भ्रष्टाचार के आरोप सार्वजनिक, सरकार की नीयत पर शक नहीं; जिमखाना क्लब को लेकर बोलीं पूर्व बोर्ड सदस्य
निजी सप्रा ने कहा, 'जहां तक मेरे बोर्ड सदस्य होने की बात है, क्योंकि मैं भ्रष्ट गुट का हिस्सा नहीं हूं, इसलिए मैंने अपनी आवाज को दबने नहीं दिया, उनके पास लोगों की एक टीम है जो भ्रष्टाचार के लिए जानी जाती है।

दिल्ली जिमखाना क्लब की पूर्व बोर्ड सदस्य, निजी सप्रा ने मंगलवार को क्लब सदस्यों से सरकार की मंशा पर शक न करने को कहा, और साथ ही यह भी कहा कि क्लब को किसी भी कीमत पर बचाया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने क्लब में हो रहे भ्रष्टाचार और अनियमितता के मुद्दे को भी उठाया और कहा कि भ्रष्ट लोगों का साथ नहीं देने की वजह से ही क्लब में नौकरी कर रहे कई लोगों को नौकरी से हटा दिया गया।
ANI से बातचीत में उन्होंने कहा कि, 'मैं 2014 से 2017 तक दिल्ली जिमखाना क्लब की बोर्ड सदस्य रही हूं। मैं गवर्निंग कमेटी का भी हिस्सा रही हूं, और इसलिए, यह मेरा क्लब है। मैंने क्लब की सेवा की है। मैं भविष्य में भी क्लब की सेवा करना चाहूंगी। मैं नहीं चाहूंगी कि यहां से किसी को निकाला जाए या क्लब को कहीं और शिफ़्ट किया जाए। साथ ही, हम हमेशा सरकार की मंशा पर शक नहीं कर सकते। अगर सुरक्षा से जुड़ी कोई चिंताएं हैं या कोई और वजह है जिसे अभी सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, तो ठीक है।'
उन्होंने आगे कहा, 'मैं असल में यही चाहूंगी कि क्लब के सदस्य अपनी याचिकाएं पेश करें ताकि सबसे मजबूत बचाव पक्ष तैयार हो सके, हमारे क्लब को बचाने की कोशिश की जाए, और कानूनी प्रक्रिया को अपना काम करने दिया जाए, और पूरी निष्पक्षता के साथ इन मामलों पर फैसला हो। एक सदस्य के तौर पर, मैं चाहूंगी कि मेरा क्लब किसी भी कीमत पर बच जाए।'
यह पूछे जाने पर कि क्या जिमखाना क्लब को खाली कराने का मामला भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा है, तो उन्होंने कहा, 'भ्रष्टाचार के आरोप सार्वजनिक जानकारी में हैं। मैं कोई नई बात नहीं बता रही हूं। सदस्यों ने खुद ही, लगभग 2016 या 2017 में, मिलकर उस समय की कमेटियों को लिखा था कि वे निष्पक्षता चाहते हैं, वे पारदर्शिता चाहते हैं, वे सभी विवरण जानना चाहते हैं। यह सदस्यों का पैसा है, यह सदस्यों का क्लब है। कमेटी के कुछ लोग मनमाने ढंग से इसे नहीं चला सकते।'

निजी सप्रा ने आगे कहा, 'मैंने पहले भी बहुत मनमानी देखी है, और उन कर्मचारियों को नौकरी से निकालते हुए देखा है जो भ्रष्ट लोगों के प्रति वफादार नहीं थे। यह अपनी सुविधा का मामला है। जब कोई कर्मचारी उनके भ्रष्टाचार में उनका साथ नहीं देता, तो वे उसे नौकरी से निकाल देते हैं, लेकिन अब अचानक वे कर्मचारियों को लेकर बहुत चिंतित हो गए हैं।
आगे उन्होंने कहा, 'जहां तक मेरे बोर्ड सदस्य होने की बात है, क्योंकि मैं भ्रष्ट गुट का हिस्सा नहीं हूं, इसलिए मैंने अपनी आवाज को दबने नहीं दिया। मैं बोर्ड में थी। उस समय के प्रेसिडेंट, प्रशांत सुकुल ने मुझे निशाना बनाया। उनके पास लोगों की एक टीम है जो भ्रष्टाचार के लिए जानी जाती है और जिन्होंने भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप दे दिया है। उन्हें लगता है कि उन पर कोई हाथ नहीं डाल सकता। ये वे लोग हैं जो क्लब के 'एलीट' (अभिजात वर्ग) हैं। ये वे लोग हैं जो जो चाहें कर सकते हैं। मुझे निलंबित कर दिया गया, और फिर बिना किसी उचित प्रक्रिया के, बिना किसी कारण बताओ नोटिस के, बिना किसी चीज के, बोर्ड से मेरी सदस्यता समाप्त कर दी गई। क्लब का प्रेसिडेंट किस हद तक मामलों को अपने हाथों में ले सकता है, यह उसका एक उदाहरण है।'
इस बीच, दिल्ली हाई कोर्ट ने क्लब सदस्यों, स्टाफ वेलफेयर एसोसिएशन और अन्य लोगों द्वारा दायर दीवानी मुकदमों पर केंद्र सरकार और दिल्ली जिमखाना क्लब के प्रबंधन को समन जारी किया है। इन मुकदमों में केंद्र सरकार के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसके तहत वह नई दिल्ली के सफ़दरजंग रोड स्थित क्लब परिसर को वापस लेना चाहती है।
सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के सामने यह साफ किया कि केंद्र सरकार के 22 मई के आदेश से सिर्फ 'परपेचुअल लीज' (स्थायी पट्टा) को रद्द किया गया है, और लीज डीड के क्लॉज 4 के तहत जिमखाना की जमीन पर दोबारा प्रवेश की मांग की गई है। उन्होंने कहा कि यह पत्र तत्काल बेदखली का आदेश नहीं था, और उन्होंने अदालत को भरोसा दिलाया कि यदि बेदखली की कोई कार्यवाही की जाती है, तो वह केवल कानून के अनुसार और उचित नोटिस जारी करने के बाद ही की जाएगी।
हाई कोर्ट ने इस चरण पर कोई और अंतरिम निर्देश देने से इनकार कर दिया। बेंच ने टिप्पणी की कि केंद्र के इस आश्वासन को देखते हुए कि यदि कोई बेदखली होती है, तो वह उचित प्रक्रिया और पूर्व नोटिस के बाद ही होगी, इसलिए फिलहाल किसी अंतरिम सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है।
यह विवाद केंद्र सरकार के 22 मई के उस आदेश से शुरू हुआ है, जिसमें दिल्ली जिमखाना क्लब को 5 जून तक परिसर का शांतिपूर्ण कब्जा सौंपने का निर्देश दिया गया था। इस आदेश में 1928 में हुए 'परपेचुअल लीज़ डीड' (स्थायी पट्टा विलेख) के क्लॉज़ 4 का हवाला दिया गया है, जिसके तहत अगर परिसर की जरूरत किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए होती है, तो पट्टा देने वाले को दोबारा प्रवेश करने की अनुमति होती है।




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