां, Ncr Hindi News - Hindustan
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आपकी मार से तो मौत बेहतर है, हम आत्महत्या कर रहे हैं... सॉरी पापा; पॉकेट डायरी में 3 बहनों की दास्तां

गाजियाबाद में एक साथ बिल्डिंग से कूदकर जान देने वाली तीन बहनों की घटना ने लोगों को झकझोर दिया। पुलिस जांच में पता चला कि उन्हें एक ऑनलाइन कोरियन गेम की लत लग गई थी, जिसमें कई तरह के टास्क करने होते थे। इस दौरान मिली एक पॉकेट डायरी से उनकी अंदर की दुनिया की झलक मिली है।

Thu, 5 Feb 2026 01:53 PMSubodh Kumar Mishra पीटीआई, नई दिल्ली
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आपकी मार से तो मौत बेहतर है, हम आत्महत्या कर रहे हैं... सॉरी पापा; पॉकेट डायरी में 3 बहनों की दास्तां

गाजियाबाद में एक साथ बिल्डिंग से कूदकर जान देने वाली तीन बहनों की घटना ने लोगों को झकझोर दिया। पुलिस जांच में पता चला कि उन्हें एक ऑनलाइन कोरियन गेम की लत लग गई थी, जिसमें कई तरह के टास्क करने होते थे। इस दौरान मिली एक पॉकेट डायरी से उनकी अंदर की दुनिया की झलक मिली है। इसमें कोरियन संस्कृति से गहरा लगाव और पारिवारिक झगड़ों को लेकर दुख का जिक्र था।

कम सोशल इंटरेक्शन, रील और रियल के बीच की लाइनें धुंधली होना और ऑनलाइन गेमिंग की लत। यह जहरीला कॉकटेल एक अलग ही दुनिया बना सकता है। इससे किशोर गलत रास्ते पर जा सकते हैं, जिसका नतीजा सुसाइड भी हो सकता है। शायद गाजियाबाद में भी यही हुआ। यहां बुधवार तड़के 16, 14 और 12 साल की तीन बहनें बिल्डिंग की नौवीं मंजिल से कूदकर जान दे दीं।

करीब तीन साल से गेम खेल रही थीं

पुलिस जांच में पता चला कि उन्हें एक ऑनलाइन कोरियन गेम की लत लग गई थी, जिसमें कई तरह के टास्क करने होते थे। उनके पिता चेतन कुमार ने बताया कि वे करीब तीन साल से यह गेम खेल रहे थे और तब से स्कूल नहीं गए थे। और एक पॉकेट डायरी से उनकी अंदर की दुनिया की झलक मिली। इसमें कोरियन संस्कृति से गहरा लगाव और पारिवारिक झगड़ों को लेकर दुख था। इसमें शारीरिक सजा का भी जिक्र है। डायरी में बहनों ने लिखा है कि आपकी मार से तो हमारे लिए मौत बेहतर है। इसीलिए हम आत्महत्या कर रहे हैं... सॉरी पापा।

मेंटल हेल्थ पर असर पड़ता है

मैक्स सुपरस्पेशियलिटी हॉस्पिटल वैशाली की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट और सीनियर कंसल्टेंट वंदना प्रकाश के अनुसार, समय और संसाधनों की बर्बादी के अलावा, ऑनलाइन गेमिंग की लत लोगों को स्कूल, ऑफिस और आउटडोर गेम्स जैसी जरूरी गतिविधियों से दूर रख सकती है। यह व्यक्ति को सोशल इंटरेक्शन से भी दूर रखता है, जिससे वह अकेला और तन्हा हो जाता है। असली दुनिया से दूर रहने का अक्सर व्यक्ति की मेंटल हेल्थ पर असर पड़ता है, जिससे वे सुसाइड करने के बारे में सोचने लगते हैं।

इंसान के तौर पर पहचान खत्म हो जाती है

वहीं, फोरेंसिक साइकोलॉजिस्ट दीप्ति पुराणिक ने कहा कि किशोर खुद को अपनी गेमर आइडेंटिटी से जोड़ लेते हैं और इसे छीनने से गंभीर नतीजे हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि किशोरों की पूरी सोच असल जिंदगी के बजाय उस गेम में अपनी काबिलियत के इर्द-गिर्द घूमने लगती है। जब आप उनसे यह छीन लेते हैं तो एक इंसान के तौर पर उनकी पहचान खत्म हो जाती है। वे पूरी तरह से इमोशनल आइसोलेशन महसूस कर सकते हैं, जिससे वे कोई बड़ा कदम उठा सकते हैं। उन्होंने आगे कहा कि किसी भी लत को इस तरह से देखा जा सकता है कि दिमाग रिवॉर्ड सिस्टम पर कैसे रिएक्ट करता है।

जिंदगी को अस्त-व्यस्त और बेकाबू बना सकते हैं

मुंबई के एक साइकोलॉजिस्ट ने पीटीआई को बताया कि गेम इन बच्चों को इनाम या तारीफ के जरिए खुशी देते हैं। गेमिंग सीधे तौर पर किसी व्यक्ति को कोई बड़ा कदम उठाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती, लेकिन यह कई ऐसे कारणों को जन्म दे सकती है जो किसी व्यक्ति की जिंदगी को अस्त-व्यस्त और बेकाबू बना सकते हैं।

पुलिस ने बताया कि बहनों ने इतना बड़ा कदम तब उठाया जब उनके माता-पिता ने उनके बहुत ज्यादा मोबाइल फोन इस्तेमाल करने पर आपत्ति जताई। उनकी डायरी की डिटेल्स और पुलिस की आगे की जांच से कोरियाई पॉपुलर कल्चर के प्रति उनका जुनून और भी साफ हो गया।

कोरिया जाना चाहती थीं

बच्चियों के पिता ने बताया कि उन्हें पता नहीं था कि उनके बच्चे जिस कोरियन लव गेम के आदी हो गए थे, वह किस तरह का गेम था। बाद में उन्हें पता चला कि इस गेम में कुछ इंस्ट्रक्शन्स थे जिन्हें बच्चे फॉलो कर रहे थे। अगर मुझे पता होता कि ऐसे टास्क होते हैं तो वह अपने बच्चों को इसमें शामिल नहीं होने देता। पिता ने यह भी बताया कि लड़कियां अक्सर कहती थीं कि वे कोरिया जाना चाहती हैं।

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इमोशनल जरूरत पूरी नहीं हो रही

क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट श्वेता शर्मा के अनुसार, छोटे बच्चों में कोरियन पॉप कल्चर के प्रति आकर्षण माता-पिता की इमोशनल गैर-मौजूदगी के कारण होता है। माता-पिता के पास समय नहीं है। इमोशनल सपोर्ट बिल्कुल नहीं है। हम बच्चों को बिना यह समझे सारी सुविधाएं दे रहे हैं कि वे उन्हें संभाल पाएंगे या नहीं। इसलिए उनकी इमोशनल जरूरत पूरी नहीं हो रही है।

शर्मा ने युवाओं में गेमिंग की लत के बढ़ते मामलों पर बात करते हुए कहा कि बच्चे ऐसे गेम दोस्तों के दबाव में कुछ साबित करने की जिज्ञासा से शुरू करते हैं। गेम के हर स्टेज पर खुद को साबित करने की लगातार जरूरत होती है। इसलिए, आमतौर पर ये बच्चे सही इमोशनल रेगुलेशन नहीं समझ पाते हैं। उन्हें देखे जाने और पहचाने जाने की बहुत ज्यादा जरूरत होती है।

असलियत और सोच के बीच फर्क नहीं कर पाते

उन्होंने आगे कहा कि किशोरों का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स पूरी तरह से विकसित नहीं होता है, जो जटिल, हाई-लेवल कॉग्निटिव प्रोसेस के लिए जिम्मेदार होता है। इसमें फैसले लेना, पर्सनैलिटी दिखाना और आवेगों को कंट्रोल करना शामिल है। इस उम्र के ग्रुप में लत का लेवल ज्यादा होता है क्योंकि वे अभी भी विकास की स्टेज में होते हैं। वे असलियत और सोच के बीच फर्क नहीं कर पाते हैं।

जिस दिन गाजियाबाद की बहनों ने अपनी जान दी, उसी दिन भोपाल में एक 14 साल के लड़के ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। उसके परिवार वालों को शक है कि मोबाइल गेम की लत की वजह से उसने ऐसा किया। पुलिस ने बताया कि क्लास 9 का छात्र अपने माता-पिता का इकलौता बच्चा था। कथित तौर पर 'फ्री फायर' मोबाइल गेम का आदी था और उसकी मां ने उसे डांटा था।

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ब्लू व्हेल चैलेंज की याद ताजा

इन घटनाओं से 2017 के ब्लू व्हेल चैलेंज की याद आ गई। यह जानलेवा 50 दिन का चैलेंज, जिसके बारे में माना जाता है कि यह रूस में शुरू हुआ था। इसने रूस और मध्य एशियाई देशों कजाकिस्तान और किर्गिस्तान में 130 से ज्यादा लोगों की जान ले ली थी।

रिपोर्ट के अनुसार, इस गेम में एडमिनिस्ट्रेटर 50 दिनों की अवधि में खिलाड़ियों को कई टास्क देते थे। शुरुआत में ये टास्क आसान होते थे। धीरे-धीरे एडमिनिस्ट्रेटर ऐसे चैलेंज देते थे जिनमें खुद को नुकसान पहुंचाना शामिल होता था। आखिरी चैलेंज में खिलाड़ी को आत्महत्या करने के लिए कहा जाता था।

विशेषज्ञों ने कहा कि इस उम्र के बच्चों के लिए एक स्वस्थ माहौल बनाने के लिए परिवार के सदस्यों के बीच खुली बातचीत के साथ फोन के इस्तेमाल को रेगुलेट करने जैसा कुछ जरूरी कदम होने चाहिए।

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