पहले टैरिफ की मार, फिर पाकिस्तान से नजदीकी; क्या भारत को ट्रंप पर दोबारा भरोसा करना चाहिए?
आई लव इंडिया कहने वाले डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां क्या वाकई भारत के खिलाफ हैं? भारी टैरिफ, H1-B वीजा पर सख्ती और पाकिस्तान-चीन से अमेरिका की नजदीकी के बीच क्या भारत को ट्रंप पर दोबारा भरोसा करना चाहिए? जानिए

हाल ही में नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित अमेरिकी स्वतंत्रता के 250वें स्थापना दिवस समारोह में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पीएम मोदी की जमकर तारीफ की। उन्होंने फोन कॉल के जरिए कहा कि 'भारत उन पर 100% भरोसा कर सकता है।' लेकिन कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन के हालिया फैसले और 'लेन-देन' वाली नीतियां भारत के रणनीतिक हितों के लिए कई नई चुनौतियां खड़ी कर रही हैं।
मार्को रुबियो का भारत दौरा और ट्रंप का सरप्राइज कॉल
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो इस समय भारत के चार दिवसीय दौरे पर हैं। इस दौरान उन्होंने पीएम मोदी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और एनएसए अजीत डोभाल से मुलाकात की है। रुबियो की यह यात्रा दोनों देशों के बीच पिछले एक साल में उपजे अविश्वास को कम करने की एक कूटनीतिक कोशिश मानी जा रही है।
इसी दौरे के बीच, अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भारत मंडपम में एक कार्यक्रम के दौरान मंच से राष्ट्रपति ट्रंप को फोन मिलाया। इस दौरान दोनों देशों के मधुर संबंधों का दावा करते हुए ट्रंप ने सीधे भारतीय आवाम को संदेश दिया। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा- मैं प्रधानमंत्री मोदी का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। हमारे रिश्ते इतने करीब कभी नहीं रहे। भारत मुझ पर 100 प्रतिशत भरोसा कर सकता है।
बयानबाजी और हकीकत में अंतर
ट्रंप की ये बातें सुनने में भले ही अच्छी लगें, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में इसे संदेह की नजर से देखा जा रहा है। विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि ट्रंप का रवैया हमेशा 'कारोबारी मुनाफे' वाला रहा है। मीठी बातों के बावजूद, जमीनी स्तर पर अमेरिका भारत को सिर्फ एक रणनीतिक साझेदार नहीं, बल्कि एक भविष्य के 'आर्थिक प्रतिद्वंद्वी' के रूप में भी देखने लगा है। सीएनबीसी-न्यूज18 पर बात करते हुए रक्षा मामलों के जानकार सुशांत सरीन ने एक सर्वे का हवाला देते हुए बताया कि भारत के युवाओं में अमेरिका के प्रति सकारात्मक धारणा 83% से गिरकर 56% (या उससे भी कम) हो गई है।
मीठे बयानों और कड़वे फैसलों के बीच का फासला
ट्रंप सार्वजनिक मंचों से दोस्ती का दावा जरूर करते हैं, लेकिन उनकी 'अमेरिका फर्स्ट' नीतियां अक्सर भारत के कोर हितों से टकराती हैं। अमेरिका अब भारत को सिर्फ एक रणनीतिक साझेदार के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य के एक आर्थिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है। 2025 के मध्य में ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50% का भारी-भरकम टैरिफ थोप दिया था। इसमें 25% रेसिप्रोकल टैरिफ और 25% पेनल्टी भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने को लेकर लगाई गई थी। हालांकि, हाल ही में (फरवरी 2026) एक अंतरिम व्यापार समझौते के तहत इन टैरिफ को घटाने पर बात बन रही है, लेकिन यह अमेरिका के सख्त 'लेन-देन' रवैये को साफ तौर पर दर्शाता है।
ताजा घटनाक्रम में मई 2026 में ट्रंप प्रशासन ने H1-B वीजा नियमों और फीस में भारी सख्ती कर दी है। ट्रंप का यह कदम इमिग्रेशन को सीमित करने की उनकी राजनीतिक प्राथमिकता का हिस्सा है, लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान अमेरिका में काम करने वाले भारतीय आईटी पेशेवरों को हो रहा है।
मई 2026 में ट्रंप का चीन दौरा और वहां हुआ कूटनीतिक समझौता भारत के लिए एक अलार्म है। अमेरिका और चीन के बीच अगर व्यापारिक तनाव कम होता है, तो उन भारतीय उद्योगों (विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स) को भारी झटका लग सकता है, जिन्होंने अमेरिकी टैरिफ के कारण चीन के विकल्प के रूप में अपनी जगह बनानी शुरू की थी।
पड़ोस में अमेरिका का दोहरा रवैया
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा सीधे तौर पर उसके पड़ोस से जुड़ी है, लेकिन यहां भी वाशिंगटन और नई दिल्ली के हितों में गहरा टकराव है।
पाकिस्तान के साथ करीबी: ट्रंप प्रशासन लगातार पाकिस्तान को रियायतें दे रहा है। अमेरिका अपनी मध्य-पूर्व की नीति के तहत पाकिस्तान को 'अब्राहम समझौते' में शामिल करने पर जोर दे रहा है। भारत के लिए यह स्वीकार्य नहीं है कि जो देश उसकी धरती पर आतंकवाद को बढ़ावा देता है, अमेरिका उसे अपनी सहूलियत के लिए कूटनीतिक रूप से मजबूत करे और भारत-पाकिस्तान को एक ही पलड़े में तौले।
बांग्लादेश और म्यांमार: ट्रंप प्रशासन ने जो बाइडेन के दौर की उन नीतियों को काफी हद तक जारी रखा है, जिन्होंने बांग्लादेश में अस्थिरता को जन्म दिया। भारत के ठीक पड़ोस में अमेरिका की नीतियां भारत की आंतरिक और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा पैदा करती हैं।
ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव
भारत हमेशा से यह स्पष्ट करता आया है कि अपनी विशाल आबादी की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए उसे विविध स्रोतों और सस्ते रूसी तेल की जरूरत है। ट्रंप ने रूसी तेल खरीदने पर भारत की कड़ी आलोचना की और टैरिफ भी लगाए। हालांकि, मौजूदा समय में ईरान-इजरायल युद्ध के कारण पैदा हुए वैश्विक तेल संकट के चलते अमेरिका को हाल ही में भारत को रूसी तेल खरीदने की कुछ छूट देनी पड़ी है, लेकिन यह छूट भारत की जरूरत को समझकर नहीं, बल्कि ऊर्जा सप्लाई की मजबूरी के कारण दी गई है।
'ड्रैकुला' से तुलना और ट्रांसएक्शनल रिश्ता
राजनीतिक टिप्पणीकार डॉ. आनंद रंगनाथन ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि ट्रंप पर भरोसा करना वैसा ही है जैसे "किसी ब्लड डोनेशन कैंप में ड्रैकुला पर भरोसा करना।" उन्होंने जोर देकर कहा कि हमें ट्रंप को दोस्त नहीं, बल्कि पूरी तरह से "ट्रांसएक्शनल" मानना चाहिए। माइकल कुगेलमैन जैसे अमेरिकी विशेषज्ञों ने भी माना कि दोनों देशों के बीच "ट्रस्ट गैप" बना हुआ है, जिसे केवल एक कूटनीतिक यात्रा से नहीं भरा जा सकता।
अब यह पूरी तरह साफ है कि अमेरिका-भारत संबंध अब केवल 'साझा लोकतांत्रिक मूल्यों' पर नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से लेन-देन पर टिके हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को संतुलित करने के लिए बने 'क्वाड' को लेकर भी ट्रंप ने कोई खास जल्दबाजी नहीं दिखाई है। ऐसे में भारत को मीठे बयानों से खुश होने के बजाय अपनी सामरिक स्वायत्तता और आंतरिक मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। भारत को यह मानकर चलना होगा कि वर्तमान अमेरिकी प्रशासन एक ऐसा कारोबारी साझेदार है जिसके साथ हर कदम बेहद सावधानी और मोल-भाव के साथ रखना होगा।




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