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10 साल बाद अदालत ने माना वो निर्दोष था, पर 'भागने' की मिलेगी सजा

यह मामला जाकिर हुसैन नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जिस पर अपनी पत्नी नूर सबा को आत्महत्या के लिए उकसाने, दहेज मांगने और मानसिक प्रताड़ना देने के आरोप थे।

Mon, 30 March 2026 06:24 PMRatan Gupta नई दिल्ली, पीटीआई
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10 साल बाद अदालत ने माना वो निर्दोष था, पर 'भागने' की मिलेगी सजा

दिल्ली की एक अदालत ने 2015 के दहेज-मौत और क्रूरता के एक मामले में आरोपी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। हालांकि, अदालत ने सुनवाई से गैरहाजिर रहने और फरार रहने के चलते आरोपी को IPC की धारा 174A के तहत दोषी करार दिया है। यह मामला जाकिर हुसैन नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जिस पर अपनी पत्नी नूर सबा को आत्महत्या के लिए उकसाने, दहेज मांगने और मानसिक प्रताड़ना देने के आरोप थे। मामले की सुनवाई कर रहीं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश स्वाति गुप्ता ने कहा कि आरोप लगाने वाला पक्ष अपनी बात को साबित नहीं कर पाया।

आरोपी के खिलाफ नहीं मिली ठोस सबूत

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष के पास ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है, जो आरोपी के खिलाफ आरोपों को साबित कर सके।

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अभियोजन के अनुसार, नूर सबा ने जुलाई 2015 में उत्तम नगर स्थित अपने घर में फांसी लगाने की कोशिश की थी। गंभीर हालत में उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। दंपति की शादी 9 अगस्त 2014 को हुई थी।

पिता ने लगाया दहेज और प्रताड़ना का आरोप

नूर सबा के पिता ने शुरुआत में आरोप लगाया था कि आरोपी ने दुकान खोलने के लिए 10 लाख रुपये की मांग की थी और उनकी बेटी को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था। उन्होंने यह भी दावा किया था कि आरोपी दहेज को लेकर ताने देता था।

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अपने ही बयान से मुकर गए पिता

हालांकि, ट्रायल के दौरान पिता अपने ही आरोपों से मुकर गए और उन्होंने अदालत में कहा कि आरोपी ने उनसे कभी दहेज या पैसे की मांग नहीं की। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी बेटी ने कभी किसी तरह की प्रताड़ना की शिकायत नहीं की थी। इस वजह से उन्हें “शत्रुतापूर्ण गवाह” (hostile witness) घोषित कर दिया गया।

ट्रायल के दौरान अन्य गवाह भी मुकर गए

मामले में अन्य गवाहों, जैसे मृतका की बहन और चचेरे भाई ने भी अभियोजन के आरोपों का समर्थन नहीं किया। अदालत ने कहा कि मुख्य गवाहों के मुकर जाने से केस पूरी तरह कमजोर हो गया और दहेज उत्पीड़न या मृत्यु से पहले किसी तरह की प्रताड़ना साबित नहीं हो सकी।

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दहेज-मौत केस में बरी हुआ आरोपी

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि IPC की धारा 304B (दहेज मृत्यु) के तहत दोष साबित करने के लिए यह जरूरी है कि मौत से ठीक पहले दहेज को लेकर प्रताड़ना हुई हो, जो इस मामले में साबित नहीं हो सकी। साथ ही, धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत भी आरोपी की कोई भूमिका सामने नहीं आई।

अदालत में पेश नहीं होने के चलते दोषी ठहराया गया

हालांकि, अदालत ने पाया कि आरोपी सुनवाई के दौरान लंबे समय तक अदालत में पेश नहीं हुआ और उसे 2016 में घोषित अपराधी (Proclaimed Offender) करार दिया गया था। इसी आधार पर उसे धारा 174A के तहत दोषी ठहराया गया।

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