आजादी की लड़ाई से है इस जिले की मिठाई का कनेक्शन, अब बन चुकी है ब्रांड
लखीमपुर के मैगलगंज अपनी अनोखी मिठास और गौरवशाली इतिहास के कारण सुर्खियों में है। यहां के रसगुल्ले अब सिर्फ स्वाद के लिए नहीं, बल्कि अपने ब्रांड और परंपरा के लिए भी जाने जा रहे हैं। करीब 85 साल पुरानी यह मिठाई की परंपरा हाल ही में तब और खास हो गई जब इसे जीआई टैग की मान्यता मिली।

लखीमपुर खीरी जिले का छोटा-सा कस्बा मैगलगंज अपनी अनोखी मिठास और गौरवशाली इतिहास के कारण सुर्खियों में है। यहां के रसगुल्ले अब सिर्फ स्वाद के लिए नहीं, बल्कि अपने ब्रांड और परंपरा के लिए भी जाने जा रहे हैं। करीब 85 साल पुरानी यह मिठाई की परंपरा हाल ही में तब और खास हो गई जब इसे जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग की मान्यता मिली। जीआई टैग मिलने के बाद अब मैगलगंज के रसगुल्ले सिर्फ खीरी जिले तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि देशभर में अपनी अलग पहचान बनाएंगे।
मैगलगंज के रसगुल्लों का इतिहास सिर्फ कारोबार तक सीमित नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई से गहराई से जुड़ा है। साल 1941 में जब स्वतंत्रता आंदोलन तेज़ हो रहा था, तब यहां के रसगुल्लों की पहली पहचान बनी। बताया जाता है कि स्वतंत्रता सेनानियों और आंदोलन में शामिल युवाओं को उत्साह और ऊर्जा देने के लिए स्थानीय लोगों ने उन्हें मुफ्त में रसगुल्ले खिलाने का संकल्प लिया। उस दौर में यह मिठाई सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि देशभक्ति का प्रतीक बन गई।
आज से करीब आठ दशक पहले रसगुल्लों की कीमत बेहद मामूली थी। उस समय यहां के श्यामलाल यज्ञसैनी स्वतंत्रता सेनानियों को एक रुपये में 16 रसगुल्ले या गुलाब जामुन परोसते थे। धीरे-धीरे यह मिठाई आम लोगों की पसंद बन गई और कस्बे की पहचान भी। समय के साथ दाम जरूर बदले, पर रसगुल्लों की लोकप्रियता आज भी बरकरार है। वर्तमान में इसकी हांडी 250 से 300 रुपये तक बिक रही है। खीरी से हरदोई तक दुकानों पर बोर्ड पर लिखा दिख जाएगा - ‘मैगलगंज के रसगुल्ले’। मैगलगंज के रसगुल्ले आज सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि संघर्ष, परंपरा और स्वाद का मीठा संगम बन चुके हैं। जीआई टैग के साथ यह विरासत अब और मजबूत होकर देशभर में अपनी मिठास फैलाने को तैयार है।
कस्बे में हैं रसगुल्ले की 200 से अधिक दुकानें
लखनऊ से लगभग 130 किलोमीटर दूर मैगलगंज आज मिठाई के बड़े केंद्र के रूप में पहचान बना चुका है। जहां कभी गिनती की दुकानें थीं, वहां अब 200 से अधिक रसगुल्ले की दुकानें हैं। पूरे कस्बे में फैली मिठास की खुशबू न सिर्फ ग्राहकों को आकर्षित करती है, बल्कि पीढ़ियों से इस कारोबार की मजबूती भी बताती है। यह परंपरा अब एक स्थायी उद्योग का रूप ले चुकी है, जो स्थानीय लोगों की रोज़गार का बड़ा जरिया बन चुकी है।
स्वाद में अनोखा, अब राष्ट्रीय ब्रांड
मैगलगंज के रसगुल्ले अपने खास स्वाद, पकाने की पारंपरिक विधि और मिठास के अनूठे संतुलन के लिए मशहूर हैं। यही विशिष्टता इन्हें आम रसगुल्लों से अलग बनाती है। अब जीआई टैग मिलने के बाद इस मिठाई को राष्ट्रीय बाजार में ब्रांड के रूप में नई पहचान मिलेगी। स्थानीय दुकानदारों को उम्मीद है कि इससे बिक्री बढ़ेगी और पुरानी परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।




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