पहले दीदी-दीदी, अब ममता बनर्जी; एक महीने में ही कैसे बदल गए सहयोगी? अब तक किस-किस ने छोड़ी TMC
Bengal Politics: 2026 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को करारी शिकस्त मिली है। इस चुनावी हार ने न सिर्फ ममता बनर्जी की 14 साल लंबी सत्ता छीन ली, बल्कि उनकी पार्टी को अंदर से चीरने वाला गंभीर आंतरिक संकट भी खड़ा कर दिया है।

पश्चिम बंगाल की सियासी जमीन पर भूकंप आ गया है। 2026 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया, जबकि ममता बनर्जी की TMC की सीटें 215 से घटकर महज 80 रह गईं। इस चुनावी हार ने न सिर्फ ममता बनर्जी की सत्ता छीन ली, बल्कि उनकी पार्टी को अंदर से तोड़ने वाला गहरा संकट भी पैदा कर दिया है।
पार्टी के अंदरूनी कलह, अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल और जमीनी स्तर पर गुस्से ने मिलकर TMC को विभाजन के कगार पर ला खड़ा किया है। 80 बचे हुए विधायकों में से 58 सक्रिय रूप से ममता बनर्जी से दूरी बना चुके हैं या खुलकर बगावत पर उतर आए हैं। बागी गुट मुख्य रूप से ममता के भतीजे और TMC महासचिव अभिषेक बनर्जी के तौर-तरीकों और पार्टी में फैली गुटबाजी से बेहद नाराज है।
दूसरी ओर काकोली घोष दस्तीदार जैसे नेताओं ने दावा किया है कि सोमवार को कम से कम 20 बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (NDA) में शामिल होने की इच्छा जताई है। ये वही सहयोगी हैं, जो महीने भर पहले तक दीदी-दीदी की रट लगाते थे और अब उन्हें सम्मान भी नहीं दे रहे सीधे ममता बनर्जी कहकर पुकार रहे हैं। आइये अब विस्तार से जानते हैं कि ममता बनर्जी के साथ किस-किस ने साथ छोड़ा और यह संकट कितना गहरा है।
टीएमसी के बागी विधायक
- ऋतब्रत बनर्जी (उलुबेरिया विधायक): वे इस पूरे बागी अभियान के सबसे प्रमुख चेहरे बनकर उभरे हैं। चुनाव परिणाम आने के तुरंत बाद उन्होंने TMC के आधिकारिक नेतृत्व को दरकिनार कर दिया और विधानसभा अध्यक्ष द्वारा उन्हें विपक्ष का आधिकारिक नेता (Leader of Opposition) घोषित कर दिया गया।
- संदीपन साहा (एंटल्ली विधायक): ऋतब्रत बनर्जी के सबसे करीबी सहयोगी। दोनों ने मिलकर विधानसभा में तख्तापलट की रणनीति तैयार की। ममता बनर्जी ने इन्हें औपचारिक रूप से निष्कासित कर दिया, लेकिन संदीपन साहा का साफ कहना है कि अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं है। पार्टी को बचाने के लिए यह कदम जरूरी था।
- जावेद खान और सिउली साहा: ये दोनों वरिष्ठ विधायक बागी गुट की शुरुआती बैठकों के मुख्य आयोजक रहे। विधायक आवास में हुई गुप्त बैठकें इन्हीं के नेतृत्व में हुईं, जहां TMC के भविष्य पर मंथन हुआ।
- फिरहाद हकीम: ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद और पुराने सहयोगियों में शुमार। कोलकाता के मेयर और वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री रह चुके फिरहाद हकीम ने पार्टी में हो रही उथल-पुथल का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनका इस्तीफा TMC के लिए सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है।
- कृष्णा चक्रवर्ती: बिधाननगर की महापौर। ममता की लंबे समय की वफादार रहीं, लेकिन उन्होंने भी महापौर पद से इस्तीफा दे दिया।
- मोहम्मद अजमल सिद्दीकी: TMC के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के राज्य सचिव। उन्होंने अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी के आंतरिक कामकाज और अल्पसंख्यक नेताओं को हाशिए पर धकेल दिए जाने का आरोप लगाते हुए सभी प्राथमिक सदस्यताओं और पदों से इस्तीफा दे दिया।
प्रशासनिक सलाहकारों का इस्तीफा
विधानसभा चुनाव में हार के तुरंत बाद ममता सरकार चलाने वाले प्रमुख प्रशासनिक सलाहकारों ने भी एक के बाद एक इस्तीफे दे दिए। इसके बाद से ही साफ हो गया था कि टीएमसी के अंदर कुछ भी ठीक नहीं है, और आने वाले समय में ये इस्तीफे सियासी भूचाल ला देगा।
- अलापन बंद्योपाध्याय (पूर्व मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकार)
- एचके द्विवेदी (पूर्व मुख्य सचिव)
- अभिरूप सरकार (प्रख्यात अर्थशास्त्री और WBIDC तथा WBSIDC के अध्यक्ष)
- किशोर दत्ता (राज्य के एडवोकेट जनरल)- उन्होंने राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया
- मनोज पंत (मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव)
टॉलीवुड ब्रिगेड का पलायन
इतना ही नहीं चुनाव में करारी हार के बाद टॉलीवुड ब्रिगेड में भी ममता बनर्जी की टीएमसी का साथ छोड़ दिया। इसमे सिनेमा के साथ क्रिकेट जगत से जुड़े कई बड़े नाम पार्टी से दूर हो गए। संभव है कि आने वाले दिनों और कई ममता बनर्जी का साथ छोड़ दे। आइये अब जानते है कि कौन-कौन टीएमसी का साथ छोड़ चुके हैं।
- राज चक्रवर्ती: प्रसिद्ध फिल्म निर्माता ने औपचारिक रूप से राजनीति से संन्यास ले लिया
- मनोज तिवारी: पूर्व क्रिकेटर ने खुलकर गुटबाजी और व्यवस्थागत कुप्रबंधन का आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ दी
- रिजू दत्ता: पार्टी के सबसे मुखर समर्थकों में से एक। उन्होंने सार्वजनिक रूप से TMC की पिछली रणनीतियों से खुद को अलग करना शुरू कर दिया है।
जमीनी स्तर पर भी बवाल
इसके अलावा शहरों और कस्बों में TMC के किलों में भी दरारें आ गई हैं। TMC नियंत्रित विभिन्न नगरपालिकाओं और नगर निगमों में 100 से अधिक TMC पार्षदों ने सामूहिक इस्तीफे सौंप दिए हैं। इससे अगले स्थानीय निकाय चुनावों से पहले कई नगर निकायों के प्रशासनिक ढांचे पूरी तरह ढहने का खतरा पैदा हो गया है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि जनता के गुस्से से बचने के लिए यह सामूहिक पलायन हुआ है।
चुनावी हार के बाद दलों में फूट आम बात
पश्चिम बंगाल में TMC के साथ जो हो रहा है, वह भारतीय राजनीति में पहली बार नहीं है। इतिहास में भी इस तरह के कई मामले सामने आए हैं। चुनावी हार के बाद कई पार्टियों में बिखराव हुआ है। जैसे...
- जनता पार्टी (1979-80): 1977 में इंदिरा गांधी को हराने के बाद अंदरूनी कलह ने इस गठबंधन को चूर-चूर कर दिया। अंततः पार्टी कई गुटों में बंट गई और हिंदू राष्ट्रवादी गुट अलग होकर भाजपा के रूप में उभरा।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1977-78): आपातकाल के बाद 1977 की ऐतिहासिक हार के बाद कांग्रेस दो फाड़ हो गई। इंदिरा गांधी गुट ने कांग्रेस (I) बनाया, जो 1980 में वापस सत्ता में आई।
- जनता दल (1996 के बाद): 1980-90 के दशक में सत्ता में रहने के बाद पार्टी लगातार पतन की राह पर चली गई और RJD, JD(U), JD(S) जैसे क्षेत्रीय दलों में बंट गई।
- ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (2011 के बाद): 2011 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की हार के बाद इस पार्टी का संगठन पूरी तरह ध्वस्त हो गया।
वहीं सियासी पंडितों का मानना है कि TMC अब औपचारिक विभाजन के बेहद करीब पहुंच चुकी है। ममता बनर्जी के लिए यह सिर्फ सत्ता की हार नहीं, बल्कि अपनी पूरी राजनीतिक विरासत को बचाने की लड़ाई है। आने वाले दिनों में और बड़े नाम पार्टी छोड़ सकते हैं। एक तरह से कहा जाए तो TMC का भविष्य अब पूरी तरह अनिश्चित नजर आ रहा है।




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