कस्टडी में मौत; चौकी इंचार्ज को जेल, पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को भी 5 साल की सजा
यूपी के वाराणसी में पुलिस हिरासत में मौत के मामले में अदालत ने पुलिस के साथ ही पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को भी दोषी मानते हुए सजा सुनाई है। चौकी इंचार्ज को 10 साल और थाने के एएसआई को छह महीने का सजा सुनाई। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को पांच साल की सजा सुनाई है।

उत्तर प्रदेश के वाराणसी की अदालत ने पुलिस कस्टडी (हिरासत) में हुई मौत के 29 साल पुराने एक मामले में बेहद कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने कानून का उल्लंघन करने वाले दो दारोगाओं के साथ-साथ पुलिसिया बर्बरता पर पर्दा डालने वाले पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को भी दोषी करार देते हुए जेल भेज दिया है। अदालत ने तत्कालीन सुंदरपुर चौकी प्रभारी (इंचार्ज) को 10 साल के कठोर कारावास और थाने के तत्कालीन एएसआई को छह महीने की सजा सुनाई है। वहीं, खाकी के गुनाह को छुपाने के दोषी पाए गए डॉक्टर को पांच साल की सजा दी गई है। यह वारदात लंका थाना क्षेत्र की सुंदरपुर पुलिस चौकी में हुई थी।
100 रुपये की चोरी का आरोप और रात में ही पोस्टमार्टम
यह खौफनाक मामला 29 साल पुराना यानी साल 1997 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, सुंदरपुर पुलिस ने एक स्थानीय युवक को महज 100 रुपये की चोरी की आशंका के चलते अवैध हिरासत में लिया था। आरोप है कि लॉकअप में पूछताछ के दौरान पुलिसकर्मियों ने युवक की इस कदर बेरहमी से लाठी-डंडों से पिटाई की कि उसने कस्टडी में ही दम तोड़ दिया। अपनी खाल बचाने के लिए पुलिस ने आनन-फानन में मृतक के खिलाफ 100 रुपये की चोरी का मुकदमा दर्ज दिखाया और परिजनों को बिना सूचना दिए, रात के अंधेरे में ही गुपचुप तरीके से शव का पोस्टमार्टम कराकर अंतिम संस्कार करने का प्रयास किया था।
सीबीसीआईडी की जांच में खुला राज, डॉक्टर ने बदलने की कोशिश की थी रिपोर्ट
पीड़ित परिवार के कड़े विरोध और न्याय की गुहार के बाद शासन ने इस संवेदनशील मामले की जांच सीबीसीआईडी (CBCID) को सौंपी थी। सीबीसीआईडी ने अपनी गहन तफ्तीश में पाया कि युवक की मौत पुलिसिया थर्ड डिग्री टॉर्चर के कारण हुई थी और बाद में साक्ष्यों को सोची-समझी साजिश के तहत मिटाया गया।
अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि पोस्टमार्टम करने वाले सरकारी डॉक्टर ने अपनी मेडिकल रिपोर्ट में चालाकी से चोटों को छिपाकर मौत को 'आत्महत्या' दर्शाने की कोशिश की थी ताकि हत्यारे पुलिसकर्मियों को बचाया जा सके।
11 आरोपियों में से 4 की मौत, मजिस्ट्रेट और सिपाही आरोपमुक्त
इस लंबे खिंचे मुकदमे के दौरान कुल 11 लोगों को आरोपी बनाया गया था। न्याय की इस 29 साल लंबी लड़ाई के दौरान 4 आरोपियों की स्वाभाविक मौत हो चुकी है। वहीं, अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में मामले में सह-आरोपी बनाए गए तत्कालीन अपर नगर मजिस्ट्रेट और दो सिपाहियों को बाइज्जत आरोपमुक्त (बरी) कर दिया है। सीबीसीआईडी की मजबूत पैरवी के कारण आखिरकार तत्कालीन चौकी इंचार्ज और दोषी डॉक्टर को सलाखों के पीछे भेजकर पीड़ित परिवार को इंसाफ मिल सका है।




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