ममता बनर्जी ने नहीं किया जो काम, शुभेंदु ने कर दिखाया; अब और मजबूत होगा 'चिकन नेक'
पश्चिम बंगाल की शुभेंदु अधिकारी सरकार ने सिलिगुड़ी कॉरिडोर की करीब 120 एकड़ जमीन केंद्र सरकार को देने का फैसला किया है। इस फैसले का उद्देश्य केंद्र सरकार द्वारा सिलिगुड़ी कॉरिडोर में प्रस्तावित भूमिगत रेलवे परियोजना को मदद करना है।

Suvendu Adhikari: पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक जीत हासिल करने के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी लगातार ऐक्शन में है। मंगलवार को राज्य सरकार ने सिलिगुड़ी कॉरिडोर को लेकर एक ऐसा फैसला किया, जिसका इंतजार केंद्र सरकार पिछले काफी समय से कर रही थी। केंद्र का आरोप था कि बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस काम को जानबूझकर टाल रही हैं। यह काम था, कॉरिडोर से निकलने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों के हिस्सों को केंद्र सरकार को सौंपने का। मंगलवार को शुभेंदु सरकार ने ऐलान किया कि अब कॉरिडोर से निकलने वाले इन राजमार्गों की जिम्मेदारी भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और नेशनल हाईवेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (NHIDCL) संभालेगी।
शुभेंदु सरकार से मंजूरी मिलने के बाद अब NH-31,NH-33,NH-312 समेत 7 राष्ट्रीय राजमार्गों की जिम्मेदारी अब केंद्र सरकार संभालेगी। वहीं दूसरी तरफ इस क्षेत्र में पड़ने वाली कोरोनेशल ब्रिज, हासीमारा-जयगांव और चांगरबांधा कॉरिडोर जैसी परियोजनाओं की देखरेख NHIDCL करेगा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अभी तक इन परियोजनाओं की जिम्मेदारी राज्य सरकार संभाल रही थी। लेकिन पिछले एक साल से सरकार ने इसकी परमीशन नहीं दी थी। अब केंद्रीय एजेंसियां तेजी के साथ इन पर काम करेंगी।
विशेषज्ञों के मुताबिक शुभेंदु अधिकारी सरकार के इस फैसले से राष्ट्रीय सुरक्षा और भी ज्यादा मजबूत होगी। बंगाल की नई नवेली सरकार की मानें, तो इससे न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को फायदा होगा, बल्कि इस फैसले से दार्जिलिंग पहाड़ियों, डुआर्स और अन्य सीमावर्ती इलाकों में पहुंच आसान होगी।
क्या है भारत का 'चिकन नेक', जिसे मजबूत करने की जरूरत
पूर्वोत्तर राज्यों और बंगाल के बीच में 22 किलोमीटर चौड़ी एक पतली पट्टी की भारत का चिकन नेक कहा जाता है। आधिकारिक तौर पर इसका नाम सिलिगुड़ी कॉरिडोर है। इसके एक तरफ बांग्लादेश है, दूसरी तरफ नेपाल और भूटान हैं। यह इलाका इसलिए और भी ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पूर्वोत्तर भारत के राज्यों के साथ जुड़ने का एकमात्र जमीनी रास्ता है। इसके अलावा सरकार ने बांग्लादेश के जरिए और समुद्र के रास्ते से म्यांमार होते हुए जाने वाले रास्ते पर भी कोशिश की है। लेकिन वह अभी ज्यादा सफल नहीं है। ऐसे में यह रास्ता बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। चीन लगातार इस क्षेत्र पर अपनी नजर बनाए हुए है। ऐसे में भारत के लिए भी तैयारी करनी जरूरी है।
केंद्र सरकार की परियोजनाओं को मिलेगी मदद
पश्चिम बंगाल की नई नवेली सरकार द्वारा इस क्षेत्र की जमीन को केंद्र को सौंपने का मतलब है कि केंद्र सरकार अब सीधे तौर पर यहां पर नियंत्रण कर सकेगी। इससे क्षेत्र में मौजूद संरचना को तेजी के साथ विकसित किया जा सकेगा।
विशेषज्ञों के मुताबिक इस जमीन के हस्तांतरण का मुख्य उद्देश्य केंद्र सरकार द्वारा सिलिगुड़ी कॉरिडोर में बनाई जा रही भूमिगत रेलवे विस्तार को आसान बनाना है। इस नई परियोजना के तहत केंद्र सरकार यहां पर मौजूद डबल ट्रैक रेलवे प्रणाली को छह ट्रैक में बदलना चाहती है। इनमें से दो नए ट्रैक 40 किलोमीटर लंबी भूमिगत रेलवे लाइन के रूप में बनाए जाएंगे, जो टीन माइल हाट और रंगापानी स्टेशनों के बीच जमीन से 20–24 मीटर नीचे चलेगी। रेल लाइनों को भूमिगत करने से भारत की महत्वपूर्ण सैन्य और आपूर्ति लॉजिस्टिक्स को हवाई हमलों, भारी तोपखाने या ड्रोन युद्ध जैसे बाहरी खतरों से सुरक्षा मिलेगी।
पूर्वोत्तर राज्यों के विकास में सहायक होगा फैसला
पश्चिम बंगाल सरकार का यह फैसला न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा बल्कि पूर्वोत्तर राज्यों के लिए भी महत्वपूर्ण साबित होगा। केंद्र सरकार द्वारा भूमिगत रेलवे ट्रैक और सड़क परियोजनाओं की वजह से पूर्वोत्तर भारत के राज्यों तक पहुंच आसान होगी। इससे इन राज्यों में विकास और लोगों का जीवन बेहतर होगा।




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