मुस्लिम भी नाबालिग संरक्षक अधिनियम का ले सकते हैं सहारा, हाईकोर्ट का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि मुस्लिम कानून से शासित होने वाले पक्षकार भी अपने नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा (Custody) के लिए 'संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम' का सहारा ले सकते हैं।

UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि मुस्लिम कानून से शासित होने वाले पक्षकार भी अपने नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम का सहारा ले सकते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अधिनियम एक सामान्य कानून है जो धर्म पर ध्यान दिए बिना सभी व्यक्तियों पर लागू होता है और मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आने वाले लोग भी इसके माध्यम से राहत पाने के हकदार हैं।यह आदेश न्यायमूर्ति अनिल कुमार ने रिजवाना की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
मामले के तथ्यों के अनुसार याची रिजवाना ने अपने दो नाबालिग बच्चों 10 वर्षीय अबू हसन और पांच वर्षीय कनीज फातमा की अभिरक्षा की मांग में याचिका दाखिल कर कहा कि मुस्लिम कानून के अनुसार सात वर्ष से कम आयु के बालक और नाबालिग लड़की की अभिरक्षा का अधिकार मां को होता है। अधिनियम की धारा छह के प्रावधानों के कारण मुस्लिम पक्षकारों पर संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम प्रभावी नहीं होता इसलिए अभिरक्षा का विवाद केवल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से ही तय किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम की धारा छह किसी भी वर्ग व धर्म के व्यक्ति को न्यायालय जाने से नहीं रोकती बल्कि यह विभिन्न श्रेणियों के अभिभावकों को मान्यता देने का काम करती है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अभिभावक शब्द की परिभाषा काफी व्यापक है और इसमें बच्चे की अभिरक्षा का अधिकार भी शामिल है। कहा गया कि व्यक्तिगत कानून केवल न्यायालय का मार्गदर्शन कर सकते हैं लेकिन अभिरक्षा तय करने का सबसे प्रमुख आधार बच्चे का कल्याण ही होता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि फैमिली कोर्ट एक्ट 1984 की धारा सात के तहत परिवार न्यायालय को नाबालिगों की संरक्षकता और अभिरक्षा से जुड़े मामलों पर निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। कोर्ट ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका एक संक्षिप्त प्रक्रिया है, जिसमें साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन और बच्चों के कल्याण की गहन जांच संभव नहीं है। कोर्ट ने याची को सलाह दी कि उचित राहत के लिए वह सक्षम परिवार न्यायालय के समक्ष अपनी बात रखे।




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