TMC से नाराजगी का इजहार और ध्रुवीकरण की मार; SIR से नहीं हुई ममता बनर्जी की हार!
Mamata TMC Bengal Defeat Reasons Data Analysis: सांविधानिक और राजनीतिक नैतिकता को किनारे रख दें और चुनावी आंकड़ों पर गौर करें, तो बंगाल में टीएमसी की हार और बीजेपी की बड़ी जीत का कारक SIR नहीं दिखता है।

Mamata Banerjee TMC Bengal Defeat Reasons Data Analysis: क्या भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की वजह से जीत मिली है? पश्चिम बंगाल के संदर्भ में यह एक विवादास्पद सवाल बनता जा रहा है। पिछले साल से निर्वाचन आयोग ने जिन 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में वोटर लिस्ट का एसआईआर किया है, उनमें छह राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में चुनाव हुए हैं, पर बंगाल सबसे विवादास्पद साबित हुआ, क्योंकि यहां 27 लाख मतदाता ‘विचाराधीन’ (अंडर एडजुडिकेशन) होने के कारण अयोग्य साबित कर दिए गए। चुनाव के दिन भी वे मताधिकार की बाट जोहते रह गए, जबकि करीब 62 लाख वोटरों के नाम SIR में कटे हैं।
SIR से जुड़ी सांविधानिक या राजनीतिक नैतिकता को एक किनारे रख दें और ठोस चुनावी डेटा पर गौर करें, तो भाजपा की इस जीत का मूल कारक SIR नहीं दिखता है। इसे समझने के लिए 3 सवालों के जवाब तलाशते हैं।
- पहला सवाल- पार्टियों के पारंपरिक गढ़ से बाहर SIR का क्या असर रहा?
- दूसरा सवाल- मुस्लिम मतदाता इस प्रक्रिया से कितने प्रभावित हुए?
- तीसरा सवाल- पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत की असली वजह क्या रही?
शुरुआत पहले सवाल से करते हैं। साल 2011, 2016 और 2021 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल और उसके सहयोगियों को क्रमश: 226, 211 और 215 सीटें मिली थीं। 124 विधानसभा सीट ऐसी थी, जहां टीएमसी और उनके सहयोगियों ने तीनों चुनावों में जीत दर्ज की। 2011 से पहले के चुनावों को शामिल नहीं कर रहे, क्योंकि 2008 के परिसीमन में विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं बदल गईं थीं। इस चुनाव में तृणमूल और उसके सहयोगियों को इन 124 सीटों में से 78 में हार का सामना करना पड़ा (एक में चुनाव स्थगित है) और इन 124 क्षेत्रों से बाहर केवल 34 सीटें मिली हैं।
इसके मुकाबले, बीजेपी ने 2019, 2021 और 2024 के चुनावों में क्रमश: 121, 77 और 90 सीटों पर बढ़त हासिल की (यहां 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों को विधानसभा में लीड के आधार पर बांटा गया है)। इसमें 54 विधानसभा क्षेत्र ऐसे थे, जहां बीजेपी तीनों बार जीती। भाजपा ने इस चुनाव में इन 54 सीटों के साथ-साथ पिछले तीनों चुनावों में कभी-न-कभी जीती गई सभी 142 सीटों पर भी विजय का परचम लहराया है। इन 142 सीटों के अलावा बीजेपी ने 65 ऐसी सीटें जीती, जिन पर वह पहले कभी नहीं जीत सकी थी।
किसी को बंगाल के नए घटनाक्रम को समझना है, तो उसे चुनाव नतीजों पर SIR के असर की जांच उन 100 मजबूत सीटों को छोड़कर करनी चाहिए, जो 2026 में भी तृणमूल और कांग्रेस के पास ही रहीं। सवाल है कि इनमें से कितने क्षेत्रों में 2024 और 2026 के बीच मतदान में गिरावट देखी गई? जवाब है- 20। इनमें से 2019, 2021, 2024 और 2026 में भाजपा 13 सीटों पर हर बार आगे रही, जबकि तृणमूल 2011, 2016, 2021 और 2026 में 7 सीटें जीतीं। बेशक, इन सीटों में एसआईआर के कारण 2.1 प्रतिशत से लेकर 38.6 प्रतिशत वोटरों के नाम कटे हैं। लेकिन, जब तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के वोट प्रतिशत में बदलाव और SIR के कारण वोटर की संख्या में आई कमी की तुलना की जाती है, तो दोनों में दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं दिखता।
दूसरा सवाल। एसआईआर के तहत धर्म-विशेष के मतदाताओं के नाम को ‘पक्षपातपूर्ण तरीके’ से हटाने का आखिर क्या असर पड़ा? SIR को लेकर यह आरोप जोर-शोर से उछला है कि इसके तहत उन जिलों में मतदाताओं के नाम ज्यादा हटाए गए, जहां मुस्लिम आबादी अधिक है। पश्चिम बंगाल में 39 विधानसभा क्षेत्र ऐसे थे, जहां से 2011, 2016 और 2021 में मुस्लिम विधायक चुने गए थे। इन 39 सीटों में से 18 सीटें उन जिलों में थीं, जहां 2011 की जनगणना के अनुसार मुस्लिम आबादी का अनुपात 50 फीसदी या उससे अधिक था। इस बार भी इन 34 विधानसभा क्षेत्रों से मुस्लिम विधायक ही चुने गए हैं, जिनमें महज 5 गैर-तृणमूल कैंडिडेट हैं। बाकी 5 सीटें भाजपा के खाते में गई हैं।
बंगाल की नई विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की कुल संख्या 40 है। 2021 में भी उनकी संख्या कमोबेश इतनी ही थी। अलबत्ता तृणमूल के विधायकों में मुस्लिम विधायकों की हिस्सेदारी बढ़कर 42.5 प्रतिशत हो गई है। साफ है, यह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का उदाहरण है, न कि मतदाता-सूची में कथित हेर-फेर का नतीजा। असम में कांग्रेस भी इसी गफलत का शिकार हुई है।
ऐसे में, तीसरा सवाल महत्वपूर्ण बन जाता है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत का असली कारण क्या है? इसका जवाब है, सत्ता विरोधी लहर। लोगों पर इसका भारी असर दिखा है, रही-सही कसर ध्रुवीकरण ने पूरी कर दी। 2021 से 2026 के बीच तृणमूल ने 293 सीटों में से 268 में मत-प्रतिशत गंवाया है। इनमें 69 सीटों पर उसे 10 प्रतिशत से अधिक का नुकसान हुआ है। इसके उलट भाजपा ने 293 सीटों में से 270 में अपना मत-प्रतिशत बढ़ाया और 95 सीटों पर उसे 10 प्रतिशत से अधिक का लाभ मिला है।
जन-समर्थन में आए इस बदलाव के गहरे निहितार्थ हैं। ऐतिहासिक तथ्यों से इसे समझाना आसान होगा। दरअसल, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चा ने 2006 के चुनाव की शानदार जीत और 2011 की करारी हार के बीच 11 प्रतिशत मत गंवाए थे। परिसीमन की वजह से हुए बदलावों के कारण इस परिवर्तन का क्षेत्रवार सटीक विश्लेषण संभव नहीं है, लेकिन 2026 में तृणमूल के मत-प्रतिशत में लगभग 4.7 प्रतिशत की गिरावट हुई है, जो वाम मोर्चा की तुलना में कम है। यही कारण है कि ममता बनर्जी 2011 के वाम मोर्चे की तुलना में TMC की सीटों की संख्या को बचाने में कहीं अधिक सफल रही हैं।
तृणमूल कांग्रेस के सामने अब एक बड़ी चुनौती है। अगर बचे हुए हिंदू मतदाता भाजपा या राज्य की अन्य विपक्षी पार्टियों का रुख कर लें, तब क्या होगा? ये मतदाता अब तृणमूल के खिलाफ मुखर हो सकते हैं, क्योंकि वह भाजपा से हार चुकी है। जाहिर है, पश्चिम बंगाल की राजनीति अभी खत्म नहीं हुई है।




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