भारत की ब्रह्मोस मिसाइल का एशियाई देशों में क्रेज, चीन का उड़ा चैन, टेंशन में ड्रैगन
भारत की ब्रह्मोस मिसाइल की एक तरफ दुनिया के अलग-अलग देशों में डिमांड बढ़ रही है। इसमें चीन के पड़ोसी देश भी शामिल हैं। इसको लेकर ड्रैगन खासा टेंशन में है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

अचानक से एशियाई देशों में ब्रह्मोस मिसाइल का क्रेज पैदा हो गया है। इन देशों में चीन के पड़ोसियों का भी नाम शामिल है। असल में यह देश चीन की काट के तौर पर ब्रह्मोस को अपने बेड़े में शामिल करना चाहते हैं। यह पूरी कहानी का एक हिस्सा भर है। असली कहानी यह है कि रक्षा निर्यात में भारत का रुतबा लगातार बढ़ता जा रहा है। साल 2026 में भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट बढ़कर 38,424 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है। यह अभी तक का सबसे सर्वोच्च स्तर है। पिछली बार से अब इसमें 62.66 फीसदी की उछाल आई है। भारत के डिफेंस एक्सपोर्ट में सबसे ज्यादा मांग ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम की है। हाल के दिनों में भारत ने विएतनाम और इंडोनेशिया के साथ इसके निर्यात को लेकर समझौता किया है। वहीं, फिलिपीन्स को वह पहले ही ब्रह्मोस बेच चुका है। इसके अलावा दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों समेत कुछ अन्य देशों ने भी ब्रह्मोस में रुचि दिखाई है।
चीन की क्यों बढ़ी चिंता
ब्रह्मोस मिसाइल में कई तकनीकी खूबियां तो हैं ही। साथ एक और फैक्टर है जिसकी वजह से दक्षिण पश्चिम एशियाई देश ब्रह्मोस के लिए कतार में लगे हुए हैं। यह वजह है चीन। विशेषज्ञों के मुताबिक फिलिपीन्स, विएतनाम और इंडोनेशिया के पास बड़े पैमाने पर नेवी बजट नहीं हैं। लेकिन चीन से बढ़ते नेवी खतरे को रोकने के लिए उन्हें कुछ चाहिए। ऐसे में ब्रह्मोस को तैनात करके यह देश अपने लिए सुरक्षा बढ़ा सकते हैं। वहीं, रिटायर्ड मेजर गौरव आर्या का कहना है कि भारत से मिसाइल खरीदने वाले वही देश ज्यादा हैं, जिनका जिनका चीन के साथ क्षेत्रीय विवाद है। एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का ब्रह्मोस निर्यात चीन के लिए चिंता का विषय है। कुछ अन्य चीनी विशेषज्ञों ने ब्रह्मोस की क्षमताओं और पहुंच के चलते इसे अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया है।
क्या है ब्रह्मोस मिसाइल
ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। इसे ब्रह्मोस एयरोस्पेस द्वारा तैयार किया जाता है। यह भारत के डीआडीओ और रूस के एनपीओ मशीनोट्रोयेनिया द्वारा बनाया जाता है। ब्रह्मोस दो स्टेज मिसाइल है, जिसमें प्रोपोलेंट बूस्टर इंजन लगा हुआ है। पहले स्टेज में मिसाइल सुपरसोनिक स्पीड की गति तक पहुंचती है। इसके बाद यह अलग हो जाती है। इसके बाद लिक्विड रैमजेट, या दूसरा चरण, क्रूज स्टेजे के दौरान मिसाइल को ध्वनि की तीन गुना रफ्तार के करीब ले जाता है। ब्रह्मोस को सबमरीन, शिप, एयरक्राफ्ट या जमीन, कहीं से भी लांच किया जा सकता है। इसकी रेंज 300 किलोमीटर है और यह 200 से 300 किलोग्राम तक का वजन लेकर जा सकती है।
जानिए इसकी खासियतें
इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह आसानी से राडार की पकड़ में नहीं आती है। साथ ही यह अपने सटीक निशाने के लिए भी जानी जाती है। साल 2001 में ब्रह्मोस का पहली बार टेस्ट हुआ था। इसके बाद से इसके कई वैरियंट डेवलप किए जा चुके हैं। ब्रह्मोस की नई पीढ़ी की मिसाइल का अनुमानित वजन 1290 किलो है, जबकि इससे पहले वाली ब्रह्मोस 2900 किलो की थी। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस मिसाइल ने पाकिस्तान के नूर खान और रहीमयार खान बेस पर खूब तबाही मचाई थी।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान छाया ब्रह्मोस
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस की क्षमता ने दुनिया भर के देशों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। हालांकि इससे पहले ही कुछ देशों ने इसको लेकर इंट्रेस्ट दिखाया था। ब्रह्मोस का पहला विदेशी ग्राहक देश फिलीपींस था। यह डील करीब 375 मिलियन डॉलर में हुई थी। इसके बाद भारत ने विएतनाम के साथ डील की। शांग्री-ला वार्ता के दौरान रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहाकि विएतनाम के साथ डील हो चुकी है। हालांकि अभी सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा नहीं की गई है। जानकारी के मुताबिक विएतनाम के साथ यह डील 5800 करोड़ रुपए में हुई है। खबरें ऐसी भी हैं कि बाद में विएतनाम, ब्रह्मोस के हवा में मार करने वाले वर्जन को भी खरीद सकता है।
कई देशों के साथ डील
इसी तरह की एक डील इंडोनेशिया के साथ भी चल रही है जो फाइनल स्टेज में है। यह डील 450 मिलियन डॉलर का होने का अनुमान है। इसके अलावा कुछ अन्य दक्षिणी पश्चिमी एशियाई देशों को भी ब्रह्मोस मिसाइल का निर्यात होना है। मलेशिया ने खासतौर पर ब्रह्मोस के हवा में मार करने वाले वर्जन में रुचि दिखाई है। वहीं, थाइलैंड भी पहले ब्रह्मोस को लेकर रुचि दिखा चुका है। इसके अलावा, सऊदी अरब, कतर, ओमान और इजिप्ट भी ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने के इच्छुक हैं। वहीं, लैटिन अमेरिकी क्षेत्र के ब्राजील, चिली, अर्जेंटीना और वेनेजुएला का दिल भी ब्रह्मोस पर आया हुआ है।




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