दिल्ली की हवा में घुल रहा नया जहर! क्या होता है ग्राउंड-लेवल ओजोन और कितना खतरनाक
Ground Level Ozone: विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में दिल्ली और एनसीआर को सिर्फ स्मॉग ही नहीं, बल्कि 'अदृश्य प्रदूषण' यानी ओजोन से भी बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ सकती है।

Ground Level Ozone: दिल्ली की हवा को लेकर अब एक नई और ज्यादा चिंता सामने आ रही है। राजधानी में पिछले कुछ वर्षों में पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे प्रदूषण स्तर में कुछ गिरावट जरूर दर्ज की गई, लेकिन अब एक नई आफत तेजी से उभर रही है। नई आफत का नाम है- ग्राउंड लेवल ओजोन। यह वह ओजोन नहीं है जो धरती को सूर्य की खतरनाक किरणों से बचाती है, बल्कि जमीन के करीब बनने वाली वह जहरीली गैस है जो हमारे फेफड़ों और सांस की सेहत के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
अक्सर ओजोन शब्द सुनते ही लोगों के मन में वातावरण की सुरक्षात्मक ओजोन परत की छवि आती है, जो धरती को अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाती है। लेकिन दिल्ली में जिस ओजोन की बात हो रही है, वह जमीन के करीब बनने वाला ‘बैड ओजोन’ है।
‘अच्छा’ और ‘बुरा’ ओजोन
यह गैस सांस लेने में दिक्कत, गले में जलन, आंखों में परेशानी और फेफड़ों की बीमारियों को बढ़ा सकती है। अस्थमा और सांस संबंधी रोगों से जूझ रहे लोगों के लिए यह और ज्यादा खतरनाक मानी जाती है। खासतौर पर वे लोग जो लंबे समय तक बाहर काम करते हैं, जैसे ट्रैफिक पुलिस, डिलीवरी कर्मचारी और मजदूर, ज्यादा जोखिम में रहते हैं।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़ों पर आधारित एक नई रिपोर्ट ने यह चिंताजनक तस्वीर सामने रखी है। रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली में औसत वार्षिक ओजोन स्तर 2021 में 52 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था, जो 2025 में बढ़कर 66 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया है। इसके साथ ही, ओजोन-प्रधान दिनों की संख्या में भी लगातार इजाफा हो रहा है।
हवा साफ, लेकिन खतरा बढ़ा
दिल्ली की हवा कई बार पहले से ज्यादा साफ दिखाई देती है। सर्दियों की तुलना में गर्मियों में धुंध और स्मॉग कम नजर आता है, लेकिन यही वह समय है जब ओजोन तेजी से बनता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ओजोन सीधे किसी फैक्ट्री या वाहन से नहीं निकलता। यह तब बनता है जब सूरज की तेज रोशनी नाइट्रोजन ऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करती है।
यही वजह है कि मई-जून जैसे गर्म महीनों में, जब धूप तीखी होती है और आसमान साफ रहता है, तब ओजोन का स्तर तेजी से बढ़ जाता है। यानी जिस मौसम में लोगों को लगता है कि प्रदूषण कम है, उसी समय एक अदृश्य प्रदूषक खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है।
दिल्ली में प्रदूषण के दो हिस्से
अक्टूबर से फरवरी: ठंडी और स्थिर हवा के कारण पीएम2.5 और पीएम10 जैसे सूक्ष्म कण हवा में फंस जाते हैं। इसी दौरान स्मॉग और जहरीली धुंध सबसे ज्यादा देखने को मिलती है।
गर्मी और प्री-मानसून सीजन: तापमान और तेज धूप के कारण ओजोन बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। इस दौरान भले ही धूल और धुआं कम दिखे, लेकिन हवा ज्यादा जहरीली हो सकती है। मानसून के दौरान बारिश और तेज हवाएं कणीय प्रदूषण को कुछ हद तक साफ कर देती हैं, लेकिन ओजोन की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती।
NCR में भी तेजी से बढ़ रहा खतरा
यह समस्या सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, नोएडा, मेरठ, मुजफ्फरनगर और एनसीआर के कई अन्य शहरों में भी ओजोन स्तर में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। राजस्थान के भरतपुर जैसे शहरों में तो ओजोन लंबे समय से ऊंचे स्तर पर बना हुआ है।
हालांकि, सभी जगह तस्वीर एक जैसी नहीं है। उदाहरण के तौर पर बुलंदशहर में ओजोन स्तर में तेज गिरावट दर्ज हुई है। इससे यह साफ होता है कि स्थानीय परिस्थितियां, यातायात, औद्योगिक गतिविधियां और मौसम की स्थिति इस समस्या को काफी प्रभावित करती हैं।
निपटना ज्यादा मुश्किल कैसे?
विशेषज्ञों का कहना है कि ओजोन पर नियंत्रण करना पीएम2.5 की तुलना में ज्यादा कठिन है। कारण यह है कि यह सीधे उत्सर्जित नहीं होता। इसे कम करने के लिए वाहनों, उद्योगों और दूसरे स्रोतों से निकलने वाले कई प्रकार के प्रदूषकों को एक साथ नियंत्रित करना पड़ता है।
इसके अलावा तापमान, धूप, हवा की दिशा और आर्द्रता जैसी मौसम संबंधी स्थितियां भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं। इसलिए सिर्फ एक फैक्ट्री बंद करने या ट्रैफिक घटाने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होती।
दिल्ली की हवा अब पहले जैसी नहीं रही
बीते एक दशक के आंकड़े बताते हैं कि पीएम2.5 और पीएम10 के स्तर में कुछ कमी आई है, लेकिन वे अभी भी सुरक्षित मानकों से काफी ऊपर हैं। अब ओजोन के बढ़ते स्तर ने यह साफ कर दिया है कि दिल्ली की हवा केवल “साफ” या “गंदी” जैसी सरल श्रेणियों में नहीं बांटी जा सकती।
राजधानी की प्रदूषण समस्या अब और ज्यादा जटिल हो गई है, जहां एक प्रदूषक घटता है, वहीं दूसरा नया खतरा बनकर उभर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में दिल्ली और एनसीआर को सिर्फ स्मॉग ही नहीं, बल्कि 'अदृश्य प्रदूषण' यानी ओजोन से भी बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ सकती है।




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