गुरुग्राम में BPL और EWS फ्लैट योजना रद्द करने पर रोक, HC ने यथास्थिति रखने के दिए आदेश
गुरुग्राम में बीपीएल और ईडब्ल्यूएस फ्लैट योजना को रद्द करने पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए फिलहाल रोक लगा दी है। बेंच ने इस मामले की अगली सुनवाई 06 जुलाई 2026 तक यथास्थिति बनाए रखने को कहा है।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने गुरुग्राम में बीपीएल और ईडब्ल्यूएस फ्लैट योजना को रद्द करने पर सख्त रुख अपनाते हुए फिलहाल रोक लगा दी है। हाईकार्ट ने चंद किशोर बनाम हरियाणा राज्य व अन्य की सुनवाई करते हुए निर्देश दिया है कि गुरुग्राम में बीपीएल-ईडब्ल्यूएस आवास योजना के अंतर्गत फ्लैटों के आवंटन व कब्जे की स्थिति अगली सुनवाई 06 जुलाई 2026 तक यथास्थिति बनी रहे।
याचिकाकर्ता चंद किशोर, सुनीता, रेखा और विनोद कुमार गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) श्रेणी के लाभार्थी हैं। इन लोगों ने एस्टेट मैनेजर हाउसिंग बोर्ड हरियाणा गुरुग्राम द्वारा जारी 28 जुलाई 2025 के निरस्तीकरण पत्र को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि अधिक ब्याज दरों पर उधार लेकर राशि जमा करने के बावजूद 03 फरवरी 2010 की नीति (17 मई 2018 के संशोधन सहित) के अंतर्गत आवंटित फ्लैटों का कब्जा नहीं दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह निरस्तीकरण मनमाना है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के अंतर्गत प्रदत्त उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
याचिकाकर्तां ने सरकार पर लगाए मुनाफाखोरी के आरोप
याचिककर्ताओं ने बताया कि हरियाणा सरकार की ओर से प्रति फ्लैट 40-45 लाख की व्यावसायिक दरों पर ई-नीलामी के माध्यम से बेचने का इरादा था। जिससे बीपीएल परिवारों के लिए निर्धारित कल्याणकारी आवास गैर-बीपीएल व्यक्तियों को हस्तांतरित किए जा रहे थे। इस याचिका पर 27 मई को हाईकोर्ट के जस्टिस सुवीर सहगल और जस्टिस विकास सुरी की डिवीजन बेंच ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की जाए। योजना के अंतर्गत चिन्हित फ्लैटों को 06 जुलाई 2026 को मामले की सुनवाई होने तक अन्य हस्तांतरित नहीं किया जाए।
गुड़गांव रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन फेडरेशन के संयोजक संदीप फौगाट ने कहा कि सितंबर 2018 में हरियाणा हाउसिंग बोर्ड ने गुरुग्राम में 1719 बीपीएल-ईडब्ल्यूएस फ्लैटों के निर्माण की घोषणा की थी, जिनकी कीमत प्रति फ्लैट 5.85 लाख रखी गई थी। 21 जनवरी 2019 को पंचकूला में ड्रॉ निकाला गया। इसमें 1719 आवंटियों से 58,500 रुपये पहली किश्त के रूप में जमा कराने को कहा गया था।
यथास्थिति बनाए रखने के आदेश
याचिकाकर्ताओं के वकील विकास कुमार ने कहा कि सरकार द्वारा यह निरस्तीकरण अवैध और मनमाना था। सरकार का उद्देश्य गरीब परिवारों को न देकर उनके वैध घरों से वंचित करके ई-नीलामी के माध्यम से फ्लैटों को ऊंचे दामों पर बेचना था, जबकि यह योजना गरीब परिवरों के कल्याण के लिए थी, लेकिन सरकार ने उनके साथ विश्वासघात किया। अब सभी बीपीएल-ईडब्ल्यूएस परिवारों की उम्मीदें हाईकोर्ट पर टिकी हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 6 जुलाई को होगी, तब तक कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए हैं।




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