माता-पिता और गुरु के ऋणों से कैसे मुक्त हों? जानिए प्रेमानंद महाराज का जवाब
एक भक्त ने प्रेमानंद महाराज जी से सवाल पूछा कि इसी जन्म में माता-पिता और गुरु के ऋण से मुक्त होने के क्या उपाय है? ताकि सभी ऋण उतरने से और नाम जप के प्रभाव से दोबारा जन्म ना लेना पड़े। चलिए जानते हैं कि प्रेमानंद महाराज जी ने क्या जवाब दिया।

वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनके दर्शन के लिए लोगों की लाइनें लगी रहती हैं। भक्त महाराज जी का दर्शन करते ही हैं, साथ में उनसे सवाल भी पूछते हैं। ऐसे ही एक भक्त ने प्रेमानंद महाराज जी से सवाल पूछा कि इसी जन्म में माता-पिता और गुरु के ऋण से मुक्त होने के क्या उपाय है? ताकि सभी ऋण उतरने से और नाम जप के प्रभाव से दोबारा जन्म ना लेना पड़े। चलिए जानते हैं कि प्रेमानंद महाराज जी ने क्या जवाब दिया।
भगवान की प्राप्ति
महाराज जी कहते हैं कि नाम जप करते हुए जब हमारा भगवत साक्षात्कार हो जाता है। उन्होंने बताया कि एकादशी स्कंध में भागवत में लिखा हुआ है उद्धव जी को भगवान उपदेश करते हैं कि जिसको मेरी प्राप्ति हो जाती है, तो वह समस्त ऋणों से मुक्त हो जाता है। भगवान की प्राप्ति होते ही ऋषि ऋण, मातृ-पितृ, देव, गुरु ऋण सभी ऋणों से मुक्त हो जाता है। पर भगवान की प्राप्ति होनी चाहिए।
कलयुग में कैसे हो भगवान की प्राप्ति?
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि भगवान की प्राप्ति का कलयुग में सहज और सरल उपाय है- नाम जप। तो नाम का आधार लेकर निरंतर नाम जप करें, तो भगवत प्राप्ति होगी। वो कहते हैं कि निरंतर नाम जप तभी होगा, जब हमारा आहार पवित्र होगा, हमारे आचरण ठीक होंगे। आचरण गलत हो, नाम गलत हो तो नाम घसीटने पर भी नहीं चलता, मन नहीं लगता है।
इन बातों का रखें ध्यान
प्रेमानंद महाराज जी आगे कहते हैं कि अगर भोजन सही है, आचरण पवित्र है और कहीं भगवान की कृपा से वातावरण पवित्र मिल जाए, तो इससे भगवत प्राप्ति में ज्यादा लाभ प्राप्त होता है। हमारा भजन फिर ज्यादा बढ़ता है। हालांकि यह सबको नहीं मिलता है। आचरण पवित्र हो सकता है, भोजन पवित्र कर सकते हैं और नाम जप किया जा सकता है, लेकिन वातावरण भगवान देते हैं। वो कहते हैं कि वृंदावन में रहना ही अपने आप में भजन हैं।
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि अगर हमारा आचरण, भोजन और संग ठीक है, तो नाम जप बढ़ता है। लेकिन जब श्वास श्वास पर कई नाम जप होने लगते हैं, तो भगवत प्राप्ति की योग्यता आने लगती है। वो कहते हैं कि निरंतर हर श्वास में कई नाम जप तो हमारा चित भगवान की तरफ आकर्षित होने लगता है और जहां मन भगवान की तरफ आकर्षित हुआ फिर भजन स्वभाविक हो जाता है।
डिस्क्लेमरः इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।




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