शराब नीति मामला: केजरीवाल-सिसोदिया को HC से मिला 'आखिरी मौका', जानें क्या बोलीं जस्टिस स्वर्णकांता
ईडी ने याचिका में मांग की है कि शराब नीति घोटाला मामले में केजरीवाल समेत अन्य आरोपियों को बरी करते हुए ट्रायल कोर्ट ने जो टिप्पणी की थीं उन्हें रिकॉर्ड से हटाया जाए।

दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत अन्य को कथित शराब घोटाल मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की उस याचिका पर जवाब दायर का अंतिम मौका दिया है जिसमें ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों को हटाने की मांग की है। ईडी ने याचिका में मांग की है कि शराब नीति घोटाला मामले में केजरीवाल समेत अन्य आरोपियों को बरी करते हुए ट्रायल कोर्ट ने जो टिप्पणी की थीं उन्हें रिकॉर्ड से हटाया जाए।
कोर्ट ने साथ ही कहा कि यह देखते हुए कि पिछली सुनवाई की तारीख पर समय मांगने के बावजूद एक को छोड़कर किसी भी प्रतिवादी ने अपना जवाब दाखिल नहीं किया, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि कोर्ट 22 अप्रैल को इस मामले में दलीलें सुनेगी। एजेंसी की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कहा कि विनोद चौहान को छोड़कर अन्य सभी ने याचिका पर अपना जवाब दाखिल नहीं करने का विकल्प चुना है।

27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट ने किया था बरी
कोर्ट ने 19 मार्च को केजरीवाल और अन्य को ईडी की याचिका पर जवाब दायर के लिए 2 अप्रैल तक का समय दिया था।
आपको बता दें कि 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल और सिसोदिया को शराब नीति मामले में बरी कर दिया था। तब कोर्ट ने सीबीआई के केस की कड़ी आलोचना की थी और कहा था कि यह केस पूरी तरह से अटकलों और अनुमानों पर टिका है और इसमें कोई ठोस सबूत नहीं है।
ईडी का क्या कहना है?
ईडी का कहना है कि ट्रायल कोर्ट में सुनवाई के दौरान केस में पक्षकार नहीं थी और न ही उनकी बातों को सुना गया। बरी करते समय एजेंसी के खिलाफ ऐसी टिप्पणियां कर दीं, जिनसे उसकी जांच और साख पर असर पड़ सकता है।
गंभीर और अपूरणीय क्षति होगी
कोर्ट ने कहा है कि केजरीवाल और अन्य को आरोपमुक्त करते हुए ट्रायल कोर्ट ने अपनी सीमा से बाहर जाकर टिप्पणी की थीं, ऐसे में पीएमएलए (मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम) के तहत स्वतंत्र रूप से की गई जांच से जुड़ी उन टिप्पणियों को हटाया जाना चाहिए। साथ ही ईडी ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट की अनिंयत्रित और निराधार टिप्पणियों को रखा गया तो आम जनता के साथ-साथ याचिकाकर्ता को भी गंभीर और अपूरणीय क्षति होगी।
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