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भाई ने किया था लड़की का रेप, अदालत ने उसकी बहन को भी क्यों दी 10 साल की सजा

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2013 के एक सनसनीखेज मामले में आरोपी महिला को अपने नाबालिग भाई से रेप करवाने में मदद करने का दोषी ठहराते हुए 10 साल की सख्त कैद की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि आरोपी ने भरोसे को तोड़ते हुए अपराध में “सक्रिय और जानबूझकर” भूमिका निभाई।

Tue, 31 March 2026 03:08 PMRatan Gupta लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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भाई ने किया था लड़की का रेप, अदालत ने उसकी बहन को भी क्यों दी 10 साल की सजा

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2013 के एक सनसनीखेज मामले में आरोपी महिला को अपने नाबालिग भाई से रेप करवाने में मदद करने का दोषी ठहराते हुए 10 साल की सख्त कैद की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि आरोपी ने भरोसे को तोड़ते हुए अपराध में “सक्रिय और जानबूझकर” भूमिका निभाई।

न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा की पीठ ने कहा कि आरोपी महिला ने पीड़िता को नौकरी का झांसा देकर नजफगढ़ के एक सुनसान इलाके में बुलाया, जहां उसके नाबालिग भाई ने दुष्कर्म किया। कोर्ट ने पाया कि महिला न सिर्फ घटना के दौरान मौके पर मौजूद थी, बल्कि उसने पीड़िता को धमकाकर चुप रहने के लिए भी मजबूर किया।

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अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 (रेप) के साथ धारा 109 (उकसाने/सहयोग) के तहत 10 साल की सश्रम कारावास और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इसके अलावा धारा 366 (अपहरण/बहला-फुसलाकर ले जाना) के तहत 5 साल की सजा और 20 हजार रुपये जुर्माना, तथा धारा 506 (आपराधिक धमकी) और 323 (मारपीट) के तहत अतिरिक्त सजा भी दी गई है। सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी।

कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि आरोपी का आपराधिक इतिहास, जिसमें हत्या का एक मामला भी शामिल है, यह दर्शाता है कि यह कोई एकल घटना नहीं बल्कि लगातार आपराधिक व्यवहार का हिस्सा है। अदालत ने साफ किया कि ऐसे मामलों में नरमी बरतना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।

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मामले में एक अहम मोड़ यह था कि ट्रायल कोर्ट ने 2015 में आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। हालांकि, राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 23 फरवरी को उस फैसले को पलट दिया और महिला को दोषी करार दिया।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जुर्माने की राशि में से 50 हजार रुपये पीड़िता को मुआवजे के रूप में दिए जाएं। साथ ही दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को भी पीड़िता को अतिरिक्त मुआवजा देने का निर्देश दिया गया है।

अदालत ने माना कि पीड़िता ने एक दशक से अधिक समय तक मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक पीड़ा झेली है, इसलिए उसे न्याय के साथ-साथ उचित सहायता मिलना जरूरी है।

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