Trump got into trouble after mistaking Iran for Venezuela Learn how two countries are completely different ईरान को वेनेजुएला समझने की गलती करके, फंस गए ट्रंप? जानिए कैसे पूरी तरह से अलग हैं दोनों देशों, International Hindi News - Hindustan
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ईरान को वेनेजुएला समझने की गलती करके, फंस गए ट्रंप? जानिए कैसे पूरी तरह से अलग हैं दोनों देशों

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला में मादुरो के हटाने के बाद सत्ता पर अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण स्थापित कर लिया था। उन्होंने यही प्रक्रिया ईरान में भी अपनाने की कोशिश की, लेकिन ईरान की तरफ से तगड़ा प्रतिरोध देखने को मिल रहा है।

Mon, 9 March 2026 07:30 PMUpendra Thapak लाइव हिन्दुस्तान
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ईरान को वेनेजुएला समझने की गलती करके, फंस गए ट्रंप? जानिए कैसे पूरी तरह से अलग हैं दोनों देशों

iran us war update: अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से वाशिंगटन की विदेश नीति लगातार आक्रामक नजर आई है। दूसरे कार्यकाल की शुरूआत से ही ट्रंप कनाडा, पनामा, वेनेजुएला, ग्रीनलैंड, ईरान, क्यूबा जैसे देशों को धमकी देते हुए नजर आए हैं। धमकी से आगे बढ़ते हुए 3 जनवरी को ट्रंप के निर्देश पर अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला में एक अभियान को अंजाम देते हुए वहां के राष्ट्रपति मादुरो को उठा लिया, इसके तुरंत बाद ही वेनेजुएला की सत्ता में जो नेता आए वह ट्रंप का समर्थन करने लगे। ट्रंप को अपनी सेना के इस अभियान पर काफी गर्व है, लेकिन इसी गर्व के चलते ट्रंप ईरान को भी वेनेजुएला समझ बैठे। मादुरो को पकड़ने के लगभग 2 महीने बाद अमेरिकी सेना ने ईरान पर हमला किया और खामेनेई को मार डाला, लेकिन वेनेजुएला की तरह ट्रंप को ईरान में सत्ता पर कोई अप्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं मिला।

वेनेजुएला में अपने अभियान से उत्साहित ट्रंप ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि वेनेजुएला में अमेरिका ने जो किया वह एक अच्छा उदाहरण है, जिसे तेहरान में भी अपनाया जा सकता है। ट्रंप ने यहां तक कहा कि अमेरिका को ईरान की सरकार के उत्तराधिकारी की नियुक्ति में शामिल होना होगा, जैसा कि हाल ही में उन्होंने वेनेजुएला में डेल्सी (वेनेजुएला की नई नेता) वाले मामले में किया।ट्रंप भले ही वेनेजुएला वाला ऐक्शन ईरान में भी दिखाना चाहते हों, लेकिन ईरान और वेनेजुएला में काफी अंतर है। यही कारण है कि वेनेजुएला में ट्रंप ने कुछ घंटों के अंदर सत्ता परिवर्तन करके अप्रत्यक्ष रूप से कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया, तो वहीं ईरान के साथ वह एक संभावित लंबे युद्ध में फंस गए हैं।

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कैसे अलग हैं दोनों देश?

दोनों देशों की अर्थव्यवस्था भले ही तेल के निर्यात पर केंद्रित हो, लेकिन इसके बाद भी दोनों देशों में काफी अंतर है। वेनेजुएला का क्षेत्रफल लगभग 3,40,000 वर्ग मील है और उसकी आबादी लगभग 2.8 करोड़ है, जबकि ईरान लगभग 6,26,000 वर्ग मील क्षेत्र में फैला है। लगभग दोगुना और उसकी आबादी 9.1 करोड़ है, जो वेनेजुएला से तीन गुना से भी ज्यादा है। दूसरे शब्दों में, ईरान कोई छोटा और संघर्षरत देश नहीं है। यह एक बड़ा, जनसंख्या वाला राष्ट्र है, जिसकी अर्थव्यवस्था प्रतिबंधों के बावजूद चल रही है और जिसके पीछे लगभग 50 वर्षों का क्रांतिकारी इतिहास है।

ईरान झुकने को तैयार नहीं

वेनेजुएला में जब अमेरिकी सेना ने हमला किया, तो मादुरो के उठाने के तुरंत बाद ही काराकस से बातचीत के संदेश आने शुरू हो गए। मादुरो की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज आगे आईं और लगभग तुरंत ही वाशिंगटन के साथ सहयोग करने लगीं। अपने नेता के पतन के तुरंत बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “मैं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को धन्यवाद देती हूं कि उनकी सरकार ने साथ मिलकर काम करने की उदार इच्छा दिखाई।” जानकारों के मुताबिक अमेरिका ने वेनेजुएला में काफी बेहतर पकड़ बनाए हुई थी, उसे मालूम था कि मादुरो के बाद सत्ता में कौन आएगा। क्योंकि मादुरो का तानाशाही शासन एक समूह पर केंद्रित था। ऐसे में अमेरिका ने जब मादुरो को उठाया, तो उसके बाद चीजें उसके मन मुताबिक ही हुईं।

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धार्मिक शासन से चलता है ईरान

वेनेजुएला में जो कुछ भी हुआ हो, लेकिन ईरान उस तरह काम नहीं करता है। काराकस की मादुरो सरकार जहां अपनी नीतियों के आधार पर राज करती थी, तो वहीं ईरान में एक धार्मिक शासन है, जिसे 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद लागू किया गया था, इसकी उम्र लगभग 50 साल है। खामेनेई ने अपने शासन के दौरान ईरान को संवैधानिक रूप से भी मजबूत बनाया। यहां पर एक सर्वोच्च नेता, एक चुना हुआ राष्ट्रपति, संसद और आईआरजीसी जैसी मजबूत फौज है, जो इस्लामिक सत्ता को बनाए हुए है।

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जनता ने भी नहीं दिया साथ

28 फरवरी को तेहरान पर हमला बोलने के बाद ट्रंप और नेतन्याहू इस उम्मीद में थे कि ईरान की जनता खामेनेई के शासन से त्रस्त होकर खुद ही विद्रोह पर उतारू हो जाएगी। लेकिन कुछ दिन पहले हुए विद्रोह में काफी लोगों के मारे जाने और खामेनेई की हत्या के बाद ईरान की जनता ने विद्रोह नहीं किया। ट्रंप और नेतन्याहू की तरफ से कई बार कहा भी गया कि वह मदद लेकर आ गए हैं, अब ईरान के लोगों पर है, लेकिन इसके बाद भी लोग खड़े नहीं हुए। विशेषज्ञों की मानें, तो इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका के प्रति अविश्वास है। कुछ महीनों से ईरान में मौजूद खामेनेई विरोधी लोग लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं, जिसकी वजह से हजारों लोगों के मारे जाने की बात सामने आई है। दूसरी बात, खामेनेई के मारे जाने से ईरान में अमेरिका के विरोध माहौल बन गया है। खामेनेई केवल ईरान के सुप्रीम लीडर नहीं थे, बल्कि शिया समुदाय के भी सबसे बड़े नेता थे। इस समय पर अगर कोई अमेरिका की तरफदारी करता है, तो ईरान में उसे देश विरोधी के साथ-साथ, इस्लाम का विरोधी भी बताया जा सकता है।

ट्रंप भले ही वेनेजुएला की स्थिति को ईरान में नहीं दोहरा पाए हों, लेकिन वह इजरायल के साथ मिलकर लगातार तेहरान को झुकाने को कोशिश में लगे हुए हैं। वेनेजुएला की तरफ से ट्रंप ने यहां पर भी उत्तराधिकारी के चयन में अपनी भूमिका की मांग की थी, हालांकि ईरान की तरफ से उसे भी पूरी तरह से ठुकरा दिया गया। एक तरफ वेनेजुएला है, जहां पर मादुरो की उपराष्ट्रपति डेल्सी ट्रंप के साथ मिलकर काम करने की बात कर रही हैं, वहीं, दूसरी तरफ ईरान है, जो खामेनेई की मौत के बाद ट्रंप और अमेरिका को देख लेने की धमकी दे रहा है।

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