मरुधर: जमीन के नीचे सूखा, ऊपर बढ़ती आबादी; अलार्म बजा रहा राजस्थान का जल संकट
जल संकट के नजरिए से देश के सबसे संवेदनशील राज्यों में से एक राजस्थान है। राज्य का लगभग दो-तिहाई हिस्सा थार मरुस्थल (रेगिस्तान) में बसा है। इसके चलते प्राकृतिक रूप से मौजूद पानी की सीमित मात्रा उपलब्ध हो पाती है। ऊपर से अनियमित मानसून और बढ़ती आबादी ने हालात और गंभीर कर दिए हैं।

राजस्थान में पानी का संकट सिर्फ आसमान की बेरुखी नहीं, जमीन के नीचे की खामोशी भी है। बारिश कम होती है, लेकिन उससे बड़ा संकट यह है कि हम जितना पानी जमीन से खींच रहे हैं, उतना वापस भर नहीं पा रहे। नतीजा- भूजल स्तर हर साल नीचे जा रहा है। इस तरह जल संकट के नजरिए से देश के सबसे संवेदनशील राज्यों में से एक राजस्थान है।
राज्य का लगभग दो-तिहाई हिस्सा थार मरुस्थल (रेगिस्तान) में बसा है। इसके चलते प्राकृतिक रूप से मौजूद पानी की सीमित मात्रा उपलब्ध हो पाती है। ऊपर से अनियमित मानसून और बढ़ती आबादी ने हालात और गंभीर कर दिए हैं। राज्य में औसत वार्षिक वर्षा मात्र 531 मिमी है, जो राष्ट्रीय औसत का लगभग आधा है। ऐसे में बारिश पर निर्भरता जोखिम भरी साबित होती है। 'मरुधर' सीरीज के दूसरे अंक में पढ़िए राजस्थान में पानी की कमी और गुणवत्ता से जुड़े आंकड़े।
सतही जल कम, भूजल पर बढ़ती निर्भरता
राजस्थान में सतही जल उपलब्धता केवल 25.38 BCM (बिलियन क्यूबिक मीटर) है। अंतरराज्यीय समझौतों से अतिरिक्त 17.88 BCM पानी मिलता है, लेकिन यह भी बढ़ती जरूरतों के मुकाबले पर्याप्त नहीं है। राज्य में केवल माही और चंबल नदी बेसिन में अपेक्षाकृत बेहतर जल उपलब्धता है, बाकी इलाकों में भूजल ही मुख्य सहारा है।
लेकिन समस्या यह है कि भूजल recharge से अधिक गति से निकाला जा रहा है। कई ब्लॉक “ओवर-एक्सप्लॉइटेड” श्रेणी में आ चुके हैं। जयपुर, जोधपुर, नागौर, सीकर, झुंझुनूं और बाड़मेर जैसे जिलों में भूजल स्तर 500 से 1000 फीट तक नीचे पहुंच चुका है।
बढ़ती मांग, घटते जल स्रोत
2045 तक गैर-कृषि जल मांग 8.07 BCM तक पहुंचने का अनुमान है। यानी शहरों, उद्योगों और घरेलू जरूरतों के लिए पानी की मांग तेजी से बढ़ेगी। जल जीवन मिशन का लक्ष्य 2028 तक हर घर में नल से जल पहुंचाना है। यह महत्वाकांक्षी योजना है, लेकिन सवाल यह है कि स्रोत कहाँ से आएंगे?
मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान भूजल पुनर्भरण पर केंद्रित है, जिसमें तालाबों, जोहड़ों और वर्षा जल संचयन संरचनाओं को पुनर्जीवित किया जा रहा है। लेकिन इन प्रयासों को व्यापक और स्थायी बनाने की जरूरत है।
खेती और पशुधन का दबाव
राजस्थान की अर्थव्यवस्था में कृषि और पशुपालन की बड़ी भूमिका है। सीमित जल संसाधनों के बावजूद राज्य भारत के 18.70% पशुधन का समर्थन करता है। सिंचाई का बड़ा हिस्सा भूजल पर आधारित है। मुफ्त या रियायती बिजली ने ट्यूबवेल के उपयोग को बढ़ावा दिया, जिससे अंधाधुंध दोहन हुआ। किसान हर कुछ वर्षों में बोरवेल और गहरा करवाने को मजबूर हैं।

गुणवत्ता भी बनी चिंता
भूजल केवल कम नहीं हो रहा, बल्कि कई क्षेत्रों में उसकी गुणवत्ता भी गिर रही है। नागौर, बाड़मेर और अजमेर जैसे जिलों में फ्लोराइड की अधिकता स्वास्थ्य संकट पैदा कर रही है। कई इलाकों में पानी खारा हो चुका है। विशेषज्ञ मानते हैं कि समाधान केवल नई योजनाओं में नहीं, बल्कि जल प्रबंधन की सोच बदलने में है।
क्या किया जा सकता है
वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन, फसल चक्र में बदलाव, भूजल दोहन पर सख्त निगरानी, शहरी क्षेत्रों में recharge संरचनाओं को बढ़ावा।राजस्थान का जल संकट केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, आने वाले वर्षों की चेतावनी है। अगर जमीन के नीचे का भंडार खाली हुआ, तो विकास की रफ्तार भी थम सकती है। यह सिर्फ पानी का सवाल नहीं- भविष्य का सवाल है।




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