ममता बनर्जी को कांग्रेस ने क्यों निकाला था, क्या हुआ; TMC के बनने से टूटने की कहानी
4 मई को विधानसभा चुनाव के बाद से ही टीएमसी में कलह नजर आने लगी थी। इसके संकेत ममता बनर्जी की तरफ से बुलाई गई बैठकों में विधायकों की अनुपस्थिति, विरोध प्रदर्शन से नेताओं की दूरी, पार्षदों के इस्तीफे, ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा का निष्कासन समेत कई मामलों से मिल रहे थे।

तृणमूल कांग्रेस 28 साल के इतिहास में सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। कोलकाता में 58 विधायकों के बागी होने के बाद अब संसदीय दल में बगावत शुरू हो गई है। अगर इतिहास के पन्ने को पलटें तो एक दौर में खुद टीएमसी का गठन कुछ इसी तरह हुआ था। ममता ने कांग्रेस से बगावत करके तृणमूल का गठन किया था।
कांग्रेस की टिकट पर सांसद बनीं
ममता बनर्जी ने छात्र जीवन से ही राजनीति का सफर शुरू किया। छात्र राजनीति के बाद ममता ने कांग्रेस का दामन थामा और सियासी मंच पर एक सशक्त नेता के रूप में उभरीं। 1984 में पहली बार कांग्रेस से सांसद बनीं।
वाम मोर्चे को लेकर शुरू हुआ मतभेद
वर्ष 1990 में वाम मोर्चे के कार्यकर्ताओं ने उन्हें बुरी तरह पीटा था। धीरे-धीरे उन्हें लगने लगा कि कांग्रेस में रहना उनके इस संघर्ष में बाधा बन रहा है। उनका मानना था कि कांग्रेस आलाकमान पश्चिम बंगाल में उनके वाम-विरोधी आंदोलन को जानबूझकर रोकना चाहता है, क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति और संसद में कांग्रेस वामपंथियों के समर्थन पर काफी हद तक निर्भर थी।
तृणमूल कांग्रेस की नींव रखीं
पार्टी नेतृत्व को सीधे तौर पर चुनौती देने के बाद 1997 में ममता बनर्जी को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद, मुकुल रॉय जैसे नेताओं के साथ मिलकर उन्होंने एक नई शुरुआत की और एक जनवरी 1998 को उन्होंने आधिकारिक तौर पर अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना की।
वाम दल के शासन का अंत किया
आखिरकार 2011 के विधानसभा चुनावों में टीएमसी ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और वाम दल के 34 वर्ष के शासन का अंत कर दिया। इस चुनाव में टीएमसी गठबंधन ने 227 सीटें जीतीं, जिसमें से अकेले टीएमसी को 187 सीटें मिली। यानी टीएमसी अकेले ही पूर्ण बहुमत पर थी। इसके बाद विधानसभा चुनाव में लगातार दो बार और जीत हासिल की।
अब टूटने लगी TMC
4 मई को विधानसभा चुनाव के बाद से ही टीएमसी में कलह नजर आने लगी थी। इसके संकेत ममता बनर्जी की तरफ से बुलाई गई बैठकों में विधायकों की अनुपस्थिति, विरोध प्रदर्शन से नेताओं की दूरी, पार्षदों के इस्तीफे, ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा का निष्कासन समेत कई मामलों से मिल रहे थे। जून की शुरुआत में ही पार्टी को झटका लगा और 80 में से 60 विधायक अलग गुट को मान्यता दिलाने निकल पड़े।
यही नजारा अब संसद में भी देखने को मिल रहा है। कभी टीएमसी सुप्रीम की करीबी मानी जाने वाली लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में सांसद बगावत की तैयारी कर रहे हैं। खबरें हैं कि मंगलवार को लोकसभा स्पीकर को पत्र सौंपा जा सकता है। वहीं, अटकलें ये भी हैं कि इसके बाद बागी गुट चुनाव आयोग का भी रुख कर सकता है।
एक नजर में ममता का राजनीतिक जीवन
1977-83- जोगमाया देवी कॉलेज में पढ़ाई के समय पश्चिम बंगाल छात्र परिषद की कार्यसमिति की सदस्य रहीं
1979-80- पश्चिम बंगाल कांग्रेस (आई) के महासचिव का पद संभाला। वह प्रांतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस की सचिव भी रहीं
1983-88- इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस महिला शाखा की सचिव रहीं और दक्षिण कलकत्ता जिला कांग्रेस (आई) के सचिव के रूप में भी काम किया
1998- कांग्रेस छोड़कर ममता ने टीएमसी बनाई।
1999- लोकसभा चुनाव में टीएमसी ने एनडीए के साथ मिलकर आठ सीटें जीतीं और ममता बनर्जी पहली बार केंद्र में रेल मंत्री बनीं
2001- तृणमूल ने एनडीए से नाता तोड़कर कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। बंगाल विधानसभा में 60 सीटें जीतकर राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई।
2011- पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल ने पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई और अगले दो विधानसभा चुनावों में भी अपनी जीत बरकरार रखी।




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