यूपी चुनाव से चंद महीने पहले योगी कैबिनेट विस्तार के मायने, भाजपा की क्या है रणनीति
योगी कैबिनेट विस्तार से यह सवाल उठ रहा है कि आखिर विधानसभा चुनाव में कुछ महीने ही बाकी रह जाने पर कैबिनेट विस्तार की जरूरत क्यों पड़ी? जानकारों का कहना है कि कैबिनेट विस्तार के जरिए BJP जातिगत समीकरणों को साधने की कोशिश में है जिनका सियासी फायदा मिल सकता है।

उत्तर प्रदेश में अगले साल (2027) होने वाले चुनाव में अब जब चंद महीने ही रह गए हैं तो रविवार को योगी कैबिनेट का बहुप्रतीक्षित विस्तार हो ही गया। विपक्ष और खासकर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव चुनाव से कुछ महीने पहले हुए योगी कैबिनेट विस्तार पर कई सवाल उठा रहे हैं। वहीं बीजेपी के रणनीतिकार इसे बेहद जरूरी और अगले साल होने वाले चुनावों के मद्देनजर बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं। यहां एक दिलचस्प बात शायद आपको याद न हो लेकिन उत्तर प्रदेश में यह पहला मौका नहीं है जब चुनाव के कुछ समय पहले बीजेपी ने कैबिनेट विस्तार किया है। 2022 में हुए विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले 2021 के सितम्बर महीने में भी भाजपा ने एक कैबिनेट विस्तार किया था। इस बार जहां योगी कैबिनेट में छह नए चेहरों को एंट्री देने के साथ दो सदस्यों का प्रमोशन कर राज्य मंत्री से स्वतंत्र प्रभार बनाया गया है वहीं सितम्बर 2021 में हुए कैबिनेट विस्तार में सात चेहरों को शामिल किया गया था। उनमें एक कैबिनेट और छह राज्य मंत्री शामिल थे। उसी विस्तार में जितिन प्रसाद यूपी में मंत्री बने थे।
तब भी यह सवाल उठा था कि आखिर विधानसभा चुनाव में कुछ महीने ही बाकी रह जाने पर कैबिनेट विस्तार की जरूरत क्यों पड़ी? इस बार भी यह सवाल उठ रहा है और जानकार उस बार दिए गए जवाब को ही दुहरा रहे हैं कि कैबिनेट विस्तार के जरिए बीजेपी ने जातिगत समीकरणों को साधने की कोशिश में है जिनका सियासी फायदा मिल सकता है। इस बार भी कैबिनेट में कुछ ऐसा ही किया गया है। कैबिनेट में शामिल किए गए नामों में भूपेंद्र चौधरी और मनोज पांडेय को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। वहीं हंसराज विश्वकर्मा , कृष्णा पासवान , सुरेंद्र दिलेर और कैलाश राजपूत को राज्यमंत्री बनाया गया है। इसके साथ ही राज्यमंत्री रहे सोमेंद्र तोमर और अजीत पाल को राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाया गया है। इनमें सबसे वरिष्ठ मंत्री के तौर पर भूपेंद्र चौधरी को कैबिनेट मंत्री पद की शपथ दिलाई गई है। भूपेंद्र चौधरी जाट समाज में अच्छी पकड़ रखते हैं। वह पहले भी योगी सरकार में रह चुके हैं। इसके बाद उन्हें यूपी भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। अब एक बार फिर उनकी सरकार में वापसी हुई है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाजपा नेतृत्व मिशन 2027 की बिसात पर अपने उन रणनीतिक चेहरों को फिर से मुख्य भूमिका में ला रहा है जो क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों की काट ढूंढने में माहिर है। इस पूरी स्किप्ट के केंद्र में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी हैं जिनकी कैबिनेट में वापसी की संभावनाओं ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सियासी पारे को बढ़ा दिया है। वहीं योगी 2.0 के दूसरे कैबिनेट विस्तार में कैबिनेट मंत्री बनाए गए मनोज पांडेय को अवध और पूर्वांचल के क्षेत्र में बड़े ब्राह्मण नेता के तौर पर देखा जाता है। रायबरेली की ऊंचाहार सीट से 2022 का चुनाव सपा के टिकट पर जीतने वाले मनोज पांडेय यूपी विधानसभा में सपा के मुख्य सचेतक रह चुके हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य द्वारा रामचरित मानस पर की गई विवादित टिप्पणियों के बाद उन्होंने पाला बदल लिया था। उन्हें योगी कैबिनेट का हिस्सा बनाकर बीजेपी ने ब्राह्मण समाज को संदेश देने की कोशिश की है।
योगी कैबिनेट के इस विस्तार में खागा विधायक कृष्णा पासवान ने भी मंत्री पद की शपथ ली। दोआबा के राजनीतिक इतिहास में वह पहली महिला विधायक हैं जिन्हें मंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ। खागा सुरक्षित सीट से लगातार तीन बार विधायक कृष्णा पासवान को मंत्रिमंडल में शामिल कर बीजेपी ने दलित और पिछड़े वर्ग के वोटरों को संदेश देने की कोशिश की है। उनके जरिए मंत्रिमंडल में महिला प्रतिनिधित्व को भी बढ़ाया गया है।
वहीं पेशे से वकील और किसान कैलाश राजपूत की लोधी राजपूत वोटरों में अच्छी पकड़ मानी जाती है। 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए कैलाश राजपूत को कैबिनेट में जगह दी गई है। माना जा रहा है कि लोधी-राजपूत वोटरों को साधने में भाजपा को इसका लाभ मिलेगा। कैलाश राजपूत कन्नौज जिले के लोधी राजपूत समाज के एक प्रभावशाली नेता माने जाते हैं। तिर्वा और छिबरामऊ क्षेत्रों में उनकी गहरी पैठ है। वहीं योगी कैबिनेट में प्रमोशन पाकर राज्यमंत्री से राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाए गए डा.सोमेंद्र तोमर को बीजेपी का मजबूत गुर्जर चेहरा माना जाता है।
राज्यमंत्री से राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाए गए अजीत पाल कानपुर देहात की सिकंदरा सीट से विधायक हैं। उन्होंने 2017 के उपचुनाव और 2022 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी। कानपुर देहात की रसूलाबाद, भोगनीपुर और अकबरपुर रनियां जैसी सीटों पर पार्टी के सामाजिक समीकरण मजबूत करने में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है। पार्टी हाईकमान को उम्मीद है कि कैबिनेट में उनका कद और भूमिका बढ़ने से कानपुर देहात समेत पूरे क्षेत्र में भाजपा की संगठनात्मक और चुनावी रणनीति को और मजबूती मिलेगी।




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