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पुलिस दबाव डाले तो अवमानना ​​का मामला भेजें, सभी जजों को इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश में निचली अदालतों के मजिस्ट्रेटों को निर्देश दिया है कि यदि कोई पुलिस अधिकारी उन पर दबाव डालने या डराने की कोशिश करे, तो वे तुरंत हाईकोर्ट को अवमानना (Contempt) का मामला भेजें।

Thu, 19 March 2026 10:52 PMYogesh Yadav प्रयागराज, विधि संवाददाता
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पुलिस दबाव डाले तो अवमानना ​​का मामला भेजें, सभी जजों को इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में मजिस्ट्रेटों को साफतौर पर सलाह दी कि अगर उन्हें किसी पुलिस अधिकारी की ओर से ऐसी कोई शर्मिंदगी या दबाव महसूस हो तो वे कभी भी हाईकोर्ट में अवमानना ​​का मामला भेज सकते हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि जब मजिस्ट्रेट कोर्ट कुछ खास लोगों के मामले में उनके लिए असुविधाजनक जांच के आदेश देते हैं तो कभी-कभी बड़े पुलिस अधिकारी उन पर दबाव डालने की कोशिश करते हैं।

यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने दिया है। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को ज़रूरी आदेश देने में हिचकिचाना नहीं चाहिए, सिर्फ इसलिए कि किसी समय किसी मनमानी करने वाले पुलिस अधिकारी ने उन्हें कुछ परेशानी दी हो। अगर सच में किसी पुलिस अधिकारी की ओर से मजिस्ट्रेट को किसी तरह की शर्मिंदगी या दबाव महसूस होता है तो वे कभी भी इस कोर्ट में अवमानना ​​का मामला भेज सकते हैं।

क्या है मामला

हाईकोर्ट ने यह बात तब कही जब वह फर्रुखाबाद ज़िले में प्राथमिकी दर्ज करने से जुड़ी याचिका को सीधे तौर पर खारिज कर रही थी। याची संदीप औदिच्य ने फर्रुखाबाद के पुलिस अधीक्षक को निर्देश देने की मांग की थी प्राथमिकी दर्ज करने के लिए दी गई उसकी अर्जी पर एक तय समय सीमा के अंदर फैसला लेने का निर्देश दिया जाए। ऐसी मांग पर नाराज़गी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को अर्जियों पर फैसला लेने का निर्देश देने वाली मांग कोर्ट को लगभग बेअसर बना देती हैं क्योंकि अधिकारी यह मान लेते हैं कि कोर्ट उनसे सिर्फ फैसला लेने के लिए कह सकता है, न कि खुद मामले पर फैसला दे सकता है।

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कोर्ट ने बताई अफसर की जिम्मेदारी

कोर्ट ने कहा कि इससे याचिकाओं की बाढ़ आ जाती है, जिनमें कोर्ट को असल में कुछ भी फैसला नहीं लेना होता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में जहां किसी थाने का इंचार्ज बीएनएस की धारा 173 (4) के तहत किसी संज्ञेय अपराध (गंभीर अपराध) की प्राथमिकी दर्ज करने से मना कर देता है तो शिकायत करने वाले के पास यह विकल्प होता है कि वह उस जानकारी का सार लिखकर डाक से संबंधित पुलिस अधीक्षक को भेज दे। ऐसी जानकारी मिलने पर एसपी का यह दायित्व है कि उससे किसी संज्ञेय अपराध का पता चलता है तो वह या तो स्वयं उस अपराध की जांच करे, या बीएनएसएस के तहत निर्धारित तरीके से अपने अधीनस्थ किसी पुलिस अधिकारी को जांच करने का निर्देश दे।

एसपी भी कर्तव्य में कोताही करे तो उपाय

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एसपी भी अपने कर्तव्य में कोताही बरतता है तो इसका उपाय बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष उपलब्ध है। न्यायिक मजिस्ट्रेट को बीएनएसएस की धारा 173(4) के तहत शपथपत्र के साथ कोई प्रार्थना पत्र प्राप्त होता है तो वह ऐसी जांच करने के बाद जिसे वह आवश्यक समझता है और पुलिस अधिकारी द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के बाद पुलिस को जांच किए जाने का आदेश दे सकता है। ऐसी परिस्थितियों में इस मामले में याची के लिए उपाय है कि वह बीएनएसएस की धारा 174(3) के तहत संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करे।

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अफसर मजिस्ट्रेट को डराने धमकाने के हथकंडे अपनाते

कोर्ट ने स्वीकार किया कि कुछ मामलों में ऐसा होता है कि जब मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसे प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किए जाते हैं और जांच के आदेश दिए जाते हैं, विशेषकर ऐसे आदेश जो कुछ लोगों के लिए असहज हो तो इससे पुलिस के तथाकथित वरिष्ठ अधिकारियों की त्योरियां चढ़ जाती हैं और वे मजिस्ट्रेट को डराने-धमकाने के हथकंडे अपनाने लगते हैं। कोर्ट ने मजिस्ट्रेटों को सलाह दी कि आवश्यक आदेश करने में संकोच न करे। केवल इसलिए कि किसी समय, किसी मनमानी करने वाले पुलिस अधिकारी ने मजिस्ट्रेट को कुछ असुविधा पहुंचाई हो और यदि आवश्यक हो तो हाईकोर्ट को अवमानना ​​ का संदर्भ भेजें।

कोर्ट ने इस याचिका में वैधानिक वैकल्पिक उपाय की उपलब्धता को देखते हुए इसे खारिज कर दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि एफआईआर दर्ज कराने के लिए सक्षम मजिस्ट्रेट के पास जाने का का उपाय याची के लिए अब भी खुला है।

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