नए चेहरे की तलाश में तमिलनाडु की जनता को मिला ‘विजय रथ’
पंकज कुमार पाण्डेय नई दिल्ली। थलापति विजय ने अपनी पार्टी टीवीके की स्थापना की और युवाओं तथा महिलाओं के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ाई। उन्होंने एमजीआर की राह पर चलते हुए अपनी छवि को मजबूत किया और चुनाव प्रचार में डीएमके से मुकाबला किया। विजय की सटीक योजनाओं ने उन्हें नए राजनीतिक चेहरे के रूप में स्थापित किया।

पंकज कुमार पाण्डेय नई दिल्ली। न्याय ही जीतेगा, धर्म ही जीतेगा लेकिन थोड़ी देर से, अगर मैं सीएम बना तो रिश्वत और भ्रष्टाचार को पूरी तरह से खत्म कर दूंगा। यह संवाद रुपहले परदे पर लंबे समय तक तमिल जनता के दिलों पर राज करने वाले तमिलनाडु की सियासत के नए नायक बने थलापति विजय का है। उन्होंने वर्ष 2018 में अपनी सरकार मूवी की लॉचिंग के समय जब यह डायलॉग कैमरों के सामने दोहराया तो शायद ही किसी को अंदाजा रहा हो कि वे एमजीआर के रास्ते पर चलकर जनता के दिलों में पैठ बनाने की तैयारी कर रहे हैं।
विजय की मंशा
विजय ने नवंबर 2025 में कांचीपुरम की अपनी सभा में एमजीआर की मर्मयोगी फिल्म के प्रसिद्ध डायलॉग को बोलते हुए कहा था, ‘अगर मैं निशाना लगाऊं तो कभी चूकूंगा नहीं। अगर चूकने का डर हो तो मैं निशाना नहीं लगाऊंगा।’ यहीं से उन्होंने अपनी मंशा साफ कर दी थी कि वे एमजीआर के रास्ते पर चलकर तमिलनाडु की सियासत में एक नया इतिहास रचने को तैयार हैं।
पहले से तैयार था कैडर
तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) नाम से अक्तूबर 2024 में नई पार्टी बनाने से पहले वर्ष 2009 में ही विजय ने अपने फैन क्लब विजय मक्क्ल अय्यकम के जरिये पूरे प्रदेश में अपना कैडर तैयार कर लिया था। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि विजय मक्क्ल अयक्कम ने पिछले दस सालों में अपने फैंस को रक्तदान, मुफ्त भोजन वितरण और आपदा राहत जैसे सामाजिक कामों से जोड़ा था। जब उन्होंने राजनीतिक दल बनाया तो उनके पास कैडर पहले से था।
बदलाव की छटपटाहट को पढ़ा
विजय का पूरा फोकस युवाओं और महिलाओं पर था। पहली बार वोट डालने वाले युवाओं से लेकर महिलाओं के बीच उनकी जबरदस्त लोकप्रियता थी और यह गुपचुप वोटर परंपरागत सियासी दलों पर भारी पड़ते हुए टीवीके की जीत की पटकथा मौन रहकर लिख रहे थे। ज्यादातर विश्लेषक टीवीके को तीसरे नंबर की पार्टी मानकर चल रहे थे लेकिन बदलाव की छटपटाहट को विजय ने पढ़ लिया था। तमिलनाडु में जयललिता के निधन के बाद जो रिक्तता थी, उसे एआईडीएमके की मौजूदा नेतृत्व नहीं भर पाई। एम. करुणानिधि के सियासी करिश्मे को डीएमके के स्टालिन भी बरकरार नहीं रख पा रहे थे। तमिलनाडु के लोगों को एक नए चेहरे की तलाश थी। खासतौर पर युवाओ में एक नए नेतृत्व को लेकर बेचैनी थी।
गलतियों से सीखा
फिल्मी दुनिया से सियासत में कदम रखने की कोशिश करने वाले रजनीकांत और कमल हासन की गलतियों से बचते हुए विजय ने सटीक योजना के साथ स्वयं को विकल्प के तौर पर पेश किया और जनता की नजरों में असली हीरो बन गए। वे रजनीकांत की तरह हिम्मत नहीं हारे और न ही कमल हासन की तरह बौद्धिक राजनीति का रास्ता अपनाया बल्कि वे एमजीआर के एक मास अपील वाले रास्ते पर चले।
एमजीआर से तुलना
फिल्म स्टार से राजनेता बने जोसेफ विजय चंद्रशेखर (विजय) की तुलना एम. जी. रामचंद्रन (एमजीआर) से हो रही है लेकिन एमजीआर जिस वक्त सियासत में आए उनकी लोकप्रियता चरम पर थी। हालांकि, फिल्मों के जरिये बनी प्रभावशाली (लार्जर दैन लाइफ) छवि और जनता से भावनात्मक जुड़ाव ही एमजीआर की तरह विजय की ताकत बनी।
ऐसे साधा राजनीतिक संतुलन
विजय ने चुनाव प्रचार में डीएमके से सीधी लड़ाई पर फोकस किया। उन्होंने द्रविड़ियन राजनीति से स्वयं को जोड़कर अपनी छवि को धर्मनिरपेक्ष बनाए रखा। साथ ही अनुसूचित जाति और वंचित तबके के बीच गरीबों के मसीहा जैसी छवि बनाई।
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