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इतिहास: अंग्रेजों की दिल्ली को लंदन बनाने की कोशिश, पढ़िए कनॉट प्लेस के दिलचस्प किस्से!

वही कनॉट प्लेस, जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने लंदन की तर्ज पर बसाने की कोशिश की। इसके लिए ब्रिटेन के नामी आर्किटेक्ट सर एडविन लुटियन्स और हरबर्ट बेकर को जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने सीपी का डिजाइन लंदन के पिकाडिली सर्कस की तर्ज पर बनाया।

Sun, 3 Aug 2025 01:09 PMRatan Gupta लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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इतिहास: अंग्रेजों की दिल्ली को लंदन बनाने की कोशिश, पढ़िए कनॉट प्लेस के दिलचस्प किस्से!

कहते हैं कि दिल्ली के दिल की धड़कन कनॉट प्लेस है। वही कनॉट प्लेस, जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने लंदन की तर्ज पर बसाने की कोशिश की। इसके लिए ब्रिटेन के नामी आर्किटेक्ट सर एडविन लुटियन्स और हरबर्ट बेकर को जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने सीपी का डिजाइन लंदन के पिकाडिली सर्कस की तर्ज पर बनाया। गोलाकार बसाए गए सीपी में व्यापार, मनोरंजन से लेकर अंग्रेज अधिकारियों और हाई क्लास लोगों के लिए तमाम तरह की सुविधाएं मुहैया कराई गई थीं।

पहले दिल्ली को राजधानी बनाया गया

कनॉट प्लेस के बारे में जानने से पहले थोड़ा समझिए, दिल्ली देश की राजधानी कब, क्यों और कैसे बनी। साल 1911 में ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम ने दिल्ली दरबार में ऐलान किया कि भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली लाई जाएगी। इसकी वजह रही, दिल्ली का भारत के केंद्र में होना, मुगलों की पुरानी राजधानी होना और प्रतीक के तौर पर इसका सत्ता के केंद्र में होना। जब दिल्ली को देश की राजधानी बना दिया गया, अब अंग्रेजों के मन में आया कि इसे लंदन की तर्ज पर बसाया जाए।

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शुरू हुई दिल्ली को लंदन बनाने की तैयारी

इसके लिए ब्रिटेन के नामी आर्किटेक्ट सर एडविन लुटियन्स और हरबर्ट बेकर को जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने सीपी का डिजाइन लंदन के पिकाडिली सर्कस की तर्ज पर बनाया। उन्होंने नई दिल्ली को डिज़ाइन किया। इसमें राजपथ (किंग्सवे), इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन (वायसरॉय हाउस), संसद भवन जैसी भव्य इमारतें बनाईं। कनॉट प्लेस को गोलाकार शैली में बसाया गया। यह न सिर्फ व्यापार का केंद्र था, बल्कि अंग्रेज अधिकारियों और उच्च वर्ग के लिए सोशल स्पेस भी था।

भारतीयों को गोरों से दूर रखने की चाल

अंग्रेजों ने गोरों और देश के लोगों को अलग-थलग करने की पूरी कोशिश की। इसके लिए उन्होंने पुरानी दिल्ली (शाहजहानाबाद) और नई दिल्ली को अलग-अलग रखा। पुरानी दिल्ली में भारतीयों का बसेरा था, जबकि नई दिल्ली में सफेद चमचमाती सड़कों, बंगलों और क्लबों के जरिए सिर्फ अंग्रेजों के लिए "सिविल लाइफ़" तैयार की गई। एक इलाका जो कनॉट प्लेस बनने से पहले जंगल था, जहां जंगली जानवर घूमा करते थे, जिसे 'काका नाग' गांव और जंगली क्षेत्र कहा जाता था, अब वहां गोरों और रहीसों का जमावड़ा लगने लगा।

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भारत का पहला हाई स्ट्रीट मार्केट

कहा जाता है कि दिल्ली का कनॉट प्लेस, भारत का पहला हाई स्ट्रीट मार्केट है। यहां अंग्रेजों के जमाने से चली आ रहीं तमाम दुकानें और प्रतिष्ठान हैं। इनमें जैन बुक डिपो, बेंगर्स ब्रेकरी, रीगल सिनेमा, प्लाजा जैसे तमाम संस्थान शामिल हैं। इसके चारों तरफ दो रिंग रोड बनाए गए। इनर सर्कल और आउटर सर्कल, जिससे यह देखने में पूरी तरह गोलाकार दिखाई देता है। पूरा इलाका गोल गोल लंबे खंबों पर सधा है, जो देखने में काफी भव्य लगता है। इस आज ब्रिटिश भारत के वास्तुशिल्प, राजनीति और व्यापार का एक शानदार प्रतीक माना जाता है।

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