ममता शर्मसार! अपनी ही बेटी का यौन शोषण कराने वाली आरोपी मां की बेल अर्जी नामंजूर, उत्तराखंड HC का कड़ा रुख
कोर्ट ने कहा है कि मामला गंभीर है तो ऐसे में आरोपी कितने समय से कैद में है इसे जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता। वर्तमान में आरोपी महिला जेल में ही रहेगी।

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक दिल दहला देने वाले मामले में अपनी ही नाबालिग बेटी के यौन शोषण की कथित साजिश रचने वाली मां को राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। आरोपी महिला की ओर से जमानत याचिका दायर की गई थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी पर लगे आरोप अत्यंत गंभीर हैं और यदि उसे इस स्तर पर रिहा किया जाता है, तो वह गवाहों को प्रभावित कर सकती है, जिससे न्याय प्रक्रिया बाधित होने की आशंका है। कोर्ट ने कहा है कि मामला गंभीर है तो ऐसे में आरोपी कितने समय से कैद में है इसे जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता। वर्तमान में आरोपी महिला जेल में ही रहेगी।
लड़की के पिता ने दर्ज करवाई है शिकायत
महिला पर आरोप है कि उसने अपनी 13 वर्षीय बेटी को एक सह-आरोपी के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया। मामले में जस्टिस आलोक मेहरा वाली सिंगल बेंच ने गुरुवार को आरोपों की गंभीरता और बच्ची पर पड़ने वाले असर का हवाला देते हुए महिला की जमानत याचिका को खारिज कर दिया। पीड़िता के पिता ने हरिद्वार में इस मामले की शिकायत दर्ज की हुई है। पिता ने आरोप लगाया है कि मां ने बेटी को अल्कोहल पीने और अपराध को अंजाम देने के लिए अलग-अलग शहरों में जाने के लिए मजबूर किया।
आरोपी ने ये तर्क दिया
अभियोजन पक्ष ने कहा कि नाबालिग को हरिद्वार, आगरा, गाजियाबाद और वृंदावन ले जाया गया, जहां उसका यौन शोषण जारी रहा। वहीं आरोपी ने तर्क दिया कि उस दौरान पीड़िता एक रेजिडेंशियल स्कूल में पढ़ रही थी और साथ ही यह भी कहा कि एफआईआर दर्ज कराने में पांच महीने की देरी हुई है। बचाव पक्ष का कहना है कि इन विरोधाभासों की वजह से पुलिस की कहानी पर शक होता है।
हालांकि राज्य सरकार ने अर्जी का विरोध किया। सुनवाई के दौरान बेंच ने मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए गहरी नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि मामले में विसंगतियों और देरी के लिए सुनवाई ट्रायल कोर्ट में होनी चाहिए न कि जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान।
'जमानत का आधार नहीं बन सकता'
जस्टिस मेहरा ने टिप्पणी की कि मां भले ही जून 2025 से हिरासत में है, लेकिन इतने गंभीर मामलों में जेल में बिताया गया समय जमानत का आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि रिहा होने पर आरोपी द्वारा गवाहों को प्रभावित करने का जोखिम है।
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