कैसे ईरान ने एक छोटे से शाहेद ड्रोन ने अमेरिका की नाक में कर दिया दम, दुबई से बहरीन तक मचाई तबाही
ईरान के ऊपर इजरायल और अमेरिका द्वारा किए गए हमले के बाद तेहरान का सबसे बड़ा साथी उसका शाहेद ड्रोन ही बना है। इस ड्रोन सिस्टम के दम पर ईरान लगातार पश्चिम एशिया में मौजूद अमेरिका ठिकानों और उसके सहयोगी देशों को नुकसान पहुंचा रहा है।

Shahed Drone: अमेरिका और इजरायल द्वारा मिलकर ईरान के ऊपर किया गया हमला पूरे पश्चिम एशिया पर भारी पड़ रहा है। एकतरफ दुनिया की सबसे ताकतवर समझी जाने वाली अमेरिकी सेना और उसके साथ इजरायल की फौज है, तो वहीं दूसरी तरफ तेहरान में अपनी इस्लामिक सत्ता को बचाती ईरान की सैन्य शक्ति है। दोनों तरफ से एक-दूसरे के ऊपर लगातार हमले हो रहे हैं। यूएस और इजरायल अपनी मजबूत वायु सेना के दम पर ईरान में तबाही मचा रहे हैं, पहले ही हमले में सुप्रीम लीडर खामेनेई को खत्म कर देने के बाद अब इनका निशाना ईरान के सैन्य और तेल ठिकाने हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कह चुके हैं कि वह ईरान से बिना शर्त आत्मसमर्पण के अलावा कोई और समझौता नहीं करेंगे। दूसरी तरफ ईरान भी अमेरिका की नाक में दम करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। ईरान की वायुसेना भले ही तुलनात्मक रूप से अमेरिका और इजरायल से कमजोर हो, लेकिन उसका सबसे बड़ा सहारा बन रहे हैं 'शाहेद ड्रोन'।
शाहेद ड्रोन एक ऐसी एडवांस प्रणाली से बनाए गए हैं, जो कि आसानी से किसी भी उन्नत रडार को चकमा देते हुए, कम दूरी पर उड़ते हैं और अपने निशाने से टकराकर जोरदार धमाका करते हैं। ईरान के लिए इन ड्रोन्स की खासियत है कि यह उसका खुद का निर्माण है, इसके लिए उसे किसी दूसरे देश पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। तो चलिए, जानते हैं, ईरान के उस खतरनाक हथियार के बारे में, जिसने पश्चिमी एशिया में जीत का सपना लेकर आए अमेरिका की नाक में दम करके रखा है।

आत्मघाती हमलावर हैं ईरान के 'शाहेद ड्रोन'
ईरान की IRGC की हथियार विंग द्वारा बनाए गए इन आत्मघाती ड्रोन्स को 'लोइटरिंग म्यूनिशन' या 'आत्मघाती ड्रोन्स' कहा जाता है। इसका सबसे प्रसिद्ध और खतरनाक मॉडल शाहेद-136 है। इसके अलावा भी इसके कई मॉडल्स हैं, जिनको लेकर ईरान लगातार काम कर रहा है। पिछले वर्ष इजरायल के साथ हुए 12 दिन के युद्ध के बाद ईरान ने इन ड्रोन्स की उत्पादकता और उत्पादन पर लगातार काम किया है। ईरानी मीडिया के मुताबिक इस्लामिक सरकार के पास ऐसे ड्रोन्स की एक बहुत बड़ी संख्या मौजूद है।
क्या है इसकी विशेषता
ईरान सरकार को इस बात का अंदेशा था कि आज नहीं तो कल अमेरिका मिलकर उन पर हमला कर सकते हैं। उनका यह डर पिछले साल हकीकत में बदल गया। ऐसे में ईरान ने अपनी ताकत को नए युद्ध वॉरफेयर (ड्रोन सिस्टम) को बढ़ाने में लगाया। उसने शाहेद ड्रोन्स के अलग-अलग संस्करण बनाए, जो अलग-अलग काम करने में सक्षम थे। इसमें आत्मघाती शाहेद-136, इसका छोटा संस्करण शाहेद-131, निगरानी के लिए शाहेद-129 और लंबी दूरी तक मार करने के लिए शाहेद-149 गाजा को बनाया।
ईरान का यह सुसाइड ड्रोन 30 से 50 किलोग्राम विस्फोटक लेकर 180 से 200 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से 2500 किलोमीटर उड़ान भर सकता है। इसको जीपीएस के द्वारा कंट्रोल भी किया जा सकता है, जिसकी वजह से यह दुश्मनों को चकमा देकर अपने टारगेट को मार सकता है।

दशकों से पश्चिमी देशों के प्रतिबंध झेल रहे ईरान के लिए इस ड्रोन की सबसे बड़ी खासियत इसका सस्ता होना है। इन्हें मुख्यतः लकड़ी और कंपोजिट सामग्री से बनाया जाता है, जिसे किसी ट्रक या लॉन्चर से लॉन्च किया जा सकता है। इसके बाद इसे नेविगेट करते हुए लक्ष्य के पास भेजा जाता है, लक्ष्य से टकराता है, तो ठीक है, वरना दूसरे देश की किसी इमारत से टकराकर भी यह विस्फोट हो जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस ड्रोन की कीमत केवल 20 से 40 हजार डॉलर के बीच है, जबकि इन ड्रोन्स को रोकने के लिए अमेरिका और इजरायल को अपनी लाखों डॉलर की मिसाइलों को खर्च करना पड़ता है।
रूस, यूक्रेन में कर रहा इनका इस्तेमाल
ईरान की यह ड्रोन टेक्नोलॉजी इतनी कारगर है कि यूक्रेन के साथ जंग लड़ रहा दुनिया का बड़ा हथियार निर्माता देश रूस भी इसका इस्तेमाल कर रहा है। रूस के अलावा पश्चिमी एशिया में मौजूद ईरान के कुछ मिलिशिया ग्रुप भी इसका प्रयोग करते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यूक्रेन युद्ध में रूस ने इसका इस्तेमाल गेरन-2 नाम से किया है। हालांकि, यूक्रेन ने इन ड्रोन्स के खिलाफ अपनी क्षमता को विकसित कर लिया है। इसी वजह से अमेरिका की तरफ से भी यूक्रेन से इस मामले में डिफेंस सिस्टम मांगा गया है।
अमेरिका क्यों इनसे परेशान?
ईरान पर हमला करने से पहले अमेरिकी प्रशासन अपनी जीत को लेकर आश्वस्त था, लेकिन अब विशेषज्ञों के मुताबिक वह एक बार फिर से लंबे युद्ध में फंस गया है। ईरान अपने छोटे ड्रोन्स के सहारे अमेरिका के साथ-साथ उसके सहयोगी देशों को भी निशाना बना रहा है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका इन ड्रोन्स का सामना नहीं कर सकता या फिर इनसे अपनी रक्षा नहीं कर सकता। समस्या यह है कि अमेरिका को इन सस्ते ड्रोन्स को रोकने के लिए अपनी लाखों डॉलर की मिसाइलों को लॉन्च करना पड़ता है। इसके अलावा ईरान की तरफ से इन ड्रोन्स को दर्जनों की संख्या में लॉन्च किया जाता है। इससे इन्हें पकड़ना और भी ज्यादा मुश्किल हो जाता है। दूसरी तरफ यह ड्रोन्स अक्सर लो-एल्टीट्यूड (नीचे) में उड़ान भरते हैं, ऐसे में रडार को इनका पता लगाने और प्रतिक्रिया देने का समय कम मिलता है।अमेरिका का एयर डिफेंस सिस्टम मुख्य रूप से बैलिस्टिक मिसाइलों और जेट विमानों को मार गिराने के लिए बनाया गया है। इस तरह के आत्मघाती ड्रोन्स उनके लिए एक तरह का नया युद्ध मॉडल है।
अमेरिका ने यूक्रेन से मांगी मदद
पिछले 7 दिन के युद्ध में अमेरिका और इसके सहयोगी देश इस शाहेद ड्रोन से इतने परेशान हो चुके हैं कि उन्होंने इसको रोकने के लिए यूक्रेन की मदद मांगी है। इसकी पुष्टि स्वयं यूक्रेन राष्ट्रपति जेलेंस्की ने की थी। चूंकि, रूस के साथ युद्ध लड़ रहे यूक्रेन ने इन ड्रोन्स को रोकने के लिए नया डिफेंस सिस्टम तैयार किया है, इसलिए अमेरिका भी अब उसका सहयोग चाहता है। यूक्रेनी राष्ट्रपति ने कहा कि वह अमेरिका की मदद करने के लिए तैयार हैं।
दुबई से लेकर बहरीन तक तबाही
अमेरिकी हमले के बाद ईरान की तरफ से किए गए पलटवार में बहरीन, कुवैत, दुबई जैसे देशों के ऊपर इसी ड्रोन से हमला किया गया था। अभी भी ईरान की तरफ से दर्जनों की संख्या में इन ड्रोन्स को अमेरिका के सहयोगियों के ऊपर छोड़ा जा रहा है। ईरान के यह ड्रोन्स पश्चिमी एशिया में नए वॉरफेयर का एक उदाहरण कायम कर रहे हैं।
अमेरिका इस युद्ध में कुछ दिन की लड़ाई और सत्ता परिवर्तन करने के लिए आया था, लेकिन ईरान की क्षमता ने उसे लंबे युद्ध की तरफ धकेल दिया है। ऐसे में अब अमेरिका और उसके सहयोगी देश लगातार ईरान के ऊपर हमला बोल रहे हैं। ईरान भले ही अमेरिका की तुलना में एक ताकतवर देश न हो, लेकिन हल्के हथियारों की दम पर वह अमेरिका को एक बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है। लगातार चलता यह युद्ध अब अमेरिका के लिए नाक का सवाल बन गया है। ऐसे में अगर इन ड्रोन्स से निपटने के लिए अमेरिका ने कुछ नई योजना नहीं बनाई, तो मामला पलट भी सकता है।
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