5 सुझाव जो रोक सकते थे NEET पेपर लीक! 2 साल से धूल फांक रही पूर्व ISRO चीफ की रिपोर्ट
NEET UG Paper Leak: पूर्व ISRO चीफ के. राधाकृष्णन कमेटी की रिपोर्ट चर्चा में है। कमेटी ने पेपर लीक रोकने के लिए CBT मोड समेत कई शानदार सुझाव दिए थे, जो आज भी फाइलों में धूल फांक रहे हैं। जानिए क्या थीं अहम सिफारिशें।

मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम NEET-UG को कथित पेपर लीक के चलते रद्द कर दिया गया है। यूं तो नीट-यूजी को रद्द करने का यह पहला मामला है, लेकिन परीक्षा में गड़बड़ी और पेपर लीक के दावे पहले भी होते रहे हैं। साल 2024 में भी जब नीट-यूजी पेपर लीक का मामला सामने आया था, तब केंद्र सरकार ने पूर्व इसरो (ISRO) चीफ के. राधाकृष्णन की अगुवाई में एक हाई-लेवल एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी का मुख्य काम परीक्षा प्रक्रिया में सुधार और सुरक्षा प्रोटोकॉल को मजबूत करने के लिए सुझाव देना था।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर 2024 में इस कमेटी ने शिक्षा मंत्रालय को अपनी विस्तृत रिपोर्ट भी सौंप दी थी। सीबीआई जांच में यह सामने आया था कि झारखंड में एक सेंटर सुपरिंटेंडेंट की मदद से पेपर लीक हुआ था और उम्मीदवारों ने एग्जाम से पहले सॉल्व्ड पेपर के लिए पैसे दिए थे। लेकिन, इस पूरे घटनाक्रम के करीब दो साल बीत जाने के बाद भी राधाकृष्णन कमेटी की अहम सिफारिशें आज तक सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं।
राधाकृष्णन कमेटी की प्रमुख सिफारिशें क्या थीं?
कमेटी ने पेपर लीक जैसी घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए कई बड़े बदलावों की वकालत की थी। इनमें मुख्य रूप से ये 5 सिफारिशें शामिल थीं:
- पेन-पेपर मोड (PPT) से कंप्यूटर मोड (CBT) पर शिफ्ट: कमेटी ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि परीक्षा को पेन-पेपर मोड से हटाकर कंप्यूटर-बेस्ड टेस्ट (CBT) के रूप में आयोजित करना सबसे सुरक्षित रास्ता है।
- कई शिफ्ट में परीक्षा: जेईई (JEE Main) की तर्ज पर नीट-यूजी को भी कई शिफ्टों में कराने का मजबूत सुझाव दिया गया था। कमेटी का मानना था कि 2 लाख से ज्यादा उम्मीदवारों वाली परीक्षा को कुछ दिनों से लेकर हफ्तों तक कई सेशन में कराया जाना चाहिए।
- मल्टी-स्टेज टेस्टिंग: कमेटी ने नीट-यूजी के लिए मल्टी-स्टेज टेस्टिंग (कई चरणों में परीक्षा) को एक बेहतर और व्यावहारिक विकल्प बताया था।
- हाइब्रिड प्रोसेस: प्रश्न पत्रों की छपाई, उनके रखरखाव और ट्रांसपोर्टेशन के दौरान होने वाले लीक को जड़ से खत्म करने के लिए 'हाइब्रिड कंप्यूटर-असिस्टेड' प्रक्रिया का सुझाव दिया गया था। इसके तहत परीक्षा केंद्रों के गोपनीय सर्वर पर एन्क्रिप्टेड पेपर भेजने और वहीं एग्जाम सेंटर पर ही प्रश्न पत्र प्रिंट करके छात्रों को बांटने की बात कही गई थी।
- कंप्यूटर-अडेप्टिव टेस्टिंग (लॉन्ग टर्म): लंबी अवधि के सुधार के तौर पर सभी उम्मीदवारों के लिए एक फिक्स प्रश्न पत्र की जगह छात्रों के स्तर (लेवल) के आधार पर सवाल देने की व्यवस्था का सुझाव दिया गया था।
सुझाव शानदार थे, फिर सरकार ने क्यों नहीं किए लागू?
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के महानिदेशक अभिषेक सिंह का कहना है कि नीट को कंप्यूटर-बेस्ड टेस्ट बनाने का फैसला स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को लेना होता है, क्योंकि NTA उन्हीं की ओर से यह परीक्षा आयोजित कराती है। हालांकि, स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से कंप्यूटर-बेस्ड टेस्ट पर कभी सहमति नहीं बन पाई।
अधिकारियों के मुताबिक, इसके पीछे सबसे बड़ी तकनीकी बाधा 'नॉर्मलाइजेशन' की प्रक्रिया है। नीट-यूजी देश की सबसे बड़ी परीक्षा है जिसमें करीब 25 लाख छात्र हिस्सा लेते हैं। अगर इसे कंप्यूटर मोड में कराया जाए, तो NTA एक शिफ्ट में अधिकतम 2 लाख छात्रों की ही परीक्षा ले सकता है। ऐसे में पूरी परीक्षा संपन्न कराने के लिए कम से कम 15 शिफ्टों की जरूरत पड़ेगी। इतनी शिफ्टों में प्रश्न पत्रों के कठिनाई स्तर को 'नॉर्मलाइज' करना बेहद मुश्किल काम है, जिससे कानूनी विवाद बढ़ने और एडमिशन में देरी का खतरा रहता है।
नीट-पीजी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला
एक अधिकारी ने बताया कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट से इसलिए भी किनारा किया क्योंकि पिछले साल NEET-PG को दो शिफ्टों में कराने की कोशिश की गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सभी उम्मीदवारों के लिए निष्पक्षता सुनिश्चित करने के वास्ते ऐसा करने से रोक दिया था।
एक अधिकारी ने यह भी स्वीकार किया कि पेन-पेपर मोड में निष्पक्ष परीक्षा कराना लगभग असंभव है। चूंकि नीट एक 'हाई-स्टेक' परीक्षा है, इसलिए लोग पेपर के लिए पैसे देने को हमेशा तैयार रहते हैं। प्रश्न पत्रों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने (फिजिकल ट्रांसपोर्टेशन) के दौरान कई ऐसे स्तर होते हैं जहां से पेपर लीक हो सकता है।
अब तक सिर्फ इन 2 सुझावों पर ही हुआ है अमल
राधाकृष्णन कमेटी की रिपोर्ट को 2 साल होने वाले हैं, लेकिन NTA ने अब तक केवल दो ही सिफारिशों को जमीन पर उतारा है:
- राज्य और जिला स्तर के अधिकारियों के साथ मिलकर परीक्षा का आयोजन करना।
- डमी कैंडिडेट (किसी और की जगह परीक्षा देने वाले) को रोकने के लिए 'आधार-बेस्ड बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन' सिस्टम का इस्तेमाल।
बाकी सारे अहम और तकनीकी बदलाव अब भी फाइलों में धूल फांक रहे हैं, जिसका नतीजा एक बार फिर पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने के रूप में सामने आया है।




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