'उमर खालिद एंड हिज वर्ल्ड', किताब में जेल में बिताए 5 वर्षों की कहानी, दिल्ली दंगे के मामले में हुई है गिरफ्तारी
दिल्ली दंगे के सिलसिले में गिरफ्तार जेएनयू के पूर्व शोधार्थी उमर खालिद को लेकर एक किताब लिखी गई है। यह किताब जेल में बिताए उनके पांच वर्षों की एक झलक पेश करती है, जिसमें आशा, प्रतिरोध और असहमति की कीमत जैसे विषयों को प्रमुखता दी गई है। किताब में कई हस्तियों ने अपना योगदान दिया है।

दिल्ली दंगे के सिलसिले में गिरफ्तार जेएनयू के पूर्व शोधार्थी उमर खालिद को लेकर एक किताब लिखी गई है। यह किताब जेल में बिताए उनके पांच वर्षों की एक झलक पेश करती है, जिसमें आशा, प्रतिरोध और असहमति की कीमत जैसे विषयों को प्रमुखता दी गई है। किताब में जानी-मानी हस्तियों ने अपना योगदान दिया है।
जेल में बंद छात्र कार्यकर्ता उमर खालिद द्वारा और लोगों की ओर से उनके बारे में लिखे गए पत्रों, निबंधों और विचारों का संकलन करती 'उमर खालिद एंड हिज वर्ल्ड' नामक किताब सामने आई है। इसमें गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मुकदमे का सामना करते हुए जेल में बिताए उनके पांच वर्षों की एक झलक पेश की गई है। किताब का संपादन शोधकर्ता और कार्यकर्ता अनिर्बन भट्टाचार्य, कलाकार शुद्धब्रता सेनगुप्ता और लेखिका और उमर की साथी बनोज्योत्सना लाहिड़ी ने किया है। किताब में इन लोगों ने खुद को उमर की आत्मीय साथी बताया है।
संपादकों ने अपनी प्रस्तावना में लिखा है कि इस किताब में उमर का नाम लक्षित व्यक्ति के रूप में अंकित है। लेकिन, वास्तव में यह हर उस व्यक्ति के लिए है जो सलाखों के पीछे है या सलाखों के पीछे डाले जाने के खतरे में है। ऐसा इसलिए है कि उसने एक बेहतर कल की कामना करने, सपने देखने और उसके लिए कार्य करने का साहस किया है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व शोधार्थी खालिद को 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी में हुए दंगों के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। खालिद की जमानत याचिका कई बार खारिज की जा चुकी है।
किताब की शुरुआत खालिद द्वारा जेल से लिखे गए दो अप्रकाशित पत्रों से होती है। एक पत्र में वे '21वीं सदी के भारतीय फासीवाद' के उदय पर विचार करते हैं। उमर तर्क देते हैं कि कई भारतीयों के वास्तविक अनुभव संविधान में निहित स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के वादों से मेल नहीं खाते। वे लिखते हैं कि हमने देखा है कि कैसे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों के प्रति समर्पित एक लोकतांत्रिक गणराज्य को भीतर से खोखला कर दिया गया है।
इस संग्रह में कई जानी-मानी हस्तियों के योगदान शामिल हैं। इनमें इतिहासकार रोमिला थापर और रामचंद्र गुहा, कार्यकर्ता आनंद तेलतुंबडे और हास्य कलाकार कुणाल कामरा शामिल हैं। इस किताब में कार्यकर्ताओं और विद्वानों के भाषण, कविताएं और पत्र संकलित हैं, जिनमें खालिद के कुछ सह-आरोपी जैसे शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा और नताशा नरवाल भी शामिल हैं।
जेएनयू की प्रोफेसर एमेरिटा थापर का इतिहास की बदलती व्याख्या पर दिया गया भाषण भी इस किताब में शामिल है। एमेरिटा ने बताया कि कैसे आजादी और इंकलाब जिंदाबाद जैसे शब्द स्वतंत्रता आंदोलन की नींव थे। उन्होंने लिखा कि आज भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो आश्चर्यजनक रूप से इन शब्दों के प्रयोग को राष्ट्र-विरोधी मानते हैं।
पुस्तक का समापन न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी द्वारा खालिद को लिखे हस्तलिखित संदेश से होता है। ममदानी अपने संदेश में लिखते हैं कि मुझे अक्सर कड़वाहट पर आपके शब्द और इसे स्वयं को नष्ट न करने देने के महत्व की याद आती है। आपके माता-पिता से मिलकर बहुत खुशी हुई। हम सभी आपके बारे में सोच रहे हैं।




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