झारखंड के 9 जिलों के 1.59 लाख किसान MSP को तरसे, लापरवाही पर कोई कार्रवाई नहीं
सीएजी रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि नौ जिलों में 1,59,354 किसानों से धान खरीद में न केवल उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने में काफी देरी की गई, बल्कि बकाया भी पाया गया।

सीएजी रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि नौ जिलों में 1,59,354 किसानों से धान खरीद में न केवल उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने में काफी देरी की गई, बल्कि बकाया भी पाया गया। सबसे अधिक हजारीबाग के 61,218 किसानों से धान खरीद हुई थी। किसानों को एमएसपी का भुगतान दो किस्तों में होना था। 50% खरीद के अगले दिन और 50% खरीद से एक महीने के अंदर।
जांच में सच इसके उलट मिला। पहली किस्त में 79 से 98% किसानों को भुगतान में 775 दिनों तक की देरी हुई। वहीं, दूसरी किस्त में 64 से 100% किसानों को 370 दिनों तक का इंतजार करना पड़ा। वहीं, खरीद की तिथि से आठ माह से चार साल तक की अवधि बीत जाने के बाद भी 1741 किसानों को 8.84 करोड़ का एमएसपी भुगतान किसानों को नहीं किया गया।
लापरवाही के बावजूद पैक्स-लैम्पस और मिलरों पर कार्रवाई नहीं
राज्य के नौ जिलों में धान खरीद और मिलिंग की प्रक्रिया में भारी वित्तीय अनियमितता और लापरवाही मिली। खरीफ विपणन मौसम 2011-12 से 2017-18 के बीच, 256 पैक्स और लैम्प्स पर ₹25.10 करोड़ का बकाया था। विभाग द्वारा 9.70 करोड़ रुपए बकाया राशि की वसूली किए बिना ही 105 पैक्स-लैम्प्स और ₹7.51 करोड़ का बकाया रखने वाले 14 मिलरों को 2018-19 से 2021-22 के दौरान फिर से धान खरीदने और मिलिंग की अनुमति दे दी गई।
इसके अलावा इनमें से 25 पैक्स-लैम्प्स और चार मिलरों ने वर्ष 2018-19 से 2021-22 के दौरान क्रमश: ₹11.22 करोड़ मूल्य का धान और ₹30.09 करोड़ मूल्य का न तो धान लौटाया और न ही चावल जमा किया। करोड़ों रुपये के इस सरकारी नुकसान के बावजूद, संबंधित पैक्स, लैम्प्स और मिलरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
राइस मिलों से ₹72.81 करोड़ की वसूली बाकी
सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2018-19 से 2021-22 के दौरान किसानों से पैक्स-लैम्प्स द्वारा खरीदे गए 10.07 लाख मीट्रिक टन धान में से 20.77 करोड़ का 10.210 मीट्रिक टन धान मिलरों को नहीं दिया गया। इसी तरह 33 राइस मिलों ने धान के बदले भारतीय खाद्य निगम के पास समान मात्रा में चावल जमा नहीं कराया। लेखा परीक्षा के दौरान ऐसे 51 मामलों की पहचान की गई, जिनमें कुल 24,215.17 मीट्रिक टन कम चावल जमा हुआ। इस लापरवाही के कारण इन मिलों से ₹72.81 करोड़ की वसूली की जानी बाकी है।
83 गोदामों के भौतिक सत्यापन में भारी खामियां और प्रशासनिक विफलता
ऑडिट के दौरान 83 गोदामों के भौतिक सत्यापन में भारी खामियां पाई गईं। 92% गोदामों में बिजली की कमी थी। 100% गोदामों में धर्मकांटा, अग्निशमन उपकरण, सीसीटीवी और सुरक्षाकर्मियों का पूर्ण अभाव था। जेएसएफसीएल अप्रैल 2016 से मार्च 2022 के दौरान भारतीय खाद्य निगम से 88,716 मीट्रिक टन चावल और 29,429 मीट्रिक टन गेंहू नहीं उठा सका।
हालांकि कंपनी ने इन खाद्यान्न की लागत के लिए 32.50 करोड़ का अग्रिम भुगतान किया था, लेकिन उसने केवल 2.42 करोड़ की वापसी का दावा किया। इसी तरह वर्ष 2019-20 से 2022-23 के दौरान जेएसएफसीएल निदेशक मंडल की 16 बोर्ड बैठकें होना अनिवार्य थीं, वहां केवल छह हुईं। कंपनी के वार्षिक खाते 2010 से ही लंबित हैं, जिसके लिए कंपनी ने कर्मचारियों की कमी को जिम्मेदार ठहराया है।




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