Pradosh, प्रदोष व्रत: शाम में इतने बजे से करें शिव पूजा, जानें उपाय, विधि, शिव जी की आरती
Pradosh Time Budh Pradosh Vrat ka Muhurat 2026 : अप्रैल महीने का ये प्रदोष व्रत बुध प्रदोष व्रत कहलाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बुध प्रदोष का व्रत रखने से बुद्धि, वाणी और बिजनेस के मामले में सफलता का अनुभव होता है।

Pradosh Time Budh Pradosh Vrat ka Muhurat, बुध प्रदोष व्रत 2026 : हर महीने में प्रदोष का व्रत रखा जाता है, जो भगवान शिव को समर्पित है। प्रदोष व्रत की पूजा विधि-विधान के साथ शाम के समय की जाती है। प्रदोष का व्रत भगवान शिव की आराधना को समर्पित है। इस दिन संध्या के समय पूजा करने का विधान है। वैशाख महीने में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखा जाएगा। अप्रैल महीने का ये प्रदोष व्रत बुध प्रदोष व्रत कहलाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बुध प्रदोष का व्रत रखने से बुद्धि, वाणी और बिजनेस के मामले में सफलता का अनुभव होता है। बुध प्रदोष का व्रत स्टूडेंट्स और बिजनेसमैन के लिए बेहद फलदायक माना जाता है। आइए जानते हैं बुध प्रदोष व्रत के दिन का शुभ मुहूर्त, उपाय और शिव जी की आरती-
कब है बुध प्रदोष का व्रत?
हिंदू पंचांग के अनुसार, 15 अप्रैल को रात में 12:12 मिनट से त्रयोदशी तिथि शुरू होगी, जिसका समापन 15 अप्रैल को 10:31 मिनट पर होगा। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, 15 अप्रैल के दिन बुध प्रदोष का व्रत रखा जाएगा।
बुध प्रदोष का शुभ मुहूर्त: कब करें बुध प्रदोष पूजा
ब्रह्म मुहूर्त: 04:27 से 05:11 (सुबह)
विजय मुहूर्त: 02:30 से 03:21 (दोपहर)
गोधूलि मुहूर्त: 06:46 से 07:08 (शाम)
अमृत काल: 07:37 से 09:10 (सुबह)
निशिता मुहूर्त: 11:59 से 12:43 मिनट, अप्रैल 16 (रात)
प्रदोष व्रत: शाम में इतने बजे से करें शिव पूजा
बुध प्रदोष व्रत के दिन शाम में 06:47 मिनट से रात में 09:00 मिनट तक पूजा का शुभ मुहूर्त रहेगा, जिसकी अवधि - 02 घंटे 14 मिनट्स रहेगी।
बुध प्रदोष की पूजा विधि
स्नान कर साफ वस्त्र धारण कर लें। घर में गोधूलि बेला में दीपक जलाएं। फिर शिव मंदिर में भगवान शिव का अभिषेक करें और शिव परिवार की विधिवत पूजा-अर्चना करें। अब बुध प्रदोष व्रत की कथा सुनें। फिर घी के दीपक से पूरी श्रद्धा के साथ भगवान शिव की आरती करें। अंत में ओम नमः शिवाय का जाप करें और क्षमा प्रार्थना भी करें।
शिव जी की आरती
जय शिव ओंकारा ॐ जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव…॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव…॥
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव…॥
अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी॥ ॐ जय शिव…॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव…॥
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ॐ जय शिव…॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव…॥
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी॥ ॐ जय शिव…॥
त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव…॥
जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा|
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा…॥
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।




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