डिग्री कॉलेजों में भर्ती हुए प्राचार्य नौकरी छोड़कर भागे, एडेड में 298 में से सिर्फ 100 बचे
उत्तर प्रदेश के एडेड डिग्री कॉलेजों में प्राचार्यों का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। 2021 में भर्ती हुए 298 प्राचार्यों में से अब केवल 100 ही बचे हैं। बाकी इस्तीफा देकर पुराने संस्थानों में चले गए। इसका मुख्य कारण प्राचार्य और प्रोफेसर के वेतनमान का समान होना, प्रबंधतंत्र से विवाद व प्रशासनिक तनाव है।

UP News: उत्तर प्रदेश में अशासकीय सहायता प्राप्त (एडेड) डिग्री कॉलेजों में प्राचार्य पद पर भर्ती हुए शिक्षक नौकरी छोड़कर पुराने संस्थान लौट रहे हैं। 298 प्राचार्यों की भर्ती हुई थी और केवल 100 प्राचार्य ही अब बचे हैं। ज्यादातर एडेड डिग्री कॉलेज कार्यवाहक प्राचार्यों के भरोसे चलाए जा रहे हैं।एडेड डिग्री कॉलेजों में अक्तूबर 2020 में 298 प्राचार्यों की भर्ती के लिए लिखित परीक्षा हुई। मार्च 2021 में इंटरव्यू और अक्तूबर 2021 में चयनित प्राचार्यों को तैनाती दे दी गई। उस समय तक कॉलेजों में शिक्षक अधिकतम प्रोन्नति पाकर एसोसिएट प्रोफेसर बन सकते थे। प्राचार्य का पद प्रोफेसर के बराबर था।
कुछ महीने बाद नवंबर 2021 में कॉलेजों में प्रोफेसर पद आ गया और यह प्राचार्यों के समतुल्य हो गया। ऐसे में प्राचार्य बने शिक्षकों को कोई आर्थिक लाभ नहीं रहा और प्रबंधतंत्र के अधीन रहकर झंझट ज्यादा लगा। उसके बाद आगरा कॉलेज, मेरठ कॉलेज और लखनऊ के डीएवी व केकेवी सहित एक-एक कर कॉलेजों से प्राचार्य अपने-अपने पुराने संस्थान लौट गए और वहां प्रोफेसर पद पर कार्य करने लगे। कई जगह प्राचार्यों का प्रबंधतंत्र से तालमेल नहीं बैठ पाया। जिसके कारण उन्हें लगा कि प्राचार्य बनने से कोई आर्थिक लाभ नहीं बल्कि उन्हें नुकसान अधिक है।
उप्र शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ. मौलीन्दु मिश्रा कहते हैं कि अर्हता पूरी करने वाले शिक्षकों में से जो सबसे कम उम्र का हो उसे प्राचार्य बनाया जाए तो वह कॉलेजों में रूकेंगे। वरना जिनके रिटायरमेंट में कम समय है, वह क्यों झंझट मोल लेंगे। फिलहाल उच्च शिक्षा विभाग पदों को भरने के लिए मंथन कर रहा है।
अब जो भर्ती होगी वह पांच वर्ष के लिए ही
वर्ष 2020 में जो प्राचार्यों की भर्ती हुई वह पुराने नियमों से हुई। उसमें पांच वर्ष का कार्यकाल नहीं था। अब यूपी में जो आगे भर्ती होगी उसे यूजीसी के नए रेग्युलेशन के तहत भरना होगा। ऐसे में प्राचार्य का कार्यकाल पांच वर्ष होगा और अगर प्रबंधतंत्र चाहेगा तो पांच साल और बढ़ा सकता है। ऐसे में आगे प्राचार्य पद भर पाएंगे कहना कठिन है। लुआक्टा के अध्यक्ष डॉ. मनोज पांडेय कहते हैं कि प्राचार्य पद को वरिष्ठता के आधार पर रोटेशन से भरा जाए तो झंझट खत्म हो सकता है। फिर भर्ती के लिए आयोग को बार-बार परीक्षा नहीं करानी होगी।
प्रबंधतंत्र की नियमित प्राचार्यों से नहीं पटी
ऐसे में यूपी में कुल 331 एडेड डिग्री कॉलेजों में से ज्यादातर कार्यवाहक प्राचार्यों के भरोसे चल रहे हैं। नियमित प्राचार्य को प्रबंधतंत्र भी नहीं पसंद करते। वह अपने कॉलेज के वरिष्ठ शिक्षक को ही प्राचार्य बना कर काम लेना पसंद करते हैं। यही कारण है कि कई कॉलेजों में प्रबंधतंत्र से विवाद के बाद प्राचार्य पद से त्यागपत्र देकर शिक्षक अपने पुराने संस्थान चले गए। पहले कई कॉलेजों में प्राचार्यों को बंगला व गाड़ी भी मिलती थी। अब वह सुविधा भी नहीं है।
तनाव अधिक और आर्थिक लाभ कुछ नहीं
प्रशासनिक पद पर रहते उनके ऊपर हमेशा जांच की तलवार लटकती रहती है। अगर प्रबंधतंत्र उनसे नाराज है तो वह टिक नहीं पाते। कुछ कॉलेजों में शिक्षक आपसी गुटबाजी कर बाहर से आए प्राचार्य को टिकने नहीं दिया गया। यही कारण है कि अब इस पद पर शिक्षक तनाव अधिक देख रहे हैं और लाभ कम।




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