कमाई का कितना हिस्सा दान या धर्म में लगाना चाहिए? जानें प्रेमानंद महाराज का जवाब
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि दान एक पुण्य क्रिया है। जैसे शुभ और अशुभ दो प्रकार के कर्म है। दान एक शुभ कर्म है, जिसका फल सांसारिक सुख है। महाराज जी कहते हैं कि बहुत उच्च कोटि का दान हुआ, तो स्वर्ग सुख है। लेकिन भगवत प्राप्ति नहीं करा सकता है। भगवत प्राप्ति तो भजन से होगी।

वृंदावन वाले प्रेमानंद महाराज के प्रवचन का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल होता है। लोग इन्हें देखते हैं और इनकी बातों का अनुसरण भी करते हैं। संत प्रेमानंद महाराज के दर्शन के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। कुछ लोग महाराज जी से सवाल भी पूछते हैं। ऐसे ही एक भक्त ने प्रेमानंद महाराज जी से पूछा कि एक गृहस्थ को अपनी कमाई का कितना प्रतिशत दान और पुण्य में लगाना चाहिए? चलिए जानते हैं कि इसका जवाब प्रेमानंद महाराज ने क्या दिया?
कमाई का 10 प्रतिशत करें दान
प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि एक गृहस्थ को अपनी कमाई का 10 प्रतिशत दान या पुण्य में लागना लगाना चाहिए। महाराज जी कहते हैं कि 100 रुपया में 90 रुपये से अपने परिवार का भरण-पोषण करना चाहिए। संत सेवा, गऊ सेवा, असहाय सेवा, नाथ सेवा, पशु-पक्षी की सेवा, ऐसा जहां कभी भी है, वहां 10 रुपये खर्चा कर देना चाहिए।
महाराज जी आगे कहते हैं कि धर्म से कमाए हुए पैसों का इन चीजों में लगाना चाहिए, ना कि पाप कर्म की कमाई का। धर्म से कमाए हुए धन का 10 प्रतिशत हिस्सा दान-पुण्य में लगाना चाहिए। इसका पुण्य भी बनेगा और परलोक भी बनेगा। उन्होंने कहा कि इतना दान करने से भगवत कृपा होगी और भजन बनने लगेगा उसका।
क्या दान से कल्याण हो सकता है?
इसके अलावा एक भक्त ने महाराज जी से पूछा कि यदि नाम जप नहीं हो पा रहा है, तो क्य दान से कल्याण हो सकता है। इसका जवाब देते हुए प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि नहीं, सिर्फ दान से कल्याण नहीं होता है। वो कहते हैं कि दान एक पुण्य क्रिया है। जैसे शुभ और अशुभ दो प्रकार के कर्म है। दान एक शुभ कर्म है, जिसका फल सांसारिक सुख है। महाराज जी कहते हैं कि बहुत उच्च कोटि का दान हुआ, तो स्वर्ग सुख है। लेकिन भगवत प्राप्ति नहीं करा सकता है। भगवत प्राप्ति तो भजन से होगी।
भगवत प्राप्ति कैसे होगी?
महाराज जी कहते हैं कि बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल। बिनु हरि भजन न तव तरिअ यह सिद्धांत अपेल।। ये अटल सिद्धांत है। जब तक नाम जप नहीं करोगे, तब तक संसार से मुक्त नहीं हो सकते हो। तुम यज्ञ करो, दान करो, पुण्य करो, इसका फल तुम्हें मिलेगा। लेकिन भगवत प्राप्ति भजन से होती है।
संतों का संग
महाराज जी कहते हैं कि भगवान के चरणों के जो प्रेमी संत जन हैं, उनका संग करना प्रथम सोपान है। इससे हमारी बुद्धि शुद्ध हो जाती है। फिर हम जब भजन करने लगते हैं, तो उसमें रति हो जाती है और हमारा कल्याण हो जाता है। महाराज जी कहते हैं कि अगर दान-पुण्य से भगवति प्राप्ति होती, तो बड़े-बड़े धनी लोग ना दान करके भगवान को खरीद लेते।




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