बदमाशों को पकड़ने पर सिर्फ इनाम की घोषणा, पुलिसवालों की जेब में नहीं आती रकम; जानें क्यों
यूपी में पुलिसकर्मियों के कागजी खाते में लाखों की रकम पड़ी है, लेकिन वे खर्च नहीं कर सकते। अगर मिल जाए तो कई पुलिसवाले सिर्फ इसी पैसे से लखपति बन जाएं। दरअसल बदमाशों को पकड़ने पर इनाम की घोषणा तो होती है, लेकिन पुलिसकर्मियों को वह राशि मिलती नहीं है।

पुलिसकर्मियों के 'कागजी खाते' में लाखों की रकम पड़ी है, लेकिन वे खर्च नहीं कर सकते। अगर मिल जाए तो कई पुलिसवाले सिर्फ इसी पैसे से लखपति बन जाएं। यह रकम अच्छा काम करने के बाद मिलने वाले इनाम की है। बदमाशों को पकड़ने पर इनाम की घोषणा तो होती है, लेकिन पुलिसकर्मियों को वह राशि मिलती नहीं है। इस वर्चुअल इनाम के बाद भी पुलिसकर्मियों की हसरत होती है कि वे इनामी बदमाशों पकड़ने का तमगा जरूर हासिल करें।
पुलिस महकमे का क्या गणित है, इसे अधिकारी-कर्मचारी ही समझते होंगे। हां, इसका तोड़ जरूर है कि बदमाशों को पकड़ने वाले पुलिसकर्मियों के बारे में यह दर्ज हो जाता है कि उन्हें इनाम की चाहत ही नहीं है। यह भी तर्क दिया जाता है कि सैकड़ों इनामियों को पकड़ने वाले पुलिसकर्मियों ने पिछले कई वर्षों से इनाम लेने की कभी कोशिश ही नहीं की। वे बदमाशों को पकड़ते हैं, प्रशस्तिपत्र लेते हैं, पर इनाम की रकम को बट्टे खाते में चढ़ाकर भूल जाते हैं।
प्रदेश सरकार ने जिस हिसाब से बदमाशों पर घोषित होने वाले इनाम की राशि बढ़ाई है, वह अगर पुलिसवालों को वह रकम मिल जाए तो खासकर क्राइम ब्रांच के कई सिपाही और दरोगा लखपति बन जाएं। उदाहरण के लिए गोरखपुर जोन में राघवेंद्र यादव ढाई लाख रुपये का इनामी बदमाश है। अब आम आदम को यही लगता होगा कि राघवेन्द्र को जो भी पकड़ेगा, वह ढाई लाख रुपये के इनाम का हकदार होगा। लेकिन बाकी इनामों की तरह इसकी भी वही सच्चाई है। इनाम की राशि पुलिस कप्तान के ऑफिस में मौजूद रिवार्ड रजिस्टर पर दर्ज हो जाती है। रजिस्ट्रर यह बताएगा कि फलां व्यक्ति को इतनी रकम रिवार्ड (इनाम) के रूप में दी जा रही है, पर हकीकत में वह आभासी (वर्चुअल) ही होती है।
तीन साल में कोई रकम रिलीज नहीं
लेखा विभाग की मानें तो उन्होंने पिछले तीन साल में किसी को भी इनाम के मद में कोई रकम रिलीज नहीं की। विभाग के मुताबिक इनाम के पैसे के लिए आवेदन ही नहीं आता है। अगर आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले पांच साल में अकेले गोरखपुर क्राइम ब्रांच ने ही 50 लाख रुपये के इनामी बदमाश पकड़े हैं। विभाग का तर्क होता है कि इनाम की रकम लेने के लिए पुलिसवालों को कागजी प्रक्रिया पूरी करनी होती है। उन्हें लेखा विभाग में आवेदन करना होता है। बदमाश को गिरफ्तार करने वाली फर्द में शामिल पुलिसवालों में रैंक के हिसाब से इनाम राशि बंटती है। संबंधित सेल के प्रभारी से लेकर कप्तान तक से हस्ताक्षर कराने के बाद उसे लेखा विभाग में दाखिल किया जाता है, तब रकम मिलती है। इस प्रक्रिया से कोई पुलिसवाला गुजरना ही नहीं चाहता है, लिहाजा रकम का दावा ही नहीं होता है।
इनाम की घोषणा का अधिकार क्षेत्र
वर्तमान व्यवस्था में एसएसपी को 25 हजार रुपये तक इनाम घोषित करने का अधिकार दिया गया है। वहीं परिक्षेत्र स्तर पर आईजी 50 हजार रुपये तक का इनाम घोषित कर सकते हैं। एक लाख रुपये तक का इनाम जोन स्तर पर एडीजी घोषित कर सकते हैं। ढाई लाख तक डीजीपी और उससे ज्यादा का इनाम शासनस्तर से घोषित किया जा सकता है।
पब्लिक देती है इनाम
पुलिस द्वारा घोषित इनाम भले ही पुलिसवलों को न मिले, पर पब्लिक कभी-कभी बड़े काम पर खुश होकर इनाम जरूर देती है। गोरखपुर में एक समय में अमित और रामायण का शहर के डॉक्टरों में आतंक था। जब वे एंकाउंटर में मारे गए तो कई डॉक्टरों ने आपस में पैसा जुटाकर पुलिस टीम को इनाम दिया था। उसके बाद भी लूट या अन्य बड़ी वारदात के खुलासे में व्यापारी या फिर समाज के अन्य लोग पुलिसवालों को इनाम देते रहे हैं। यह राशि सर्विस बुक में दर्ज नहीं होती, पर पुलिसवाले उसे खर्च जरूर कर सकते हैं।




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