दो जजों का फैसला अस्वीकार्य… अपने ही पुराने फैसले पर क्यों नाराज हो गए SC के मीलॉर्ड? मामला क्या
जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस भुइयां की बेंच ने कहा कि खालिद और इमाम को बेल देने से मना करने वाला पिछला फैसला लैंडमार्क यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केए नजीब केस में एक बड़ी बेंच द्वारा तय की गई बाइंडिंग मिसाल को कमजोर करता हुआ लगता है।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जोर देकर कहा कि बेल नियम है और जेल अपवाद है, यहाँ तक कि सख्त अनलॉफुल एक्टिविटीज़ (प्रिवेंशन) एक्ट (UAPA) के तहत आने वाले केस में भी यही नियम लागू होते् हैं। इतना ही नहीं शीर्ष अदालत ने दिल्ली दंगों की साजिश के केस में JNU के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से मना करने वाले सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले पर भी गंभीर एतराज जताया। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने कहा कि खालिद और इमाम को बेल देने से मना करने वाला पिछला फैसला, लैंडमार्क यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम केए नजीब केस में एक बड़ी बेंच द्वारा तय की गई बाइंडिंग मिसाल को कमजोर करता हुआ लगता है।
जस्टिस भुइयां ने कहा, "वे बाइंडिंग मिसाल को कमज़ोर, दरकिनार या नजरअंदाज नहीं कर सकते।" उन्होंने बताया कि खालिद को बेल देने से मना करने वाले दो जजों ने सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच के साझा फैसले को नजरअंदाज किया, जिसमें कहा गया था कि बेल नियम है और जेल अपवाद।
जमानत नियम है और जेल अपवाद
दरअसल, सोमवार को शीर्ष अदालत ने नार्को-आतंकवाद के एक मामले में मुकदमे का सामना कर रहे व्यक्ति को यह कहकर जमानत दे दी कि जमानत नियम है और जेल अपवाद, यहां तक कि यूएपीए मामले में भी यही नियम लागू होता है। व्यक्ति पर जम्मू कश्मीर में मादक पदार्थों की तस्करी और आतंकवाद के वित्तपोषण में संलिप्तता के आरोप हैं। जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस भुइयां की पीठ ने हंदवाड़ा निवासी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को राहत प्रदान करते हुए उसे अपना पासपोर्ट जमा करने और हर 15 दिन में एक बार स्थानीय थाने में रिपोर्ट करने का निर्देश दिया।
राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (IPC) की संबंधित धाराओं के तहत 2020 में दर्ज मामले की जांच कर रहा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि UAPA की धारा 43डी(5) अनिश्चितकालीन कारावास को उचित नहीं ठहरा सकती और इसे अनुच्छेद 21 और 22 के अधीन ही लागू होना चाहिए। यह धारा जमानत संबंधी सख्त प्रतिबंध निर्धारित करती है।
दो जजों का फैसला अस्वीकार्य
दिल्ली दंगों से संबंधित गुलफिशा फातिमा मामले में दो न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिए गए फैसले को अस्वीकार करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि इसमें के. ए. नजीब मामले में दिए गए फैसले का ठीक से पालन नहीं किया गया है जिसमें यूएपीए के तहत मामलों में लंबे समय तक मुकदमे में देरी को जमानत का आधार माना गया था। दिल्ली दंगा मामले में शीर्ष अदालत ने कई आरोपियों को जमानत दे दी थी लेकिन छात्र नेता उमर खालिद और शरजील इमाम को यह राहत नहीं मिली थी।
यूएपीए के तहत भी जमानत नियम है
पीठ ने कहा, ''जमानत नियम है और जेल अपवाद है। यह अनुच्छेद 21 और 22 से निकला एक संवैधानिक सिद्धांत है और निर्दोष होने की धारणा कानून के शासन द्वारा शासित किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला है।'' पीठ ने कहा, ''हमें यह कहने में कोई संदेह नहीं है कि यूएपीए के तहत भी जमानत नियम है और जेल अपवाद। बेशक, उचित मामले में उस विशेष मामले के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए जमानत से इनकार किया जा सकता है।''
2021 में दिया गया SC का फैसला ऐतिहासिक है
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि के.ए. नजीब मामले में उसका फैसला बाध्यकारी कानून है और अधीनस्थ अदालतों, उच्च न्यायालयों या यहां तक कि उच्चतम न्यायालय की अधीनस्थ पीठों द्वारा भी इसे कमजोर, दरकिनार या नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। के. ए. नजीब मामला यूएपीए के तहत जमानत के संबंध में 2021 में दिया गया उच्चतम न्यायालय का एक ऐतिहासिक फैसला है।
अंद्राबी ने जम्मू कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। उच्च न्यायालय ने कहा था कि मोबाइल फोन रिकॉर्ड की जांच से पता चलता है कि अंद्राबी सीमा पार आतंकी संगठनों के संपर्क में था। एनआईए ने मामले में जांच से लेकर आरोपियों की गिरफ्तारी तक के घटनाक्रम को बताया। उसने कहा कि 11 जून 2020 को पुलिस ने हंदवाड़ा के कैरो ब्रिज पर अब्दुल मोमिन पीर की कार को रोका था। तलाशी के दौरान 20.01 लाख रुपये नकद और दो किलोग्राम हेरोइन जब्त की गई और पीर को गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में उसके खुलासे पर अंद्राबी और इस्लाम-उल-हक पीर को गिरफ्तार किया गया।
आरोपपत्र के अनुसार, जांच में पता चला कि आरोपी कथित तौर पर पाकिस्तान में स्थित अपने सहयोगियों से हेरोइन प्राप्त करने के बाद जम्मू कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों में सीमा पार तस्करी और आपूर्ति में शामिल था। आरोपपत्र में कहा गया है कि अंद्राबी और अब्दुल मोमिन पीर ने 2016-17 के दौरान कई बार पाकिस्तान का दौरा किया था ताकि वे आतंकवादी संगठनों लश्कर-ए-तैयबा और हिज्बुल मुजाहिदीन (एचएम) के सदस्यों से मिल सकें। इसमें यह भी कहा गया है कि हेरोइन की बिक्री से प्राप्त राशि का उपयोग आरोपियों ने लश्कर-ए-तैयबा की आतंकवादी गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए किया था। (भाषा इनपुट्स के साथ)




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