सहमति से बने शारीरिक संबंध रेप नहीं, हाई कोर्ट ने कहा- शादी का हर वादा ‘झूठा वादा नहीं’; जानें मामला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि यदि दो व्यस्क स्त्री-पुरुष लंबे समय तक सहमति से शारीरिक संबंध बना रहे हों और शुरुआत में ही उनका शादी का इरादा न होने का कोई सबूत न हो तो उसे रेप नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने ऐसे एक मामले में गोरखपुर में दर्ज FIR और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर महिला-पुरुष के बीच लंबे समय तक सहमति से शारीरिक संबंध बना रहे हों और शुरुआत में शादी का इरादा न होने का कोई सबूत न हो, तो उसे बलात्कार नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में गोरखपुर के पिपराइच थाने में दर्ज एफआईआर और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। संजय उर्फ संजय कश्यप की याचिका पर न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने साथ सुनवाई की।
पीड़िता का आरोप था कि संजय ने शादी का वादा कर एक साल तक उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। दोनों परिवारों को रिश्ते की जानकारी थी। शादी नहीं हो पाने पर पीड़िता ने 26 मार्च 2024 को मारपीट और जबरन संबंध बनाने का आरोप लगाते हुए धारा 376, 323, 342, 506 आईपीसी में केस दर्ज कराया। चार्जशीट दाखिल होने के बाद याची ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कार्यवाही रद्द करने की मांग की।
कोर्ट ने अमल भगवान नेहुल बनाम महाराष्ट्र सहित सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हर शादी का वादा तथ्य का भ्रम नहीं होता। यह साबित करना होगा कि आरोपी ने शुरू से ही शादी का झूठा वादा किया और संबंध बनाने का इरादा नहीं था। अगर रिश्ता परिस्थितियों के बदलने से टूटा है तो यह भ्रम नहीं माना जाएगा। पीड़िता ने खुद अपने पत्रों में माना कि याची का परिवार हमेशा उसके साथ अच्छा था। शादी चर्च में हो या मंदिर में, इस पर मतभेद के कारण बात बिगड़ी। इससे साबित नहीं होता कि आरोपी का शुरू से शादी का इरादा नहीं था। कोर्ट ने कहा पीड़िता बालिग थी और 9वीं तक पढ़ी थी। वह एक साल तक रिश्ते में रही। सक्षम उम्र की महिला को शारीरिक संबंधों के जोखिम की समझ होती है। शादी और शादी के वादे में फर्क होता है।
कोर्ट ने माना कि पीड़िता ने मजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान में याची से शादी की इच्छा जताई थी। 26 मार्च 2024 की घटना का जिक्र उसने पहले नहीं किया। दोस्त कृष्णा का बयान भी दर्ज नहीं हुआ। इससे लगता है कि एफआईआर याची पर शादी का दबाव बनाने के लिए दर्ज कराई गई।
कोर्ट ने अमल भगवान नेहुल केस का जिक्र किया जहां शादीशुदा महिला 13 महीने तक संबंध में रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था सहमति से बना रिश्ता खराब होने या पार्टनर के दूर होने को आपराधिक मशीनरी चलाने का आधार नहीं बनाया जा सकता। ऐसा करना न सिर्फ कोर्ट पर बोझ है बल्कि आरोपी की पहचान पर भी धब्बा है। कोर्ट ने कहा कि बड़ी संख्या में मामलों में देखा गया है कि लंबे समय तक चले सहमति के रिश्ते खराब होने पर उन्हें आपराधिक रंग देने का ट्रेंड बढ़ रहा है।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में बलात्कार का अपराध नहीं बनता। पीड़िता ने यह नहीं कहा कि याची का शुरू से शादी का इरादा नहीं था। शादी का वादा निभा न पाने का आरोप निरर्थक है। मारपीट, बंधक बनाने और धमकी के आरोप भी बिना किसी सबूत के हैं। कोर्ट याची के खिलाफ दाखिल चार्ज शीट और मुकदमे की सभी कार्यवाही रद्द कर दी है।




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