'अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार केवल…' दिल्ली हाईकोर्ट की दोटूक, ट्रिब्यूनल का फैसला पलटा
दिल्ली हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह अधिकार केवल तात्कालिक आर्थिक संकट से जूझ रहे जरूरतमंद परिवारों के लिए है, न कि लंबे समय बाद रोजगार पाने का कोई वैकल्पिक जरिया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति जरूरतमंद परिवार को दिए जाने का प्रावधान है। पहले से खुद की गुजर-बसर अच्छे से करने वाले परिवार को इस तरह की राहत नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट ने दोहराया कि अनुकंपा नियुक्ति को सार्वजनिक रोजगार के वैकल्पिक तरीके या किसी मृत कर्मचारी के परिवार के लंबे समय तक चलने वाले आर्थिक पुनर्वास के साधन के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
जस्टिस शैल जैन की बेंच ने यह टिप्पणी बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए की। इस याचिका में कंपनी ने इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें कंपनी को एक मृत कर्मचारी के बेटे को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने पर विचार करने का निर्देश दिया गया। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल का वर्ष 2014 का फैसला रद्द किया।
काम के दौरान करंट लगने से हुई थी मौत
बेंच ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति की मांग लगभग साढ़े 6 साल की बिना किसी वजह के हुई देरी के बाद उठाई गई। साथ ही, यह परिवार उस समय किसी ऐसी तत्काल आर्थिक तंगी में नहीं था, जैसा कि लागू योजना के तहत माना जाता है। मृत कर्मचारी पहले दिल्ली विद्युत बोर्ड में लाइनमैन था। उसकी सेवाएं बाद में बीएसईएस को हस्तांतरित हो गई थीं। उसकी अगस्त 2003 में काम के दौरान बिजली का झटका लगने से मौत हो गई थी। उसके परिवार को पारिवारिक पेंशन के अलावा लाभों के तौर पर सात लाख रुपये से ज्यादा की रकम मिली थी।
पूर्व आदेश का हवाला दिया
इस मामले में केनरा बैंक बनाम अजितकुमार जीके (2025) मामले का हवाला दिया गया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य केवल उन परिवारों को तत्काल आर्थिक सहायता देना है, जिन्हें काम के दौरान कर्मचारी की मृत्यु हो जाने के कारण अचानक आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है।
सात साल बाद मांगी नौकरी
कर्मचारी के बेटे ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए फरवरी 2010 में आवेदन किया था। जबकि कर्मचारी की मौत वर्ष 2003 में हो गई थी। कंपनी ने उसका अनुरोध अस्वीकार कर दिया, जिसके बाद यह विवाद इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल तक पहुंचा। ट्रिब्यूनल ने दावा करने वाले के पक्ष में फैसला सुनाया और नियोक्ता को निर्देश दिया कि वह मामले पर उसकी योग्यता के आधार पर विचार करे। ट्रिब्यूनल का फैसला रद्द करते हुए बेंच ने टिप्पणी की कि अनुकंपा नियुक्ति अनुच्छेद 14 और 16 के तहत सार्वजनिक रोजगार में समानता के संवैधानिक आदेश का केवल एक अपवाद है। इसे अधिकार के तौर पर नहीं मांगा जा सकता।




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