चोरी-छिपे बेटी की शादी तय करना पति के साथ है बड़ी क्रूरता; तलाक का भी आधार, HC का अहम फैसला
हाई कोर्ट ने समझाया कि यह मुद्दा नहीं है कि शादी बेटी की भलाई के लिए थी या नहीं। इस पूरे मामले को पूरी तरह से अपील करने वाले की नजर से और एक पिता के तौर पर देखा जाना चाहिए कि उसके अधिकारों को ही कुचल दिया गया है।

मद्रास हाई कोर्ट ने हाल ही में एक अहम व्यवस्था देते हुए कहा है कि अगर कोई पत्नी अपनी बेटी की शादी पति को बताए बिना गुप्त तरीके से चोरी-छिपे तय करती है, तो यह पति के साथ क्रूरता है और पति द्वारा तलाक लेने का यह आधार हो सकता है। एक पारिवारिक मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के जज जस्टिस सीवी कार्तिकेयन और के राजशेखर की डिवीजन बेंच ने यह फैसला एक ऐसे मामले में सुनाया जिसमें पत्नी ने अपनी 18 साल की बेटी की शादी चुपके से अपने भाई (बेटी के मामा) से तय कर दी थी, जो 32 साल का तलाकशुदा था।
मामले में अहम बात यह भी है कि महिला के इस भाई की पहले उसी के पति की भतीजी से शादी हुई थी, लेकिन वह शादी टूट गई थी और उस भतीजी ने अपने पति के खिलाफ पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई थी। मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की और कहा कि ऐसे हालात में पति को बहुत ज्यादा मानसिक तकलीफ होती है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला 'जी श्रीधर बनाम एस कोमला कुमारी' का है। दंपत्ति की शादी 1997 में हुई थी और उनके एक बेटा और एक बेटी हैं। विवाद तब शुरू हुआ जब पत्नी अपनी 18 वर्षीय बेटी को लेकर एक सप्ताह के लिए बेंगलुरु चली गई और वहां गुपचुप तरीके से उसकी शादी अपने ही भाई (लड़की के मामा) से तय कर दी। इस शादी के बारे में न तो पति को पता था और न ही उनके बेटे को।
मामा का विवादित इतिहास
इस मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई क्योंकि जिस व्यक्ति (मामा) से शादी तय की गई थी, वह 32 वर्षीय तलाकशुदा था। दिलचस्प बात यह है कि उसकी पहली शादी भी पति की एक भतीजी से हुई थी, जो टूट चुकी थी और उस व्यक्ति के खिलाफ पुलिस शिकायत भी दर्ज थी। इस हालात को देखते हुए जस्टिस सीवी कार्तिकेयन और जस्टिस के राजशेखर की खंडपीठ ने कहा कि एक पिता के रूप में पति ने जो अकल्पनीय मानसिक पीड़ा और दर्द सहा होगा, उसकी कल्पना की जा सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यहाँ मुद्दा यह नहीं है कि शादी बेटी के भले के लिए थी या नहीं, बल्कि मुद्दा यह है कि एक पिता को उसकी बेटी के जीवन के इतने बड़े फैसले से पूरी तरह बाहर रखा गया।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, "एक पिता के रूप में अपीलकर्ता के दर्द को हम महसूस कर सकते हैं। उसे कभी पता ही नहीं चला कि पत्नी और बेटी घर से चले गए हैं... शादी हो जाने के बाद पिता कोई कदम भी नहीं उठा सकता था। उस समय वह जिस मानसिक वेदना से गुजरा होगा, उसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती।" मामले में अदालत ने यह भी पाया कि पत्नी का व्यवहार लगातार क्रूरतापूर्ण था। वह न केवल पति को सार्वजनिक रूप से अपमानित करती थी, बल्कि उसने पति के वरिष्ठ अधिकारियों से भी उसकी शिकायत की थी, जिससे पति के लिए उसके साथ रहना मुश्किल हो गया था।
फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द
हाई कोर्ट ने इसके बाद एक फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। इससे पहले, फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक अर्जी खारिज कर दी थी और पत्नी के साथ रहने के अधिकार (restitution of conjugal rights) को मंजूरी दी थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के इस दृष्टिकोण को गलत माना और उस आदेश को रद्द करते हुए पति के पक्ष में तलाक की डिक्री जारी कर दी। हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी द्वारा की गई क्रूरता के कामों को जांचने और तौलने का ट्रायल कोर्ट का तरीका काफी नहीं था।




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