तेल, गैस के बाद अब दवाइयों पर भी संकट, युद्ध ने बढ़ा दी भारत की टेंशन; क्या कह रहे अधिकारी?
फार्मास्यूटिकल उद्योग में ज्यादातर कच्चे माल का ट्रेड डॉलर में होता है। जंग शुरू होते ही डॉलर मजबूत होने से भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के लिए आयात की लागत अपने आप बढ़ जाती है। युद्ध बीते 11 दिनों से जारी है।
ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद पश्चिम एशिया में युद्ध का पैमाना बढ़ता ही जा रहा है। प्रमुख जलमार्गों के प्रभावी रूप से बंद होने और सप्लाई चेन में आई दिक्कतों की वजह से कच्चे तेल और गैस के दाम आसमान छू रहे हैं। इस बीच अब एक और संकट ने दस्तक दे दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस जंग का असर भारत के दवा उद्योग पर भी पड़ना शुरू हो गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत की फार्मास्यूटिकल सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ रहा है जिससे दवा बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल यानी रॉ मैटेरियल की कीमत लगातार बढ़ रही है।
न्यूज 18 ने अपनी एक रिपोर्ट में फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों के हवाले से बताया है कि ‘की स्टार्टिंग मटेरियल’ (KSM) और ‘एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट्स’ (API) की कीमतें बढ़ने लगी हैं। बता दें कि KSM और API दवा बनाने के लिए जरूरी घटक हैं। पिछले हफ्ते वैश्विक तनाव, डॉलर में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति में आ रही रुकावटों की वजह से कीमत 5 से 100 फीसदी तक बढ़ गई है। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर युद्ध इस तरह चलता रहा तो इन अहम रॉ मैटेरियल की कमी भी हो सकती है।
हो सकती है कमी- जानकार
अल्ट्रा ड्रग्स के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर संदीप अरोड़ा ने बताया, "दवाओं की कमी हो सकती है क्योंकि ट्रेडर रॉ मटेरियल के लिए कोई ऑर्डर नहीं ले रहे हैं।" उन्होंने आगे कहा, “सॉल्वेंट की कीमतें बढ़ी हैं। इसके अलावा छोटे व्यापारी और सप्लायर भी कीमतों में और बढ़ा कर युद्ध की स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं।” बता दें कि भारत अपनी जरूरतों का लगभग 65 से 70 परसेंट API, इंटरमीडिएट्स और जरूरी सामान चीन से आयात करता है।
क्यों बढ़ गई कीमतें?
जानकारों के मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह अनिश्चिताओं के बीच डॉलर का मजबूत होना है। बता दें कि फार्मास्यूटिकल उद्योग में ज्यादातर कच्चे माल का ट्रेड डॉलर में होता है। ऐसे में डॉलर मजबूत होते ही आयात की लागत अपने आप बढ़ जाती है। वहीं एक और वजह सॉल्वैंट्स की कॉस्ट में बढ़ोतरी है। कुछ मामलों में, पिछले कुछ दिनों में सॉल्वैंट्स की लागत 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गई है।
समुद्री रास्ते हुए चोक
इसके अलावा लॉजिस्टिक से जुड़ी रुकावटें भी सामने आने लगी हैं। मुंबई की एक फार्मास्युटिकल फर्म में काम करने वाले एक इंडस्ट्री एग्जीक्यूटिव ने कहा, “बढ़ी हुई सुरक्षा चिंताओं और मुख्य समुद्री रास्ते चोक हो जाने के कारण जहाज और कंटेनर देरी से आ रहे हैं या फंस रहे हैं, जिससे फार्मास्युटिकल कच्चे माल की आवाजाही पर असर पड़ रहा है। कंटेनरों की कमी है क्योंकि कई जहाज बंदरगाहों पर वापस नहीं लौटे हैं।”




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