केजरीवाल ने खुद RSS से ली मदद; जस्टिस पर सवाल उठाने पर कांग्रेस नेता ने घेरा
कांग्रेस नेता अभिषेक दत्त ने अरविंद केजरीवाल पर जोरदार हमला बोला है। उन्होंने कहा- केजरीवाल ने तो खुद आरएसएस से मदद ली है। आम आदमी पार्टी तो खुद आरएसएस से ही निकल कर आई है।

आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल को दिल्ली हाईकोर्ट से झटका लग चुका है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत ने सोमवार को मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने से इनकार करते हुए अरविंद केजरीवाल और अन्य लोगों की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया था। केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने याचिका मं जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से मामले से अलग हो जाने की मांग की थी। याचिका खारिज किए जाने के बाद दूसरे दिन भी इस मसले पर सियासत गर्म रही।
केजरीवाल की पार्टी तो खुद आरएसएस से निकली
कांग्रेस नेता अभिषेक दत्त ने मंगलवार को अरविंद केजरीवाल पर जोरदार हमला बोला। उन्होंने कहा- केजरीवाल ने अपनी दलील में कहा है कि जज ने आरएसएस के सेमिनार को अटैंड किया है। अरविंद केजरीवाल ने तो खुद आरएसएस से मदद ली है। उनकी पार्टी तो आरएसएस से ही निकल कर आई है। साल 2010 में केजरीवाल इंडिया अगेंस्ट करप्शन की बैठकें विवेकानंद फाउंडेशन में ही करते थे।
बेबुनियाद बातों से कम होती है क्रेडिबिलिटी
अभिषेक दत्त ने दावा किया कि आरएसएस के लोगों ने सामने आकर बोला है कि उन्होंने केजरीवाल की मदद की है। वह शख्स जो आरएसएस की मदद लेकर आम आदमी पार्टी बनाता है। यही नहीं भाजपा के कहने पर चुनाव भी लड़ता है। वह ऐसी बेबुनियाद बातें जब करता है तो उसकी क्रेडिबिलिटी कम होती है। मेरा मानना है कि जज ऐसे आरोपों से ऊपर होते हैं। केजरीवाल ने ऐसी दलील केवल सिंपैथी कार्ड खेलने के लिए दी थी जो उन पर उल्टा पड़ेगी।
अरविंद केजरीवाल की मांग दुर्भाग्यपूर्ण- रेखा गुप्ता
एक दिन पहले दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा था कि न्यायाधीश को हटाने की अरविंद केजरीवाल की मांग दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का विश्वास कमजोर होने का खतरा है। दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और गरिमा पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता है।
फैसले में क्या कहा था अदालत ने…
जस्टिस शर्मा ने कहा कि यह अदालत संस्था के सम्मान के लिए खड़ी रहेगी। मैं खुद को इस मामले से अलग नहीं करूंगी। किसी भी वादी को बिना किसी ठोस सबूत के न्यायाधीश की निष्पक्षता पर सवाल उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। कोई न्यायाधीश किसी वादी के निराधार डर को दूर करने के लिए खुद को मामले से अलग नहीं कर सकता है। किसी राजनीतिक नेता को बिना किसी ठोस आधार के किसी संस्था को नुकसान पहुंचाने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि किसी न्यायाधीश पर किया गया व्यक्तिगत हमला पूरी न्यायपालिका पर हमला होता है।




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