मरुधर: राजस्थान के थार का जल गणित, बड़े राज्य में सबसे कम पानी की कहानी
राजस्थान का पश्चिमी हिस्सा- जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और जोधपुर आज भी पानी की स्थायी किल्लत से जूझ रहा है। हालात ऐसे हैं कि कई गांवों में पीने का पानी अब भी टैंकरों के भरोसे है। ‘मरुधर’ सीरीज के पहले अंक में पढ़िए- थार में पानी की जंग की पूरी तस्वीर।

थार का रेगिस्तान सिर्फ रेत का समंदर नहीं है, यह उस जंग की कहानी भी है जो यहाँ के लोग हर दिन पानी के लिए लड़ते हैं। राजस्थान का पश्चिमी हिस्सा- जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और जोधपुर आज भी पानी की स्थायी किल्लत से जूझ रहा है। हालात ऐसे हैं कि कई गांवों में पीने का पानी अब भी टैंकरों के भरोसे है। ‘मरुधर’ सीरीज के पहले अंक में पढ़िए- थार में पानी की जंग की पूरी तस्वीर।
पानी का गणित: बड़ा राज्य, बेहद कम संसाधन
क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान देश का सबसे बड़ा राज्य है, लेकिन पानी के मामले में उसकी स्थिति बेहद कमजोर है। राज्य के पास भारत का करीब 10.4 फीसदी भूभाग है, जबकि सतही जल संसाधन सिर्फ 1.16% ही मौजूद है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर हालात नहीं बदले, तो 2050 तक प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता घटकर 450 क्यूबिक मीटर रह जाएगी, जो ‘अत्यधिक जल संकट’ की श्रेणी में आता है।
भूजल की हालत: जितना निकल रहा, उतना भर नहीं रहा
राजस्थान में पानी की लड़ाई का सबसे बड़ा मोर्चा भूजल है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के करीब 74 प्रतिशत भूजल स्रोत ‘ओवर-एक्सप्लॉइटेड’ श्रेणी में आते हैं। आंकड़े बताते हैं कि एक साल में राज्य से लगभग 16.7 अरब क्यूबिक मीटर पानी निकाला गया, जबकि रिचार्ज सिर्फ 11.5 BCM के आसपास हुआ। यानी जितना पानी जमीन से निकाला जा रहा है, उतना वापस भर ही नहीं पा रहा।
मीलों चलकर पानी, फिर भी सुरक्षित नहीं
थार के कई गांवों में महिलाएँ और बच्चे रोजाना 2 से 5 किलोमीटर तक चलकर पानी लाते हैं। लेकिन यह संघर्ष सिर्फ दूरी का नहीं है, गुणवत्ता का भी है। पश्चिमी राजस्थान के कई इलाकों में भूजल खारा (Saline) है। उसमें फ्लोराइड, नाइट्रेट और उच्च TDS की मात्रा पाई जाती है। नतीजा ये होता है कि लोगों को पेट की बीमारियाँ, त्वचा रोग और हड्डियों से जुड़ी समस्याएँ आम होती जा रही हैं। स्थानीय लोग मानते हैं कि मजबूरी में वही पानी पीना पड़ता है, क्योंकि विकल्प नहीं है।
इंदिरा गांधी नहर: जीवनरेखा या अधूरी राहत?
इंदिरा गांधी नहर परियोजना को थार के लिए जीवनरेखा माना गया था, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। नहर का पानी अब भी हर गांव तक नहीं पहुँच पाया है। कई इलाकों में पाइपलाइन जर्जर है, तो कहीं अनियमित आपूर्ति है। ऊपर से, राज्य के जलाशयों की हालत भी बेहतर नहीं है। राजस्थान के 691 बांधों में औसतन 45 प्रतिशत से भी कम पानी बचा है। ऐसे में नहर पर निर्भरता भी सीमित साबित हो रही है।
टैंकरों के भरोसे प्यास
जहाँ नहर और हैंडपंप जवाब दे जाते हैं, वहाँ टैंकर ही आखिरी सहारा बनते हैं। गर्मी बढ़ते ही टैंकर के दाम 500 से 700 रुपये प्रति चक्कर तक पहुँच जाते हैं। गरीब और मध्यम वर्ग के लिए यह पानी अब सिर्फ जरूरत नहीं, आर्थिक बोझ भी बन चुका है।

पारंपरिक जलस्रोत: जो कभी ताकत थे
थार की पहचान रहे टांके, कुंड और बावड़ियाँ कभी सूखे इलाके में पानी संजोने की मिसाल थीं। लेकिन आज ये जलस्रोत उपेक्षा और रखरखाव की कमी के कारण या तो सूख चुके हैं या उपयोग लायक नहीं बचे। विडंबना यह है कि आधुनिक जल योजनाओं की दौड़ में सदियों पुरानी जल-संरक्षण समझ पीछे छूटती जा रही है।
बदलता मौसम, गहराता संकट
जलवायु परिवर्तन ने थार की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। अनियमित मानसून, बढ़ता तापमान और बार-बार पड़ने वाला सूखा हालात को भयावह बना रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर स्थायी जल प्रबंधन और भूजल दोहन पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले सालों में संकट और गहराएगा।
- खबर में इस्तेमाल की गई तस्वीर प्रतीकात्मक है। इसे एआई से बनाया गया है।




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