opinion why SSC aspirants are protesting pm Modi ji please listen Mann Ki Baat of students Opinion: कब तक पुलिस की लाठी खाएंगे, मोदी जी इन छात्रों के 'मन की बात' भी सुन लीजिए!, India News in Hindi - Hindustan
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Opinion: कब तक पुलिस की लाठी खाएंगे, मोदी जी इन छात्रों के 'मन की बात' भी सुन लीजिए!

देश के हजारों युवा अपने हक के लिए सड़क पर संघर्ष कर रहे हैं। इस बार प्रदर्शन SSC के खराब सिस्टम के खिलाफ है। लेकिन अब छात्रों को लगभग हर भर्ती में अपनी आवाज उठाने के लिए सड़क पर उतरना पड़ रहा है। आखिर सरकार इन छात्रों की क्यों नहीं सुनती।

Sun, 3 Aug 2025 11:40 AMAnubhav Shakya लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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Opinion: कब तक पुलिस की लाठी खाएंगे, मोदी जी इन छात्रों के 'मन की बात' भी सुन लीजिए!

देश के जिन युवाओं को आज नौकरी करनी चाहिए थी, देश की सेवा करनी चाहिए थी, वो सड़कों पर संघर्ष कर रहा है। पुलिस की लाठी-डंडों को सह रहा है। स्टाफ सिलेक्शन कमीशन यानी SSC की नाकामी ने इन युवाओं के धैर्य की हर सीमा को तोड़ दिया है। गड़बड़ी SSC करता है और भुगतना लाखों छात्रों को है। ये छात्र अपने घर से दूर दिल्ली जैसे शहरों में छोटे-छोटे कमरों में पूरी जवानी खपा देते हैं। सुबह से लेकर रात तक घंटों किताबों से उलझते हैं। सपना होता है सरकारी नौकरी करने का। लेकिन नौकरी तो नहीं मिलती पुलिस की लाठी जरूर मिल जाती है। हर महीने 'मन की बात' करने वाले प्रधानमंत्री मोदी कब इन छात्रों की बात सुनेंगे? ये लाखों छात्र सरकार की तरफ बड़ी उम्मीद से नजरें गढ़ाए देख रहे हैं।

हालिया मामला SSC सिलेक्शन पोस्ट फेज 13 की परीक्षा से जुड़ा है। ये परीक्षाएं 24 जुलाई से 1 अगस्त 2025 तक चलीं। अचानक पेपर कैंसिल, तकनीकी खामियां और परीक्षा केंद्रों पर अव्यवस्था ने देशभर में लाखों छात्रों और शिक्षकों को आक्रोशित कर दिया। दिल्ली के जंतर मंतर और CGO कॉम्प्लेक्स पर 'दिल्ली चलो' आंदोलन में न केवल छात्रों ने अपनी मांगें बुलंद की, बल्कि पुलिस की लाठियां और हिरासत का भी सामना किया। ये देखकर तो यही लगता है कि SSC की संवेदनहीनता, अक्षमता और अहंकार अब बर्दाश्त से बाहर हो चुके हैं।

क्या है छात्रों की मांगे?

  • स्वतंत्र जांच: SSC की परीक्षा प्रक्रिया में हुई अनियमितताओं की उच्च-स्तरीय जांच की मांग की जा रही है। छात्र चाहते हैं कि इन गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाए।
  • वेंडर की जवाबदेही: SSC ने हाल ही में जिस नई परीक्षा एजेंसी को टेंडर दिया उस पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि यह एजेंसी छोटे पैमाने की परीक्षाओं को संभालने में भी विफल रही है और इसका टेंडर तुरंत हटाया जाना चाहिए।
  • पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया: परीक्षा केंद्रों का आवंटन, तकनीकी बुनियादी ढांचा और परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की जा रही है। कई छात्रों को 400-500 किलोमीटर दूर के केंद्रों पर भेजा गया और वहां पहुंचने पर परीक्षा रद्द होने की सूचना मिली।
  • परीक्षा केंद्रों पर बेहतर सुविधाएं: कई केंद्रों पर कीबोर्ड और माउस काम नहीं कर रहे थे, सर्वर क्रैश हो रहे थे और कुछ जगहों पर तो ग्राउंड फ्लोर पर पशुओं को रखा गया था, जबकि ऊपरी मंजिल पर परीक्षा हो रही थी।

ये मांगें न केवल जायज हैं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था की मांग करती हैं, जो लाखों युवाओं के भविष्य को गंभीरता से ले। लेकिन सरकार और SSC का रवैया इन मांगों को दबाने और प्रदर्शनकारियों को अपराधी की तरह पेश करने का रहा है। SSC को ये भी ध्यान रखना चाहिए कि वो परीक्षा फ्री में परीक्षाएं नहीं कराती, इसके लिए छात्रों से फॉर्म के नाम पर मोटी फीस वसूली जाती है।

लाइलाज सिस्टम बनता जा रहा

SSC की यह नाकामी कोई नई बात नहीं है। 2018 में भी SSC CGL परीक्षा में पेपर लीक के आरोपों ने देशभर में प्रदर्शन को जन्म दिया था। उस समय भी छात्रों ने CBI जांच की मांग की थी, और सरकार को आखिरकार जांच के आदेश देने पड़े थे। लेकिन सात साल बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। 2025 में फेज 13 की परीक्षा में तकनीकी खामियां, जैसे सर्वर क्रैश और गलत केंद्र आवंटन, इस बात का सबूत हैं कि SSC ने अपनी पुरानी गलतियों से कोई सबक नहीं लिया।

इसके अलावा, हाल ही में बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की प्रारंभिक परीक्षा में भी अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों ने प्रदर्शन किया था। वहां भी पुलिस ने लाठीचार्ज का सहारा लिया। इसके अलावा रेलवे, शिक्षक भर्ती ना जाने कितनी ही परीक्षाओं ने प्रशासन की संवेदनहीनता को उजागर किया। ये घटनाएं एक पैटर्न को दर्शाती हैं, जब भी युवा अपनी जायज मांगों के लिए सड़कों पर उतरते हैं, सरकार उनकी आवाज को दबाने के लिए बल प्रयोग करती है।

क्या ये अहंकार नहीं है?

SSC की अक्षमता का मूल कारण इसकी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी और निजी वेंडरों पर अंधी निर्भरता है। नई एजेंसी, जिसे हाल ही में टेंडर दिया गया, पहले भी कई परीक्षाओं में विफल रही है, फिर भी इसे SSC जैसे बड़े पैमाने की परीक्षाओं की जिम्मेदारी दी गई। जबकि हमारे पास नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए जैसी संस्था है जिसके पास कई बड़े एग्जाम कराने के पर्याप्त संसाधन हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या सरकार और SSC के अधिकारी इन टेंडर में निजी स्वार्थों को प्राथमिकता दे रहे हैं?

पुलिस की कार्रवाई और लाठीचार्ज ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्र और शिक्षक कोई अपराधी नहीं थे, वे केवल अपने हक की मांग कर रहे थे। फिर भी, उन्हें लाठियों और गिरफ्तारियों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि दिव्यांग छात्रों को भी नहीं बख्शा गया, जो इस बात को बताता है कि सरकार युवाओं की आवाज को कितनी क्रूरता से दबाना चाहती है।

आगामी परीक्षा को लेकर ज्यादा टेंशन

छात्रों की टेंशन की सबसे बड़ी वजह आगामी SSC CGL 2025 जैसी बड़ी परीक्षा है, जिसमें 30 लाख उम्मीदवार हिस्सा लेंगे। अगर SSC छोटे पैमाने की परीक्षाओं को संभालने में विफल रही है, तो इतने बड़े पैमाने की परीक्षा में क्या होगा? यह डर लाखों युवाओं के मन में है और सरकार की चुप्पी इस डर को और बढ़ा रही है।

ये प्रदर्शन सुधार के लिए है

SSC और सरकार को यह समझना होगा कि ये प्रदर्शन केवल एक परीक्षा की गड़बड़ी के खिलाफ नहीं हैं, यह लाखों युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ के खिलाफ एक आक्रोश है। सरकार को चाहिए कि वह तुरंत एक स्वतंत्र जांच समिति गठित करे, वेंडर के टेंडर की समीक्षा करे और परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करे।

अगर सरकार और SSC इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लेते, तो यह आंदोलन और तेज होगा। 2018 के प्रदर्शनों ने सरकार को झुकने के लिए मजबूर किया था और 2025 में भी युवा अपनी मांगों को मनवाने के लिए तैयार हैं। यह समय है कि सरकार अपनी जवाबदेही स्वीकार करे और इन छात्रों के 'मन की बात' सुने, वरना यह आक्रोश एक बड़े विद्रोह का रूप ले सकता है। लाखों युवाओं का भविष्य दांव पर है और इसे नजरअंदाज करना न केवल मूर्खता है, बल्कि देश के भविष्य के साथ विश्वासघात है।