चुनाव से पहले अखिलेश बढ़ाने लगे कुनबा; नसीमुद्दीन, अनीस अहमद सपा में जा रहे हैं!
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की आहट के बीच समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने अपने कुनबे को विस्तार देना शुरू कर दिया है। 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की रणनीति को धार देने के लिए अखिलेश अब दूसरे दलों के दिग्गज चेहरों को साइकिल पर सवार करने की तैयारी में हैं।

उत्तर प्रदेश की सियासत में 15 फरवरी का दिन समाजवादी पार्टी के लिए बेहद अहम होने जा रहा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि इस दिन अखिलेश यादव एक साथ कई बड़े मुस्लिम चेहरों और पूर्व विधायकों को पार्टी में शामिल कराकर विपक्षी खेमे को बड़ा झटका देंगे। इस लिस्ट में सबसे बड़ा नाम बसपा के पूर्व कद्दावर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी और पूर्व मंत्री अनीस अहमद उर्फ 'फूल बाबू' का है।
बसपा सरकार में कभी मायावती के बाद दूसरे सबसे शक्तिशाली नेता रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने हाल ही में कांग्रेस से इस्तीफा दिया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि 15 फरवरी को वह औपचारिक रूप से समाजवादी पार्टी का दामन थाम सकते हैं। नसीमुद्दीन का पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मुस्लिम मतदाताओं के बीच मजबूत आधार माना जाता है। उनके सपा में आने से पार्टी को मुस्लिम-दलित गठजोड़ को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
पीलीभीत के 'फूल बाबू' भी पहनेंगे लाल टोपी
बसपा सरकार में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री रहे अनीस अहमद उर्फ 'फूल बाबू' की भी सपा में एंट्री लगभग तय है। फूल बाबू का पीलीभीत, बरेली और आसपास के तराई जिलों में अच्छा खासा प्रभाव है। कुछ समय पहले ही उन्होंने अखिलेश यादव से मुलाकात की थी, जिसके बाद से ही उनके पाला बदलने की चर्चा शुरू हो गई थी। 15 फरवरी को अखिलेश यादव उन्हें विधिवत पार्टी की सदस्यता दिलाएंगे। फूल बाबू के आने से सपा को तराई क्षेत्र में अल्पसंख्यक वोटों को एकजुट करने में बड़ी बढ़त मिल सकती है।
पूर्व विधायकों और अपना दल के नेताओं का भी होगा जमावड़ा
सूत्रों के मुताबिक, 15 फरवरी को होने वाले इस भव्य जॉइनिंग कार्यक्रम में केवल नसीमुद्दीन और फूल बाबू ही नहीं, बल्कि कई पूर्व विधायक और विपक्षी दलों के जिला स्तरीय नेता भी सपा का हिस्सा बनेंगे। सबसे चौंकाने वाली खबर यह है कि 'अपना दल' (एस) के एक पूर्व अध्यक्ष भी इस दौरान अखिलेश यादव के साथ मंच साझा कर सकते हैं। यह कदम अनुप्रिया पटेल के वोट बैंक में सेंधमारी के तौर पर देखा जा रहा है।
अखिलेश का 'मिशन 2027' और कुनबा विस्तार
अखिलेश यादव इन दिनों छोटे दलों और क्षेत्रीय क्षत्रपों को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। जिस तरह से एक के बाद एक कद्दावर मुस्लिम नेता सपा के साथ आ रहे हैं, उससे यह साफ है कि अखिलेश यादव 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले 'माई' (Muslim-Yadav) फैक्टर को और अधिक व्यापक बनाने में जुटे हैं।
2019 में भी सपा में आना चाहते थे नसीमुद्दीन सिद्दीकी
नसीमुद्दीन सिद्दीकी का उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक लंबा और प्रभावशाली इतिहास रहा है। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) को मई 2017 में छोड़ा था। हालांकि तब उन्हें मायावती ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित किया था। इसके बाद 2018 में वह कांग्रेस में शामिल हो गए थे। अगले साल वह सपा में शामिल होने वाले थे। इसी दौरान सपा का बसपा से गठबंधन हो गया और वह सपा में शामिल नहीं हो सके थे।
एक समय था जब नसीमुद्दीन सिद्दीकी को मायावती के बाद बसपा का सबसे ताकतवर नेता माना जाता था। वह पार्टी का सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा थे और मायावती के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार थे। 2007 से 2012 तक बसपा की बहुमत वाली सरकार में उनके पास लोक निर्माण विभाग (PWD), आबकारी और ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण विभाग थे।




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