What Reservation Rulebook Says About OBC SC/ST EWS And PwD reservation SC Questions Quota For IAS Kids IAS के बच्चों को क्यों मिले आरक्षण? SC के बयान से छिड़ी बहस, क्या हैं OBC, SC-ST और EWS के नियम?, India News in Hindi - Hindustan
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IAS के बच्चों को क्यों मिले आरक्षण? SC के बयान से छिड़ी बहस, क्या हैं OBC, SC-ST और EWS के नियम?

IAS Kids Reservation: राज्य सरकारों द्वारा वित्त पोषित विश्वविद्यालयों और पेशेवर कॉलेजों को स्थानीय निवासियों के लिए 85 प्रतिशत तक सीटें आरक्षित करने की अनुमति है। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 15(1) के तहत इसे संवैधानिक रूप से वैध ठहराया है।

Sat, 23 May 2026 06:46 AMHimanshu Jha लाइव हिन्दुस्तान
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IAS के बच्चों को क्यों मिले आरक्षण? SC के बयान से छिड़ी बहस, क्या हैं OBC, SC-ST और EWS के नियम?

IAS Kids Reservation Rules: IAS, IPS अधिकारियों जैसे सिविल सेवकों के बच्चों को पिछड़ा वर्ग आरक्षण का लाभ मिलते रहने पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाये गए मौखिक सवालों ने देश में एक बार फिर आरक्षण पर एक बड़ी संवैधानिक बहस छेड़ दी है। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने आरक्षण के मूल सिद्धांत पर प्रहार किया है। कोई परिवार किस स्तर पर आकर इतनी सामाजिक प्रगति कर लेता है कि उसे अधिक वंचित नागरिकों के लिए आरक्षण का रास्ता छोड़ देना चाहिए? आपको बता दें कि भारत में आरक्षण की कानूनी व्यवस्था बेहद संरचित और विभिन्न श्रेणियों के आधार पर विभाजित है।

आइए समझते हैं कि अलग-अलग श्रेणियों के लिए आरक्षण के मौजूदा और वास्तविक नियम क्या हैं।

1. ओबीसी नॉन-क्रीमी लेयर: आय नहीं, पद और प्रतिष्ठा है मुख्य आधार

अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए कानूनी सीमाएं सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के ऐतिहासिक इंद्र सहनी मामले में तय की थीं, जिससे क्रीमी लेयर (Creamy Layer) की अवधारणा का जन्म हुआ। मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने पुनः स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर का प्राथमिक परीक्षण स्टेटस (पद/प्रतिष्ठा) पर आधारित है, न कि विशुद्ध रूप से आय पर।

पद पर आधारित: कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के दिशानिर्देशों के तहत ग्रुप A या क्लास-I अधिकारियों (जैसे IAS, IPS या IFS) के बच्चे पहले दिन से ही क्रीमी लेयर में आरक्षण के दायरे से बाहर माने जाते हैं। निजी क्षेत्र या असंगठित व्यवसायों में काम करने वाले माता-पिता के लिए आर्थिक नियम लागू होता है। यदि माता-पिता की वार्षिक आय लगातार तीन वर्षों तक 8 लाख रुपये से अधिक रहती है, तो उम्मीदवार क्रीमी लेयर में आ जाता है और वह 27% ओबीसी कोटे के लिए पात्र नहीं रहता। कानून के मुताबिक, इस 8 लाख रुपये की गणना में उम्मीदवार की खुद की व्यक्तिगत सैलरी या नियमित कृषि आय को नहीं जोड़ा जा सकता।

2. SC/ST श्रेणियां: उप-वर्गीकरण और क्रीमी लेयर की बहस

OBC के विपरीत अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण का ढांचा आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक अस्पृश्यता और गहरे संरचनात्मक बहिष्कार से लड़ने के लिए तैयार किया गया था। यही कारण है कि प्रवेश स्तर पर इन समूहों के लिए 8 लाख रुपये की क्रीमी लेयर सीमा कभी लागू नहीं रही।

हाल ही में 7 जजों की संविधान पीठ के एक ऐतिहासिक फैसले के बाद इस कानूनी परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया है। शीर्ष अदालत ने बहुमत से फैसला सुनाया कि राज्यों के पास SC और ST श्रेणियों के भीतर उप-वर्गीकरण करने का संवैधानिक अधिकार है, ताकि लाभ वंचितों में भी सबसे वंचित तक पहुंच सके।

SC/ST में क्रीमी लेयर: पीठ के अधिकांश न्यायाधीशों ने यह भी रेखांकित किया कि राज्यों को SC और ST श्रेणियों के भीतर भी क्रीमी लेयर की पहचान करने और उन्हें बाहर करने के लिए मजबूत तंत्र विकसित करना चाहिए, ताकि आरक्षण का लाभ उन लोगों तक पहुंचे जिनके पास सामाजिक पूंजी का अभाव है।

3. EWS और PwD: वित्तीय सीमा और शारीरिक अक्षमता का कोटा

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग: सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत का EWS कोटा पूरी तरह से एक अलग दर्शन पर काम करता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान्य यह कोटा ऐतिहासिक सामाजिक कलंक के बजाय केवल वित्तीय पिछड़ेपन को देखता है। इसके तहत पात्र होने के लिए परिवार की सकल वार्षिक आय 8 लाख रुपये से कम होनी चाहिए। साथ ही कृषि भूमि और आवासीय भूखंड के स्वामित्व को लेकर भी सख्त सीमाएं तय हैं।

PwD (दिव्यांगजन कोटा): दिव्यांगजनों के अधिकार अधिनियम के तहत सरकारी नौकरियों में 4 प्रतिशत का हॉरिजॉन्टल (क्षैतिज) आरक्षण सुनिश्चित किया गया है। यह कोटा सभी वर्टिकल श्रेणियों (SC, ST, OBC, सामान्य) को काटते हुए लागू होता है। इसके लिए न्यूनतम 40 प्रतिशत प्रमाणित दिव्यांगता का होना अनिवार्य है। यह सामाजिक-आर्थिक स्थिति के बजाय पूरी तरह से शारीरिक बाधाओं पर केंद्रित है।

4. डोमिसाइल और मैनेजमेंट कोटा: स्थानीय और संस्थागत प्राथमिकताएं

राष्ट्रीय स्तर की श्रेणियों के अलावा, शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए कुछ स्थानीय और व्यावसायिक फिल्टर भी काम करते हैं।

डोमिसाइल कोटा: राज्य सरकारों द्वारा वित्त पोषित विश्वविद्यालयों और पेशेवर कॉलेजों को स्थानीय निवासियों के लिए 85 प्रतिशत तक सीटें आरक्षित करने की अनुमति है। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 15(1) के तहत इसे संवैधानिक रूप से वैध ठहराया है, क्योंकि राज्यों का अपने करदाताओं के हितों की रक्षा करना और स्थानीय शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करना एक वैध कर्तव्य है।

मैनेजमेंट कोटा: यह निजी और गैर-सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में संचालित होने वाली एक व्यावसायिक व्यवस्था है, जो आमतौर पर कुल सीटों के 15 प्रतिशत तक सीमित होती है। इसके तहत संस्थान प्रबंधन को अपने विवेक और उच्च शुल्क के आधार पर सीटें भरने की छूट होती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि मैनेजमेंट कोटे के तहत भी व्यावसायिक लाभ के लिए न्यूनतम योग्यता और बुनियादी मेरिट से समझौता नहीं किया जा सकता।

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