राजस्थान पंचायत-निकाय चुनाव पर कानूनी घेरा; हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी सबकी नजरें
राजस्थान में पंचायत और शहरी निकाय चुनाव को लेकर सियासी घमासान अब अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। चुनाव टालने के आरोपों के बीच पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने राजस्थान हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर दी है

राजस्थान में पंचायत और शहरी निकाय चुनाव को लेकर सियासी घमासान अब अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। चुनाव टालने के आरोपों के बीच पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने राजस्थान हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर दी है, जिससे राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है। यह मामला अब सीधे तौर पर न्यायालय के आदेश और चुनाव आयोग के कार्यक्रम के बीच टकराव का रूप ले चुका है।
डेडलाइन पर फंसा पूरा विवाद
पूरा विवाद हाईकोर्ट द्वारा तय की गई चुनावी समयसीमा को लेकर है। अदालत ने 14 नवंबर 2025 को अपने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट निर्देश दिए थे कि राज्य में पंचायत और निकाय चुनाव 15 अप्रैल 2026 तक हर हाल में कराए जाएं। इसके साथ ही परिसीमन की प्रक्रिया 31 दिसंबर 2025 तक पूरी करने का आदेश भी दिया गया था। इस आदेश को चुनावी प्रक्रिया के लिए अंतिम और बाध्यकारी समयसीमा माना जा रहा है।
चुनाव आयोग का शेड्यूल बना विवाद की जड़
मामला तब उलझ गया जब राज्य निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का कार्यक्रम जारी किया। आयोग के अनुसार, मतदाता सूचियों को अंतिम रूप 22 अप्रैल 2026 तक दिया जाएगा। ऐसे में बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि जब अंतिम सूची ही 22 अप्रैल को तैयार होगी, तो 15 अप्रैल तक चुनाव कैसे कराए जा सकते हैं। यही देरी अब कानूनी विवाद का मुख्य कारण बन गई है।
अवमानना याचिका से बढ़ी सरकार की मुश्किलें
पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने इस देरी को अदालत की अवमानना करार देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग और राज्य सरकार जानबूझकर अदालत के आदेश की अनदेखी कर रहे हैं। इस याचिका के बाद अब पूरा मामला न्यायिक जांच के दायरे में आ गया है और प्रशासनिक स्तर पर भी दबाव बढ़ गया है।
सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत
मामले की गंभीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। हाल ही में शीर्ष अदालत ने बिहारीलाल रणवा की याचिका पर सुनवाई करते हुए हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि हाईकोर्ट द्वारा तय 15 अप्रैल की समयसीमा को ही मान्य माना जाएगा और यदि आदेश की पालना नहीं हो रही है, तो संबंधित पक्ष हाईकोर्ट जा सकता है।
लीगल नोटिस के बाद एक्शन में लोढ़ा
अवमानना याचिका दायर करने से पहले संयम लोढ़ा ने अधिवक्ता पुनीत सिंघवी के जरिए राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग को लीगल नोटिस भी भेजा था। नोटिस में चुनाव कार्यक्रम को हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार संशोधित करने की मांग की गई थी। हालांकि, जब इस पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो मामला अब अवमानना तक पहुंच गया है।
अब क्या करेगी सरकार?
अब इस पूरे विवाद में अगला कदम बेहद अहम माना जा रहा है। यदि राजस्थान हाईकोर्ट सख्त रुख अपनाता है, तो राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग को जल्दबाजी में चुनाव कार्यक्रम घोषित करना पड़ सकता है। इससे प्रशासनिक तैयारियों पर भी असर पड़ेगा और चुनावी प्रक्रिया में तेजी लानी पड़ेगी।
कोर्ट के फैसले पर टिकी सियासत
राजस्थान की ग्रामीण और शहरी राजनीति का भविष्य फिलहाल अदालत के अगले फैसले पर निर्भर है। यह मामला केवल चुनाव की तारीखों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायिक आदेशों की पालना और प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़ा हुआ है। अब सभी की नजरें हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हुई हैं, जो राज्य की सियासत की दिशा तय कर सकती है।
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