अरविंद केजरीवाल के केस से क्यों नहीं हटीं जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा? जानिए 9 बड़े कारण
अरविंद केजरीवाल की याचिका खारिज करते हुए जस्टिस शर्मा ने साफ कहा कि “शक और आशंकाएं” किसी जज की निष्पक्षता पर सवाल उठाने का आधार नहीं हो सकतीं। कोर्ट ने अपने फैसले में 9 ठोस कारण गिनाए, जिसके आधार पर उन्होंने इस केस से हटने से इंकार किया है। जानिए क्या हैं वो 9 कारण…

Justice Swarana Kanta Sharma and Arvind Kejriwal: दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने आबकारी नीति मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने से इनकार कर दिया है। अरविंद केजरीवाल की याचिका खारिज करते हुए जस्टिस शर्मा ने साफ कहा कि “शक और आशंकाएं” किसी जज की निष्पक्षता पर सवाल उठाने का आधार नहीं हो सकतीं। कोर्ट ने अपने फैसले में 9 ठोस कारण गिनाए, जिसके आधार पर उन्होंने इस केस से हटने से इंकार किया है। जानिए क्या हैं वो 9 कारण…
1. केस करने वाले का भ्रम, निष्पक्षता के अंदाजे को खारिज नहीं कर सकता
जस्टिस शर्मा ने आदेश सुनाते हुए कई बार इस बात पर जोर दिया कि अरविंद केजरीवाल ने अपनी दलीलों में कहा कि वह जज की ईमानदारी पर सवाल नहीं उठा रहे हैं। वह जज का बहुत सम्मान करते हैं। बस उनके मन में शक और आशंकाएं हैं कि उन्हें उनकी कोर्ट से इंसाफ मिलेगा या नहीं।
जस्टिस शर्मा ने कहा कि मिस्टर केजरीवाल का "पर्सनल डर" और "भ्रम" भेदभाव के सही अंदाजे के टेस्ट को पास नहीं कर पाया है। उन्होंने आगे कहा कि उनके केस से अलग होने की मांग वाली अर्जी सबूतों के साथ नहीं बल्कि "शक" और "इशारों" के साथ फाइल की गई थी।
2. चीफ गेस्ट या स्पीकर बनने से जज की काबीलियत खत्म नहीं होती
अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया था- वह RSS से जुड़ी अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (ABAP) के इवेंट्स में शामिल हुईं थीं। इस पर केजरीवाल ने आशंका जाहिर की थी कि उन्हें न्याय मिलेगा भी या फिर जस्टिस का मिसकेरेज हो जाएगा।
इस पर जस्टिस शर्मा ने कहा- वह अलग-अलग विचारधाराओं वाली बार बॉडीज के ऐसे कई इवेंट्स में शामिल हुई हैं, क्योंकि यह किसी भी जज के रूटीन का हिस्सा है। कई जज उन इवेंट्स में हिस्सा ले रहे हैं। इस तरह की भागीदारी का इस्तेमाल विचारधारा के भेदभाव का आरोप लगाने के लिए नहीं किया जा सकता।
उन्होंने आगे कहा- “यह समझना मुश्किल है कि सिर्फ चीफ गेस्ट या स्पीकर के तौर पर हिस्सा लेने से कैसे भेदभाव की आशंका पैदा हो सकती है या इससे किसी जज की किसी केस को जज करने की काबिलियत खत्म हो सकती है।”
3. जज के बच्चों के लॉ प्रैक्टिस करने के फंडामेंटल राइट्स हैं
अरविंद केजरीवाल के केस की सुनवाई में "कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट" के आरोपों पर, उन्होंने कहा कि यह साफ दिखाना होगा कि जज के फैसले पर सरकारी पैनल में उनके परिवार के सदस्यों के साथ रिश्ते का असर पड़ेगा। उन्होंने आगे कहा कि जजों के बच्चों को लॉ प्रैक्टिस करने से नहीं रोका जा सकता, क्योंकि ऐसा करना उनके फंडामेंटल राइट्स छीनने जैसा होगा।
इस बात को एक उदाहरण देते हुए समझाया- "अगर एक नेता की पत्नी पॉलिटिशियन बन सकती है, अगर एक नेता के बच्चे नेता बन सकते हैं। तो यह कैसे कहा जा सकता है कि एक जज के बच्चे लॉ के प्रोफेशन में नहीं आ सकते? इसका मतलब होगा जजों के परिवार के फंडामेंटल राइट्स छीनना।" अपनी बात रखते हुए जस्टिस ने कहा- उनके किसी भी बच्चे का लिकर पॉलिसी केस से कोई लेना-देना नहीं है।
4. नैरेटिव बनाने के लिए केजरीवाल द्वारा चुनिंदा ऑर्डर को चुना गया है
जस्टिस शर्मा ने केजरीवाल और उनकी पार्टी के साथियों के पिछले उदाहरणों का जिक्र करते हुए कहा- केजरीवाल की पार्टी के लोगों ने यह नहीं कहा कि कोर्ट कोई अंतरिम (अस्थायी) आदेश ही न दे। इस कोर्ट में उनकी पार्टी के और भी कई मामले चल रहे हैं, और पहले भी कई फैसले दिए गए हैं। तब किसी ने जज पर पक्षपात का आरोप नहीं लगाया, क्योंकि उन फैसलों से शायद उन्हें फायदा हुआ था। कुल मिलाकर जज ने कहा- जब फैसला अपने पक्ष में होता है तो कोई सवाल नहीं उठाता, लेकिन जब फैसला खिलाफ जाता है तो जज पर आरोप लगाना शुरू कर देते हैं, यह सही तरीका नहीं है।
5. सुप्रीम कोर्ट ने उनके ऑर्डर पर कोई गलत टिप्पणी नहीं की
अरविंद केजरीवाल ने तर्क दिया था कि उनके केस में जस्टिस शर्मा के सभी ऑर्डर सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिए थे, इसलिए उन्हें केस की सुनवाई नहीं करनी चाहिए। जस्टिस शर्मा ने इस बात पर जोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके ऑर्डर को परखा था, लेकिन उनके खिलाफ कोई गलत टिप्पणी नहीं की थी।
जस्टिस शर्मा ने कहा- आप सांसद संजय सिंह को ED की रियायत पर सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दी थी। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मेरे ऑर्डर पर कोई गलत टिप्पणी नहीं की थी। इसी तरह, मनीष सिसोदिया केस में, इस कोर्ट के ऑर्डर पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई नतीजा या टिप्पणी नहीं की।
6. नेताओं के बयानों पर कोर्ट का कोई कंट्रोल नहीं है
अरविंद केजरीवाल ने गृह मंत्री अमित शाह के बयान का भी जिक्र करते हुए न्याय न मिलने की आशंका जाहिर की थी। केजरीवाल ने बताया था- होम मिनिस्टर अमित शाह ने एक्साइज पॉलिसी केस में आरोपियों को बरी करने के खिलाफ हाई कोर्ट में एक अर्जी दी है।
इस पर जस्टिस शर्मा ने कहा, "ऐसे आधार पर जज को अलग करने की मांग करना, पूरी तरह से कल्पना पर आगे बढ़ना होगा। कोर्ट का इस पर कोई कंट्रोल नहीं है कि कोई नेता पब्लिक डोमेन में क्या कहना चाहता है। यह नेताओं के बयानों को भी रेगुलेट नहीं कर सकता।"
7. खुद को अलग करने से गलत मिसाल बनेगी, ज्यूडिशियरी पर दाग लगेगा
जस्टिस शर्मा ने बताया, उन्होंने केस की सुनवाई के लिए मुश्किल रास्ता क्यों चुना- अगर उन्होंने खुद को इस केस से अलग किया, जनता को यह विश्वास हो जाएगा कि जज किसी खास पॉलिटिकल पार्टी या विचारधारा से जुड़े हुए हैं। इसके गहरे संवैधानिक असर होंगे और इससे न्यायव्यवस्था की साख पर असर पड़ेगा।
उन्होंने कहा- "एप्लीकेशन में दी गई बातें अंदाजे पर आधारित थीं। अगर मैं उन्हें मान लेती, तो इससे एक परेशान करने वाली मिसाल कायम होती। मैंने अपने सामने आए सभी सवालों का बिना डरे फैसला किया है। इस कोर्ट को आरोपों और इशारों से दबाया नहीं जा सकता। यह कोर्ट तब तक झुकेगा या पीछे नहीं हटेगा जब तक ऐसा करने से इंस्टीट्यूशन की साख पर असर न पड़े। यह इंसाफ नहीं होगा, बल्कि इंसाफ मैनेज किया जाएगा।"
8. अरविंद केजरीवाल की कैच 22 सिचुएशन
कोर्ट ने कहा कि केजरीवाल ने एक कैच 22 सिचुएशन बना दी है, जहाँ वह जो भी करना चाहेंगी, उससे उनके लिए विन-विन सिचुएशन बन जाएगी। जस्टिस शर्मा ने कहा, "अगर उन्हें राहत नहीं मिलती है, तो वह कहेंगे कि उन्होंने पहले ही नतीजे का अंदाजा लगा लिया था। अगर उन्हें राहत मिलती है, तो वह कह सकते हैं कि कोर्ट ने दबाव में काम किया। लिटिगेंट (मुकदमा लड़ने वाला) अपनी कहानी के हिसाब से सिचुएशन को दिखा सकता है।"
हालांकि, जस्टिस शर्मा ने कहा कि एक जज के तौर पर वह खुद को अलग करके गलत मिसाल कायम नहीं कर सकतीं, क्योंकि इससे ताकतवर लोगों को गलत मैसेज जाएगा कि ज्यूडिशियरी को सोशल मीडिया की कहानियों से झुकाया जा सकता है। जस्टिस शर्मा ने कहा कि ताकतवर नेताओं को अपने फायदे के लिए "फोरम शॉपिंग" करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। यानी अपनी सुविधा या फायदे के लिए अलग-अलग अदालतों/फोरम में वही मामला ले जाना, ताकि मनचाहा फैसला मिल सके।
9. ड्यूटी से पीछे नहीं हट सकती, ये सरेंडर करने जैसा होगा
जस्टिस शर्मा ने कहा कि उनका केस से पीछे हटना ड्यूटी से पीछे हटना होगा और यह सरेंडर करने जैसा होगा। जस्टिस शर्मा ने कहा कि केजरीवाल ने न सिर्फ उनके खिलाफ आरोप लगाए हैं, बल्कि न्यायपालिका जैसे संस्थान को भी ट्रायल पर खड़ा किया है और उनके फैसले का ज्यूडिशियरी पर बहुत बड़ा असर पड़ेगा।
उन्होंने कहा- "इस कोर्ट को आरोपों और इशारों से दबाया नहीं जा सकता। यह कोर्ट तब तक झुकेगा या पीछे नहीं हटेगा जब तक ऐसा करने से इंस्टीट्यूशन की क्रेडिबिलिटी पर असर न पड़े। यह जस्टिस एडमिनिस्ट्रेट नहीं होगा बल्कि जस्टिस मैनेज किया जाएगा।"




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