किसी भूत को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते; दिल्ली HC ने लूट के आरोपी को क्यों कर दिया बरी?
दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2000 के एक पुराने लूट और गोलीबारी के मामले में दोषी ठहराए गए शख्स की सजा को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया है। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष हमलावर की पहचान स्थापित करने में पूरी तरह विफल रहा

दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2000 के एक पुराने लूट और गोलीबारी के मामले में दोषी ठहराए गए शख्स की सजा को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया है। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष हमलावर की पहचान स्थापित करने में पूरी तरह विफल रहा और जांच के कई महत्वपूर्ण पहलू अविश्वसनीय थे। जस्टिस विमल कुमार यादव ने आपराधिक मुकदमों में सही पहचान के महत्व पर जोर देते हुए एक कड़ी टिप्पणी की।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा कि आप किसी भूत को अपराध के लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। अदालत के अनुसार, जब तक हमलावर के अपराध में शामिल होने के बारे में निश्चितता न हो, तब तक किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
मामला जून 2000 में एक पार्किंग क्षेत्र में हुई लूटपाट से जुड़ा था, जिसमें दो लोगों पर हमला किया गया था और एक व्यक्ति को गोली मार दी गई थी। पुलिस ने घटना के कई महीनों बाद आरोपी को एक अलग मामले में गिरफ्तार किया था और दावा किया था कि उसके पास से पीड़ित का ब्रीफकेस बरामद हुआ है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस थ्योरी को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यह तर्क और सामान्य समझ के खिलाफ है कि कोई अपराधी महीनों तक पीड़ित के दस्तावेजों वाला ब्रीफकेस अपने पास रखेगा, जो उसे अपराध से जोड़ सके।
अदालत ने जांच प्रक्रिया में कई गंभीर खामियां पाईं। मुख्य गवाह ने गवाही दी थी कि घटना के समय अंधेरा था और वह केवल धुंधले चेहरे देख पा रहा था, साथ ही उसे आंखों की समस्या भी थी। दूसरे पीड़ित ने हमलावरों को देखा ही नहीं था। इसके अलावा, शिनाख्त परेड (TIP) की प्रक्रिया पर भी सवाल उठे, क्योंकि यह संभावना थी कि गवाह को आरोपी पहले ही दिखा दिया गया था। पुलिस की बरामदगी की कहानी में विरोधाभासों और स्वतंत्र गवाहों की कमी को देखते हुए, हाईकोर्ट ने आरोपी को बेनिफिट ऑफ डाउट दिया और निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए उसे सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।




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