कौन है रोहित तिवारी? जो तय करता था कि कहां और कितने में होगा किडनी ट्रांसप्लांट
यूपी का किडनी कांड लगातार सुर्खियों में है। पुलिस ने सोमवार को इस कांड के मास्टरमाइंड रोहित तिवारी को गिरफ्तार किया। रोहित तिवारी ही वो शख्स है जो यह तय करता था कि किसका कहां, कब और कितने में किडनी ट्रांसप्लांट कराया जाएगा। रोहित ने कबूल किया कि उसने 30 से ज्यादा किडनी ट्रांसप्लांट कराए थे।
UP News: रोहित तिवारी, यूपी किडनी कांड का मास्टरमाइंड है। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है। रोहित ने पुलिस के सामने कई सनसनीखेज खुलासे किए हैं। पुलिस की पूछताछ में उसने कानपुर में 30 से ज्यादा किडनी ट्रांसप्लांट कराने की बात कबूल की है। यह भी बताया कि आहूजा अस्पताल में सात, मेडीलाइफ अस्पताल में दो और आरोही में एक ऑपरेशन कराया है। कब-कहां-कितने में ट्रांसप्लांट होगा और कौन करेगा यह रोहित ही तय करता था। एक केस के उसे 25 से 30 लाख रुपये मिलते थे। विदेशी नागरिक के ऑपरेशन में पैसा अधिक मिलता था। किडनी ट्रांसप्लांट के दौरान वह भी ओटी में रहता था। पुलिस को उसने बताया कि वर्ष 2018 से इस काम में लगा था। बता दें रोहित, अफजल और अली पर पुलिस ने 25-25 हजार का इनाम घोषित किया था।
डीसीपी एसएम कासिम आबिदी ने बताया कि रोहित तिवारी हरदोई के बिलग्राम गंगाधाम का रहने वाला है। वर्तमान में वह नयाखंड इंद्रापुरम कौशांबी गाजियाबाद के फ्लैट में महिला मित्र के साथ रह रहा था। बिलग्राम के एसडी स्कूल से उसने 2008 में 12वीं की पास की। वह पांच भाई और दो बहन हैं। बहनों की शादी हो चुकी है। पिता नहीं हैं। इंटर करने के बाद वह बेरोजगार था तो गांव का अमित उसे गाजियाबाद ले गया। यहां पॉली केबल बनाने वाली फैक्ट्री डिक्शन में काम किया। इसके बाद डेकी और फिर बारको में काम किया। बारको में रिंकू नाम के युवक से मुलाकात हुई। रिंकू ने अपने जीजा से मुलाकात कराकर वर्ष 2016 में मेरठ भेज दिया।
पहली बार डॉ. वैभव मुद्गल से मुलाकात
डीसीपी के मुताबिक यहीं उसकी पहली बार डॉ. वैभव मुद्गल से मुलाकात हुई। वह डॉ. वैभव के मधुकर क्लीनिक में रिसेप्शन का काम देखने लगा। यहीं से अल्फा अस्पताल के मालिक डॉ. अमित के संपर्क में आया और 2018 से वहां वार्ड ब्वाय का काम करने लगा। डीसीपी ने बताया कि डॉ. वैभव भी अल्फा अस्पताल में पार्टनर है। रोहित ने बताया कि अल्फा अस्पताल में भी ऑपरेशन हुआ है, लेकिन उसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं बता सकता।
इसी बीच डॉ. वैभव और डॉ.अमित के बीच विवाद हो गया तो उन लोगों ने काम बंद कर दिया। इसके बाद रोहित डॉ. वैभव के साथ आ गया। वैभव ने उसे नए विकल्प की तलाश में वर्ष 2019 में कानपुर भेजा। कानपुर में उसकी मुलाकात प्रयागराज के नवीन पांडेय से हुई। दोनों ने मिलकर किडनी ट्रांसप्लांट के लिए कई अस्पताल सेलेक्ट किए थे। रोहित ने शिवम के साथ वर्ष 2022 में पहला अस्पताल देखा था लेकिन उस पर बात नहीं बनी। इसके बाद ऐसे अस्पतालों को खोजने में जुट गए, जहां मरीजों का टोटा रहता था।
साउथ अफ्रीका की अरेबिका को नवीन लाया
डीसीपी ने बताया कि जब रोहित से साउथ अफ्रीका की अरेबिका के ऑपरेशन के बारे में पूछताछ की गई तो उसने कहा कि नवीन उसे लाया था। उसने सीधे कोई डील नहीं की। एजेंट के साथ ही डील थी। इस ऑपरेशन में उसे 20 लाख रुपये मिले थे। मेडीलाइफ में ऑपरेशन के बाद एक महिला की हालत बिगड़ने और दिल्ली के अस्पताल में मौत होने की बात सामने आई थी। पुलिस के मुताबिक रोहित इसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं बता सका।
पैसे लेकर फरार हो गया था एक एजेंट
डीसीपी के मुताबिक अमृतसर के जिन सरदार जी का वीडियो वायरल हुआ था, उन्हें गोपाल नाम का एजेंट लाया था। उसने रोहित से संपर्क किया लेकिन डोनर न होने के चलते मना कर दिया था। इसके बाद वह पैसा लेकर फरार हो गया।
झोलाछाप डॉक्टरों तक ने किए किडनी ट्रांसप्लांट
किडनी ट्रांसप्लांट की सर्जरी जटिल प्रक्रिया है। यह फोड़ा फुंसी का ऑपरेशन नहीं है कि कोई भी कर दे। बावजूद इसके किडनी के काले कारोबार में पुलिस की जांच अब तक यही इशारा कर रही है कि कानपुर में हुए ट्रांसप्लांट झोलाछापों ने कर दिए। मास्टरमाइंड रोहित और पुलिस के मुताबिक ओटी मैनेजर मुद्स्सर अली सिद्दीकी ने सभी ऑपरेशन किए लेकिन बड़ा सवाल है कि आखिर कैसे। पुलिस सूत्रों के मुताबिक उसने दिल्ली के अस्पतालों में इस सर्जरी का प्रशिक्षण लिया। लेकिन इस बात पर भी विश्वास करना आसान नहीं है कि महज प्रशिक्षण लेकर कोई किडनी ट्रांसप्लांट में पारंगत हो जाए।
कोई पहलू तो ऐसा है जो छिपाया जा रहा
मेडिकल जगत में चर्चा गर्म है कि कोई पहलू तो ऐसा है जो या तो छिपा है या फिर छिपाया जा रहा है। बहरहाल इस कड़ी के दो खिलाड़ी मुद्स्सर अली सिद्दीकी उर्फ डॉ. अली और अफजल अभी तक फरार हैं। इनकी गिरफ्तारी के साथ ही मामले में छिपा सच सामने आने की संभावना है। जानकारी सामने आई थी कि रोहित एनेस्थीशिया देने का काम करता था। हालांकि पुलिस के मुताबिक पूछताछ में उसने इस बात से इंकार किया है। डीसीपी पश्चिम कासिम आबिदी के मुताबिक, रोहित डॉक्टर नहीं बल्कि 12वीं पास है। हरदोई के बिलग्राम से 2008 में उसने 12वीं पास किया है। वह बेहद शातिर है। पत्नी को छोड़कर महिला दोस्त के साथ रहता है। पुलिस कस्टडी रिमांड ले फिर पूछताछ करेगी।
आशिकी निभाने में पकड़ा गया रोहित
डीसीपी ने बताया कि रोहित की आदतों से उसकी पत्नी परेशान रहती है। इससे वह कन्नौज में बच्चे के साथ रहती है। रोहित गाजियाबाद के इंद्रापुरम में अपनी गर्लफ्रैंड संग रहता है। जब आहूजा अस्पताल में छापा पड़ा, रोहित कानपुर में ही था। छापा पड़ते वह भाग निकला। उसने दोनों मोबाइल बैराज से गंगा में फेंक दिए। पुलिस ने नंबरों की जांच की तो उसके मोबाइल पर एक भी रेगुलर कॉल नहीं मिली है। फरारी के दौरान वह दूसरे नंबरों से अपनी गर्लफ्रैंड को फोन करता था। इन्हीं नंबरों को ट्रेस करते हुए पुलिस उस तक पहुंची।
एनेस्थीसिया राजेश-कुलदीप देते अली करता मरीजों का ऑपरेशन
डीसीपी के मुताबिक रोहित ने पूछताछ में बताया कि मरीजों को एनेस्थीसिया वह नहीं बल्कि यह गाजियाबाद के ओटी मैनेजर राजेश और ओटी संचालक कुलदीप देते थे। ऑपरेशन के दौरान वह ओटी में आता-जाता रहता था। डीसीपी के मुताबिक जेल जाने वाले अधिकतर लोगों ने रोहित के ही एनेस्थीसिया देने की बात कही है। जेल गए शिवम समेत अन्य लोगों ने बताया था कि मुद्स्सर अली सिद्दीकी उर्फ डॉ. अली ऑपरेशन करता था। रोहित ने भी यही बताया कि अली ही ऑपरेशन करता था। उसने पुलिस को बताया कि कानपुर में सभी ऑपरेशन अली करता था। उसके दिल्ली के एक बड़े अस्पताल से ट्रेनिंग लेकर आने की बात पुलिस को पता चली है। डोनर की किडनी निकालकर उसे अली बर्फ की सिल्ली पर रख देता था, जहां वह सुरक्षित रहती थी। डीसीपी ने बताया कि रोहित इतना शातिर था कि वह चार सिम रखता था। इसे लेकर एक बार आहूजा अस्पताल के संचालक ने टोका भी तो रोहित बोला, आपको कॉल करने की जरूरत नहीं है। मैं खुद कॉल करूंगा।
खुद सीधे मरीज के संपर्क में नहीं रहता था , एजेंट मिलवाते थे मरीज
डीसीपी के मुताबिक रोहित अब तक 30 से ज्यादा ऑपरेशन करा चुका है। यह बात उसने पूछताछ में स्वीकार की है। कानपुर में शिवम और प्रयागराज में नवीन पांडेय उसके राइट हैंड थे। रोहित ने ऐसी व्यवस्था बनाई थी कि वह सीधे मरीज के संपर्क में नहीं रहता था। मरीज एजेंट शिवम और नवीन लाते थे, वह टेलीग्राम के माध्यम से डोनर ढूंढता था। ऑपरेशन कब और कहां होगा यह रोहित तय करता था। इसके लिए कौन से डॉक्टरों की टीम होगी, किस संसाधन से कौन आएगा और जाएगा, ओटी को सजाने समेत अन्य व्यवस्था भी उसी की जिम्मेदारी थी। मरीज के हिसाब से वह पैकेज तय करता था। मुजफ्फरनगर की पारुल तोमर का किडनी ट्रांसप्लांट 60 लाख रुपये में तय था। ऑपरेशन के बाद उसे 30 लाख रुपये मिले थे। इन्हीं रुपयों से उसने ऑपरेशन टीम में शामिल अली समेत अन्य लोगों का भुगतान किया था और लॉजिस्टिक (टीम के आवागमन की व्यवस्था) का अरेंजमेंट किया था। पारुल के ऑपरेशन के बाद मिले लाखों रुपयों को गोवा के कसीनों में उड़ा दिए थे। वह लोग कुल्लू-मनाली भी घूमने गए थे।




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