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केजरीवाल को जिन 3 बातों को लेकर था जस्टिस स्वर्ण कांता पर शक, जज साहिबा ने उन्हें कैसे किया साफ

अरविंद केजरीवाल ने अदालत में खुद जिरह करते हुए जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ कई दलीलें रखी थीं। उन्होंने 3 बड़े कारण बताते हुए जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा पर संदेह जाहिर किए थे। अदालत ने सबका जवाब दिया है।

Tue, 21 April 2026 12:15 PMSudhir Jha लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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केजरीवाल को जिन 3 बातों को लेकर था जस्टिस स्वर्ण कांता पर शक, जज साहिबा ने उन्हें कैसे किया साफ

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल को सोमवार की शाम उस वक्त बड़ा झटका लगा जब हाई कोर्ट ने उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया जिसके लिए वह खुद'वकील' बने और पूरा दमखम लगाया। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने साफ कर दिया कि वह कथित शराब घोटाले से जुड़े केस से खुद को अलग नहीं करेंगी। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य ने हाई कोर्ट में याचिका दायर करके जज की निष्पक्षता पर संदेह जाहिर किए थे। पूर्व सीएम ने खुद जिरह करते हुए जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ 10 तरह की दलीलें रखी थीं। उन्होंने 3 बड़े आरोपों के साथ यह साबित करने की कोशिश की कि जस्टिस शर्मा की अदालत से उन्हें न्याय नहीं मिल सकता है। हालांकि, अदालत ने एक-एक करके सभी आरोपों का जवाब दिया। आरएएस से जुड़े कार्यक्रम में शामिल होने, गृह मंत्री अमित शाह के एक बयान और बच्चों के सरकारी पैनल में होने पर जस्टिस ने विस्तार से जवाब दिया।

आरएसएस के कार्यक्रम में जाने पर क्या कहा?

अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की निष्पक्षता पर संदेह जाहिर करते हुए कहा था कि वह अधिवक्ता परिषद (आरएसएस से जुड़ा संगठन) के कार्यक्रम में कई बार शामिल हो चुकी हैं। जस्टिस शर्मा ने सोमवार को फैसला सुनाते हुए इस पर विस्तार से अपनी बात रखी और आरोपों को निराधार बताया। उन्होंने कहा, 'वक्ताओं को कानूनी मुद्दों पर बोलने के लिए बुलाया गया था। इससे पहले भी इस देश के जज जाते रहे हैं। सिर्फ इसलिए कि मुझे लेक्चर देने के लिए बुलाया गया था, राजनीतिक पक्षपात का आधार नहीं हो सकता है। कोई कैसे कह सकता है कि सिर्फ इसलिए कि मैं वकीलों के एक कार्यक्रम में गई, मैं केस पर निष्पक्ष फैसला नहीं दे सकती। आवेदक (केजरीवाल) ने चयनित रूप से अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों को रिकॉर्ड पर रखा। यह अदालत एनएलयू, कालेज, अस्पतालों और वकीलों के फोरम में शामिल होती है।'

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जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि जजों को अदालतों के जजों के रूप में बुलाया जाता है, जहां किसी राजनीतिक विचारधारा के लिए कोई जगह नहीं होती। बार और बेंच के बीच संबंध सिर्फ कोर्टरूम तक सीमित नहीं। यह समान्य है कि कोई बार एसोसिएशन कार्यक्रम का आयोज करे। जज ने यह भी कहा कि कई बार वकील किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े होते हैं लेकिन जब वे अदालत में पेश होते हैं तो केस की सुनवाई मेरिट पर होती है, विचारधारा के चश्मे से नहीं।

अमित शाह के बयान पर क्या बोले थे केजरीवाल, जज ने क्या दिया जवाब

अरविंद केजरीवाल ने जिरह करते हुए यह गृह मंत्री अमित शाह की ओर से एक टीवी चैनल के प्रोग्राम में बयान का भी जिक्र किया था। केजरीवाल ने यह बयान का जिक्र करते हुए अदालत पर संदेह जाहिर किया था। उन्होंने कहा था कि अमित शाह ने कहा है कि उन्हें (केजरीवाल) को हाई कोर्ट से राहत नहीं मिलेगी और वह सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने इसका जवाब देते हुए कहा, 'कोई राजनेता या केंद्रीय गृहमंत्री ऐसा विचार प्रकट कर सकते हैं जो वादी के खिलाफ हो। इस पर कोई नियंत्रण नहीं कि कोई राजनेता या मिस्टर केजरीवाल, जो खुद भी एक राजनेता हैं, वह सार्वजनिक रूप से या राजनीति में बोल सकते हैं। यह सामान्य समझ का मामला है कि राजनीतिक दल विरोधियों पर ऐसे बयान देते हैं।'

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बच्चों वाली दलील पर केजरीवाल को क्या जवाब

अरविंद केजरीवाल ने हलफनामा दायर करते हुए हितों के टकराव का मुद्दा बनाने की कोशिश की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि चूंकि जस्टिस शर्मा के बच्चे सरकारी वकीलों के पैनल में शामिल हैं और सीबीआई का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल उन्हें काम देते हैं इसलिए यह हितों के टकराव का मामला है।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने इसे भी खारिज करते हुए कहा कि इस तरह के टकराव को खास मामले में साफ तौर पर दिखाया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि भले ही इस कोर्ट के रिश्तेदार सरकारी पैनल में हों, लेकिन वादी को दिखाना होगा कि इसका प्रभाव मौजूदा मामले पर या फैसला लेने की शक्ति पर पड़ा है। ऐसा कोई आधार नहीं बताया गया है। उन्होंने कहा कि जज के बच्चों को न्यायिक प्रैक्टिस करने से नहीं रोका जा सकता। यह उनके मौलिक अधिकार हैं।

जस्टिस स्वर्ण कांता ने कहा, 'जज के पद के दुरुपयोग के सबूत के बिना एक वादी यह तय नहीं कर सकता कि जजों के बच्चे केसे अपनी जिंदगी बिताएं। यदि नेता के बच्चे राजनीति में प्रवेश कर सकते हैं तो क्या जजों के बच्चों के कानूनी पेशे में आने, संघर्ष करने और दूसरों की तरह खुद को साबित करने पर सवाल उठाना उचित होगा? इस अदालत के रिश्तेदारों का इस विवाद से कोई लेनादेना नहीं है। यदि इन आरोपों को स्वीकार कर लिया जाता है तो अदालत किसी ऐसे केस को नहीं सुन सकती जिसमें यूनियन ऑफ इंडिया वादी है।'

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