राष्ट्रपति भवन से जुड़े 32 साल पुराने एक मामले में सभी आरोपी बरी, कोर्ट ने की CBI की खिंचाई
अदालत ने मुकदमे में हुई अत्यधिक देरी पर भी टिप्पणी की। न्यायाधीश ने कहा कि अगर इस मामले में ट्रायल इतना लंबा न चला होता, तो शायद और भी सबूत सामने आ सकते थे, जिससे कोर्ट सच का पता लगाने की बेहतर स्थिति में होता।

दिल्ली की एक अदालत ने करीब 30 साल पुराने हेराफेरी के एक मामले में फैसला सुनाते हुए इसके तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। वहीं ऐसे दो आरोपियों, सुनवाई के दौरान जिनकी मौत हो चुकी है, उनके खिलाफ भी कार्यवाही को खत्म कर दिया है। यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर शुरू किया गया था, और इसके आरोपियों पर राष्ट्रपति भवन के सचिवालय के दस्तावेजों में हेराफेरी करने का आरोप था।
बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के अनुसार इस केस का फैसला दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ज्योति माहेश्वरी ने सुनाया और तीनों आरोपियों मोहन लाल जटिया, अशोक जटिया और अशोक जैन को आपराधिक साजिश, सबूतों से छेड़छाड़ और जालसाजी सहित सभी आरोपों से बरी कर दिया। वहीं मामले के दो अन्य आरोपी जो कथित अपराध के समय राष्ट्रपति सचिवालय में कार्यरत थे और बीते सालों के दौरान उनकी मृत्यु हो गई थी, उनके खिलाफ भी चल रही कार्यवाही खत्म कर दिया। इन दोनों आरोपियों की पहचान मिलाप चंद जगोत्रा और गुरचरण सिंह के रूप में हुई है।
कोर्ट ने की CBI की खिंचाई
अदालत ने अपने फैसले में अभियोजन पक्ष (CBI) की दलीलों को कमजोर बताते हुए कहा कि मामला केवल अनुमानों पर आधारित था। उन्होंने कहा, 'जब सबूतों का पूरी तरह से मूल्यांकन किया गया, तो इस अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष का मामला कानूनी सबूतों के बजाय केवल अनुमानों और अटकलों पर आधारित है। दूसरी ओर, आरोपी पक्ष अभियोजन पक्ष के मामले में गंभीर कमियां निकालने में सफल रहा है।'
1986 में शुरू हुआ था यह पूरा मामला
यह मामला 1986 में उस वक्त सामने आया था, जब मोहनलाल जटिया को 'विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी निवारण अधिनियम' (COFEPOSA) के तहत हिरासत में लिया गया था। इसके बाद जब जटिया ने अपनी हिरासत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और दावा किया कि अपनी रिहाई के लिए उन्होंने भारत के राष्ट्रपति को एक प्रतिवेदन सौंपा था, लेकिन उस पर कभी विचार नहीं किया गया।'
1994 में कोर्ट ने दिया मामला दर्ज करने का निर्देश
आरोपियों के इस दावे की प्रामाणिकता पर सुप्रीम कोर्ट को संदेह हुआ, और उन पर आधिकारिक रिकॉर्ड में छेड़छाड़ करते हुए फर्जी प्रविष्टियां करने और फर्जी सबूत गढ़ने का आरोप लगा। जिसके बाद इस शक को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में सीबीआई को इस मामले में आपराधिक शिकायत दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिया था।
CBI ने लगाया था फर्जी एंट्री करने का आरोप
अभियोजन पक्ष (CBI) ने अदालत में यह तर्क दिया कि राष्ट्रपति सचिवालय के 'डाक रजिस्टर' में एक विवादित प्रविष्टि को बाद में जानबूझकर जोड़ा गया था, ताकि यह झूठा दिखाया जा सके कि आरोपियों का प्रतिवेदन प्राप्त हो गया था। गवाहों ने गवाही दी कि वह प्रविष्टि अनियमित और संभवतः जाली प्रतीत होती थी, और इस दावे के समर्थन में फोरेंसिक रिपोर्ट भी पेश की गईं।
हालांकि, अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष इन आरोपों को 'उचित संदेह से परे' साबित करने में विफल रहा। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जीवित बचे किसी भी आरोपी को कथित जालसाजी या साजिश से सीधे तौर पर जोड़ने वाला कोई भी निर्णायक सबूत मौजूद नहीं है।
मुकदमे के 32 साल चलने पर भी टिप्पणी की
अदालत ने मुकदमे में हुई अत्यधिक देरी पर भी टिप्पणी की। न्यायाधीश ने कहा कि अगर इस मामले में ट्रायल इतना लंबा (32 साल) न चला होता, तो शायद और भी सबूत सामने आ सकते थे, जिससे कोर्ट सच का पता लगाने की बेहतर स्थिति में होता। अंत में कोर्ट ने कहा, 'जो भी हो, रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों की सावधानीपूर्वक जांच करने के बाद, अभियोजन पक्ष आरोपियों द्वारा कथित अपराध किए जाने की बात को, बिना किसी उचित संदेह के, साबित करने में नाकाम रहा है।' इसके साथ ही अदालत ने जीवित बचे तीनों आरोपियों को आरोपों से मुक्त कर दिया।




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